उदयपुर। झील के पास निर्माण निषेध हाईकोर्ट के नियमों की सरे आम धज्जियाँ उड़ाते हुए भूमाफिया और रसूखदारों द्वारा फतहसागर के किनारे ही पहाड़ी काट कर निर्माण कार्य किया जारहा है। निकायों को कानूनी दाव पेच में उलझा ये माफिया अपना काम हाईकोर्ट के आदेशों की अवहेलना करते हुए कर रहे है। युआइटी के जिम्मेदार सबकुछ जानते हुए भी रोक नहीं पा रही है। यूआईटी के जिम्मेदार लोग कारवाई से पल्ला झाड़ते हुए नज़र आ रहे है।
फतह सागर के पीछे राजिव गांधी गार्डन के पास हवाला कला मार्ग पर एक पहाड़ी का पाटकर समतल किया जा रहा है। यह क्षेत्र बड़ी पंचायत समिति में आता है और रोजाना रात से तड़के तक यहां पर जेसीबी और अन्य यंत्रों के माध्यम से चट्टानों को तोड़ने का काम किया जा रहा है। मुख्य बात यह है कि जहाँ निर्माण होने जारहा है वह जमीन फतहसागर झील से 100 मीटर की दूरी पर भी नहीं है। ऐसा नहीं है कि जिम्मेदारों का ध्यान इस ओर नहीं होगा। लेकिन वह अपनी जिम्मेदारी से बचते हुए दिखाई दे रहे हैं। युआइटी के जिम्मेदारों का मानना है कि हवाला कला की इस पहाड़ी को काटा जा रहा है वह पूरी तरह से गलत है, लेकिन युआईटी के खाते में नहीं होने से वह असक्षम है। ये भूमाफिया और रसूखदार यूआईटी और पंचायत को कानूनी दांव पेच में उलझा कर एक तरह से हाईकोर्ट के नियमों की ही खिल्ली उड़ा रहे है। युआईटी के अधिकारी जो एक गरीब का झोपड़ा पल भर में धराशाही कर देते है, इन रसूखदारों की तरफ आँख उठा कर भी नहीं देख पा रहे है।
नगर विकास प्रन्यास के अध्यक्ष रविन्द्र श्रीमाली का कहना हिया कि शिकायत आई थी और जब सक्षम अधिकारी काम रूकवाने गए तो कुछ लोग न्यायालय चले गए और कार्रवाई पर स्टे ले आए, यह जमीन नगर विकास प्रन्यास के खाते में दर्ज नहीं हुई है और इस जमीन को लेकर जो भी अतिक्रमण कर रहे हैं या उनके पास पट्टा है कि नहीं इस बात का खुलासा तो न्यायालय करेगा। लेकिन झील क्षेत्र के पास निर्माण करना ही सुप्रीम कोर्ट के आदेषों की अव्हेलना करना है। साथ ही श्रीमाली जी ने यह भी कहा है कि या तो यह जमीन वन विभाग को सौंपी जाए या नगर विकास प्रन्यास के खाते में आए। ताकी षहरवासियों और पर्यटकों के लिए एक और सुन्दर उद्यान का डवलपमेंट किया जा सके। युआईटी सचिव रामनिवास मेहता ने भी जिला कलेक्टर को पत्र भी लिखकर इस निर्माण पर संज्ञान लेने की बात पर जोर दिया है।
युआईटी अध्यक्ष रविन्द्र श्रीमाली और तहसीलदार के बयानों को सुनने के बाद तो यह तय हो गया है कि इन दोनों ही जिम्मेदारों को पता है कि झील के पास चल रहा पहाड़ी को चीरने का काम पूरी तरह से अवैध है। लेकिन जमीनखोरों के बाहूबल और कानूनी दावपेच में उलझने के कारण वह पावरलैस ही है। दूसरी तरफ इस पूरे मामले में बड़ी पंचायत के सचिव नरेन्द्र सिंह झाला से खसरा संख्या 1183 से 1185 के बारे में जानकारी ली तो उन्होंने स्पश्ट किया कि यह जमीन आज भी पंचायत के खाते में है, जिसे 2004 में आबादी क्षेत्र में लेने का प्रस्ताव राज्य सरकार ने तत्कालिन जिला कलेक्टर को दिया था लेकिन कागजों की बात कागजों में ही आई गई हो गई और यह पहाड़ी आबादी का रूप ले ही नहीं पाई। वर्तमान में नाई थाने में रिपोर्ट भी लिखवा चुके है इसके साथ ही युआईटी से लेकर जिला कलेक्टर तक लिखीत में रिपोर्ट दे चुके है। अब कार्रवाई बड़े साहबों के पास ही मौजूद है, क्योंकि अतिक्रमणों पर कार्रवाई करने वाले मजबूत हथोड़ों सहित सारी यंत्र बड़े विभाग के पास ही मिलते हैं ।

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