पोस्ट न्यूज़ . इधर तो घर में आने वाले दो माह में बेटी की शादी होनी है जिसकी तय्यरियाँ चल रही है दूसरी तरफ आवासीय स्कूल में प्राचार्य के पद पर विराजमान पिता स्कूल में रोज़ आने वाली सब्जियों के बिल के नाम पर रिश्वत डकार रहे थे जिनको एसीबी ने रेंज हाथों गिरफ्तार किया . मामला है बांसवाडा गढ़ीउ पखंड के खोड़न गांव में डॉ. भीमराव अंबेडकर बालिका आवासीय स्कूल का जहाँ प्राचार्य  हीराचंद नायक को शुक्रवार को भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो के दल ने 10 हजार रुपए रिश्वत लेते रंगेहाथों पकड़ा। प्राचार्य यह राशि छात्रावास में सब्जी सप्लायर को धमकाकर ऑनबिल बनवाकर पास करने के बाद ले रहा था।

जानकारी के मुताबिक़ इस प्राचार्य की बेटी की शादी फरवरी में होनी प्रस्तावित है। घर में शादी की तैयारी चल रही है, इस घटनाक्रम से परिजन भी सन्न रह गए। एसीबी ब्यूरो के डीएसपी गुलाब  सिंह ने बताया कि इस बारे में 2016-17 में हॉस्टल में सब्जी सप्लाई का ठेका लेने वाले मेतवाला गांव के अंबालाल भोई ने 13 दिसंबर को शिकायत की थी। इस पर ब्यूरो के दल ने 20 दिसंबर को सत्यापन करवाया, तो मामला सही पाया गया। इसके बाद शुक्रवार को अंबालाल को रंग लगे नोट देकर खोड़न के आवासीय स्कूल भेजा गया। वहां प्राचार्य हीराचंद नायक के अपने कार्यालय में 10 हजार रुपए लेने के संकेत पाकर पीछे से ब्यूरो की टीम ने आकर उसे धर लिया। बाद में गिरफ्तारी कर आगे कार्रवाई की गई।

आवासीय विद्यालय में बालिकाओं के लिए सुबह-शाम भोजन बनाने के लिए सब्जी की सप्लाई नियमित होती है। इसके लिए टेंडर लेने वाले सप्लायर पर दबाव बनाकर भेजी गई सब्जी की कीमत से ज्यादा का बिल बनवाकर प्राचार्य खुद पास कर रहे थे। फिर वह राशि सप्लायर के बैंक खाते में जमा होती थी। प्राचार्य नायक सप्लायर से मूल बिल का दस फीसदी कमीशन कहकर रिश्वत लेता था। ताज्जुब यह कि हॉस्टल में वार्डन वालम यादव नाम मात्र का ही है। पूछताछ से पता चला कि उसे लाई गई सब्जी, उसके बिल के बारे में जानकारी से दूर रखा जाता था और कमीशन समय पर नहीं मिलने पर सब्जियां तुलवाने और कम लावाना कहलवाकर महज सप्लायर पर दबाव बनाने के काम में लिया जाता रहा है।

फरियादी अंबालाल भोई की माने, तो प्राचार्य नायक के लालच के आगे वह परेशान हो गया था। भोई ने बताया कि रोज 50 किलो सब्जी की सप्लाई करता हूं। महीने का 80 से 90 हजार का बिल होता है, लेकिन उसमें भी हर महीने प्रिंसिपल साहब की बंधी देनी जरूरी थी, भले ही कमाई हो या हो। जब फल मंगवाए जाते थे, तो बाजार की आवक के मुताबिक सीजन का फल अमरुद भी लाता, तो वे दबाव बनाकर बिल महंगे सेब का बनवा रहे थे। बच्चियों के नाम पर इस कदर लूट तो क्या करता। शिकायत करना मजबूरी हो गई।

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