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राजस्थान में मुस्लिम डेयरी व्यापारियों पर हिंदू गौ रक्षकों के हमले के दृश्य अभी लोगों के दिमाग में बने हुए हैं.

कई घटनाएँ सामने आई हैं जहाँ गौ रक्षक देश के कई राज्यों में हाईवे और दूसरे रास्तों पर अवैध रूप से नाकाबंदी करते हैं और पशुओं को लाने ले जाने वालों को मारते पीटते हैं.

से में मुसलमानों के लिए देश में एक जगह से दूसरी जगह गाय ले जाना मौत से खेलने के बराबर है.

अभी राजस्थान के अलवर की घटना लोगों के दिमाग से मिटी भी नहीं थी कि शुक्रवार को झारखंड में एक बीस साल के मुस्लिम लड़के को भीड़ ने मार मार कर जान से मार दिया. वो एक हिंदू लड़की से प्यार करता था.

योगी आदित्यनाथ और नरेंद्र मोदीइमेज कॉपीरइटEPA

उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की सरकार बनने के बाद से सरकार ने अवैध बूचड़खानों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने के नाम पर भैंस, बकरे और मुर्गे के कारोबार पर लगभग रोक लगा दी है.

इस राज्य में लाखों लोग मांस के व्यवसाय से जुड़े हुए हैं.

गोश्त का जिक्र इस तरह से किया जा रहा है जैसे उसका व्यवसाय या उसे खाना कोई अपराध हो.

इस हक़ीक़त के बावजूद कि कई अरब डॉलर के इस व्यापार से लाखों लोगों की रोजी-रोटी जुड़ी हुई है सरकार अभी तक कोई वैकल्पिक क़ानूनी रास्ता नहीं निकाल पाई है कि यह व्यापार फिर से कैसे शुरू हो सके.

गौशालाइमेज कॉपीरइटREUTERS

बीजेपी ने जो मुहिम चला रखी थी वह गौ हत्या के ख़िलाफ़ थी. उत्तर भारत के सभी राज्यों में गौ हत्या पर बहुत पहले से ही पाबंदी लगा दी गई थी. लेकिन योगी आदित्यनाथ ने जो कदम उठाए हैं उसमें, बकरे और मुर्गे का मांस भी निशाने पर है.

मांस और चमड़ा उद्योग से पारंपरिक रूप से दलित और मुसलमान जुड़े रहे हैं. कई लोगों का मानना है कि मांस के ख़िलाफ़ एक संगठित आंदोलन चलाकर दलितों विशेषकर मुसलमानों को आर्थिक रूप से निशाना बनाया जा रहा है.

इस समय भारत कई विचारधाराओं में बंटा हुआ है. एक तरफ हिंदुत्व के नए समर्थक हैं जिन्हें लगता है कि अब तक देश में सब कुछ ग़लत था और वे अब भारत की प्राचीन परंपरा के आधार पर देश में एक सांस्कृतिक, धार्मिक और आर्थिक क्रांति लाने वाले हैं.

गाय के नाम पर हत्या का विरोधइमेज कॉपीरइटNARAYAN BARETH

बीजेपी की जीत इतनी प्रचंड है कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अब हिंदू राष्ट्र की स्थापना की बातें करने लगे हैं.

दूसरी ओर मुस्लिम हैं जो इस समय बहुत डरे हुए हैं. परंपरागत रूप से वे हमेशा बीजेपी के ख़िलाफ़ रहे हैं. राजनीतिक दृष्टि से इस समय वे बेसहारा हो चुके हैं. आर्थिक रूप से वह पहले से ही समाज के हाशिए पर थे. अब उन्हें अपनी पहचान, रहन-सहन और संस्कृति सभी के बारे में अनजाने भय ने घेर लिया है.

तीसरी ओर वो भारतीय हैं जो देश के बदलते परिदृश्य को लेकर कुछ चिंतित हैं और अनिश्चितता से भरे हुए हैं. फ़िज़ा में कुछ घबराहट और बेचैनी भी है.

मुसलमानइमेज कॉपीरइटGETTY IMAGES

मुसलमानों के प्रति नफ़रत को लेकर कुछ घटनाएँ हुई हैं और इसकी कई वजहें हैं. इसके लिए बहुत हद तक ख़ुद मुसलमान भी दोषी हैं. लेकिन इस नफरत को पैदा करने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका ग़ैर-भाजपा, तथाकथित धर्मनिरपेक्ष दलों ने अदा की है.

इन दलों ने मुसलमानों को न केवल पिछड़ेपन और गरीबी से निकलने दिया बल्कि उन्होंने अपनी नीतियों से बाकी हिंदुओं को उनकी नज़र में दुश्मन बना लिया.

ये नफरतें अब इतनी बढ़ी हुई हैं कि कई लोग जब मुसलमान व्यापारियों पर अलवर की तरह के हमले देखते हैं तो कहते हैं, ”ऐसा क्या हुआ बस एक ही मुसलमान तो मरा. उन्हें सही करना जरूरी है.”

बीजेपी समर्थक मुसलमानइमेज कॉपीरइटAFP

भारत की राजनीति बदल रही है. इस बदलती राजनीति में अब कई रंग सामने आएंगे. यह सबको पता है कि राजनीति में कुछ भी स्थायी नहीं होता.

न मतदाता स्थायी होते हैं और न ही सरकारें. केवल परिवर्तन ही एक स्थायी वास्तविकता है जिसे कोई नहीं रोक सकता.

सोजन्य – बीबीसी – 

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