IMG-187x300उदयपुर। हिन्दी को देश की राजभाषा का दर्जा दिलाने में मेवाड़ का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। मेवाड़ रियासत के भारतीय गणतंत्र में विलीनीकरण से पूर्व ही तत्कालीन महाराणा भूपालसिंह ने हिन्दी को राजभाषा का दर्जा दे दिया था इसका उल्लेख मेवाड़ के संविधान में भी किया गया है।

उल्लेखनीय है कि महाराणा भूपालसिंह ने 23 मई १९४७ को चंपाबाग में आयोजित एक भव्य समारोह में मेवाड़ का संविधान घोषित कर अंगीकार किया था। इस अवसर पर देश की कई रियासतों के राजा-महाराजा और स्वतंत्रता आंदोलन के नेता भी मौजूद थे। मेवाड़ के इस संविधान में राज-काज हिन्दी में करने के संकल्प के साथ ही हिन्दी के विकास के लिए महाराणा प्रताप विश्वविद्यालय की स्थापना की गई। मेवाड़ के इस कदम से भारतीय संविधान सभा में हिन्दी के पक्षधरों को बहुत ताकत प्राप्त हुई। अन्यथा पं. जवाहरलाल नेहरू क्रहिन्दुस्तानीञ्ज को राजभाषा बनाने के पक्षधर थे। अंतत: बहुमत को देखते हुए उन्होंने भी हिन्दी को स्वीकार कर लिया। इस सफलता में उदयपुर के मास्टर बलवंतसिंह महता की भूमिका काफी महत्वपूर्ण रही।

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