उदयपुर। पिछले दो दिन से उदयपुर जिला प्रमुख के बीपीएल होने की समाचार छप, सोशल मीडिया पर खूब पोस्ट वायरल हो रहा है। विरोधियों ने है तोबा मचाई हुई है जिला प्रमुख को कुर्सी से हटाने और त्यागने तक की बात हो रही है। प्रमुख जी की पार्टी के कद्दावर नेता भी इस मामले में चुप्पी साधे हुए है। अधिकारियों ने अपनी वफादारी निभाते हुए प्रमुख जी नाम तुरत फुरत में बीपीएल सूचि से हटा दिया। कोई बात नहीं हमको भी बुरा नहीं लगा और वैसे भी बुरा लगे भी तो किस बात का।
जो जिला प्रमुख जनता की सेवा के लिए चुन कर आये थे और चुने जाने के पहले बीपीएल यानी गरीबी रेखा के भी निचे थे , जिनके पास एक साइकिल तक नहीं थी जिनके घर कच्चे केलुपोश बिना सुख सुविधा के थे उनकी संम्पत्ति के बारे में मौजूदा हालात जानने की कोशिश किसी ने की है? नहीं की और जरूरत भी नहीं। क्यों कि जिसको हमने जनता की सेवा के लिए चुन कर भेजा है अब उसका कुछ हक़ तो बनता है कि तीन साल में इतना कुछ तो कर ले की अगली सात पीढ़ी तक बीपीएल ना रहे।
और ये हाल सिर्फ किसी एक जिला प्रमुख के नहीं है। सबके सब हमारे प्यारे भाइयों और बहिनों के जनप्रतिनिधियों के है। आते है साइकिल पर और जाते है बीएमडब्ल्यू में। जब आते है तो इनके बच्चे की स्कूल की फीस तक देने के लाले होते है लेकिन जाते है तो वो ही बच्चे ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी और जाने कौन कौन सी विदेशी यूनिवर्सिटियों में लाखों रुपये की पढ़ाई करते है। कभी इस बारे में किसी ने सवाल किया है ?
नहीं किया है क्यों कि हम भी मान बैठे है की ये सब के सब इनका हक़ है। इन जन प्रतिनिधियों की सेलेरी १० से २० हज़ार होती है लेकिन ५ साल में ये एक से पांच हज़ार करोड़ के आसामी बन जाते है। शहर के पॉश इलाकों में इनके बंगले बन जाते है। होटल और फ़ार्म हाउस के मालिक बन जाते है। आते है लंगोट में और पांच साल में ही जाते है १० लखिया सूट पहन कर। ये बात में किसी एक पार्टी के जन प्रतिनिधियों की नहीं कर रहा हु हर पार्टी के जन प्रतिनिधि चुन कर आने वाले जनप्रतिनिधि की बात हो रही है। अरे एक वार्ड का पार्षद ही एक बार में अपना जीवन सफल बना लेता है।
खेर इन बातों से हमे कोई फर्क नहीं पड़ता हमे तो तमाशा देखने की आदत हो गयी है और तमाशा देखने वाले कभी सवाल नहीं करते। जिनको हमारे इशारों पर नाचना था आज हम उनके इशारों पर नाचते है या फिर हाथ जोड़ कर उनके दरबार में सिर्फ उनकी एक नज़र पढ़ने का इंतज़ार करते है।
और अब सिर्फ जिला प्रमुख के बीपीएल में नाम होने पर है तोबा मचा रहे है। कभी आरटीआई में नगर निगम से बीपीएल की सूचि निकलवा कर देखो , कभी उन सूचि की असलियत जा कर देखो , पता चलेगा की कैसे कैसे बीपीएल भरे पड़े है। जिला प्रमुख जी आप फ़िक्र मत करो जो समझ में आये वो करो , आलाकमान से भी कोई ऑब्जेक्शन नहीं नहीं क्यों के सभी को एक ही थाली में खाना भी है और खिलाना भी है। यकीं मानो आपको कोई कुछ नहीं कहेगा। आपसे तो कोई यह भी नहीं पूछेगा पांच साल बाद की भाई आखिर १३००० सेलेरी में ऐसी कोनसी जादू की छड़ी घुमाई जो बीपीएल से वीवीआईपी वाले ठाठ जन्म जन्मांतर हो गए। आप तो बस लगे रहो। कुछ तो लोग कहेगे लोगों का काम है कहना छोड़ो बेकार की बातों में कही बीत ना जाए बचे हुए दीना।

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