उदयपुर, राजस्थान की राजनीति में भूचाल आने के खतरनाक संकेत मिल रहे हैं। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने सोहराबुद्दीन की फर्जी मुठभेड़ के मामले में किरोड़ीलाल मीणा के हवाले से नंबर वन को जानकारी होने का इशारा किया है, जिसके कई निहितार्थ हैं। इन्हीं को पकड़ते हुए तत्कालीन नंबर वन वसुंधरा राजे ने भी उन्हें लपेटे जाने की आशंका जाहिर की है। श्रीमती वसुंधरा ने निवाई की आमसभा में कहा, आज कटारिया, कल मैं, परसों और कोई राजनेता। मतलब साफ है कि सोहराबुद्दीन के भूत ने भाजपा के कई बड़े नेताओं की नींद उड़ा रखी है।

कुख्यात अपराधी सोहराबुद्दीन की मौत मुठभेड़ में हो जाती, तो कोई बात नहीं थी, लेकिन उसका अपहरण करके हत्या की गई और उसे मुठभेड़ का रूप दिया गया, जिसे स्वीकार नहीं किया जा सकता। सोहराब की बीबी कौसर बी की भी नृशंस हत्या करके उसका शव जला दिया गया और अस्थियां गुजरात के पुलिस अधिकारी डीजी बंजारा के फार्म हाउस के कुएं में डाल दी गई, जिन्हें बाद में वहां से सुबूत के तौर पर बरामद किया गया। सरकार द्वारा गैर सरकारी तौर पर हत्याओं का यह सिलसिला और आगे बढ़ा। सोहराब के साथी शूटर तुलसी प्रजापति को भी पुलिस ने मार दिया, जबकि तुलसी ने उदयपुर की एक अदालत में उसे फर्जी मुठभेड़ में मार देने की आशंका जताते हुए सुरक्षा की गुहार की थी। अदालत को दिया गया वह पत्र आज भी मौजूद है। फिर भी पुलिस ने उसे मार दिया।

आखिर पुलिस ने ऐसा क्यों किया? पैसे के लिए अथवा पदौन्नति के लिए? या दोनों के लिए! कुछ बरस पहले तक तो समाजकंटक माफिया द्वारा ही सुपारी के लेनदेन की बातें कही-सुनी जाती थी, लेकिन इस मामले के बाद तो यह साफ हो गया है कि नेता और अफसर भी सुपारी का लेन-देन करते है और वह भी हत्या जैसे संगीन अपराध के लिए। कहानी तो यही है। और इन नकली मुठभेड़ों में राजस्थान और गुजरात के बड़े पुलिस अफसर शामिल हुए हैं। ऐसा ये लोग खुद के बूते पर तो कतई नहीं कर सकते। डोर तो ऊपर से ही हिली है। अब यह पता चलना ही चाहिए कि वह ऊपर वाला है कौन? नंबर वन, टू या थ्री।

धरना प्रदर्शन करने वाले भी यही कह रहें है कि असलीयत सामने आनी चाहिए। सबकी निगाहें 4 जून पर टिकी हुई है, जब इस मामले पर मुंबई की सीबीआई कोर्ट फिर सुनवाई करेगी।

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