Pavan Kaushik - 1हिन्दुस्तान जिंक का ‘सखी’ अभियान महिलाओं में सामाजिक व आर्थिक सषक्तिकरण द्वारा, भारत के विकास के लिए एक पहल है।

पवन कौषिक,
हेड-कार्पोरेट कम्यूनिकेषन, हिन्दुस्तान ज़िंक,

कहा जाता है जब आप गांव में एक महिला को सामाजिक व आर्थिक रूप से सषक्त एवं समृद्ध बनातेे हैं तोे वह महिला ना केवल अपने परिवार को, अपने गांव को, बल्कि अपने देष को सुदृढ़ बनाती है। यही मूल कारण बनता है देष के विकास का एवं अर्थव्यवस्था में सुधार का।

सन 2011 के जनसंख्या सर्वे के अनुसार भारत की 83.3 करोड़ जनसंख्या गांवों में रहती है तथा 37.7 करोड़ जनसंख्या शहरों मे रहती है। गांवों की जनसंख्या में तकरीबन 40.51 करोड़ महिलाएं तथा 42.79 करोड़ पुरूष है। गांवों में महिलाओं की संख्या शहरों के मुकाबले प्रति हजार अधिक है।

अगर हम इन ग्रामीण महिलाओं को सामाजिक व आर्थिक रूप से सषक्त बना सकंे तथा छोटे-बड़े घरेलू उद्योगों से जोड़ सकें तो यही महिलाएं अपना एक अलग अस्तित्व बनाने में सक्षम होगीं। यह एक ऐसा अस्तित्व होगा जो उनके परिवार का मार्गदर्षक बनेगा तथा बच्चों के षिक्षा स्तर, स्वास्थ्य, स्वच्छता व उनके विकास में अहम भूमिका निभाएगा।

ज़रूरत है एक इच्छा शक्ति की, एक संकल्प की, तथा एक आत्मविष्वास की।

गांवों में महिलाओं में बढ़ती षिक्षा दर तथा सामाजिक व आर्थिक रूप से सुदृढ़ होने की चाह ने हिन्दुस्तान जिं़क को प्रेरित किया कि वह इन ग्रामीण एवं आदिवासी महिलाओं को साथ लाकर स्वयं सहायता समूहों का गठन प्रारंभ करें। हिन्दुस्तान जिं़क ने यह प्रक्रिया वर्ष 2006 में प्रारंभ की जिसके अन्तर्गत हिन्दुस्तान जिं़क ने गांवों में घर-घर जाकर परिवारों को स्वयं सहायता समूह के गठन के बारे में बताया व इनकी उपयोगिता के बारें में विस्तृत जानकारी दी।

गांवों में अपने रीति-रिवाज होते हैं तथा साथ ही शहरों की तुलना में गांवों में परिवारों में अधिक जुड़ाव रहता हैं। गांवों में महिलाओं को परम्पराओं के अंतर्गत रहना पड़ता है। यह भी सच है कि इन परम्पराओं के रहते इन ग्रामीण महिलाओं को बाहर का कोई भी कार्य स्वतः रूप से लेने की आजादी नहीं होती। शुरूआती दौर में हिन्दुस्तान जिं़क को घरों के मुख्यिा एवं बुजर्गों को स्वयं सहायता समूह के गठन की उपयोगिता व उससे होने वाले लाभ के बारे में गहन रूप से समझाना पड़ा। अपने परम्परागत व्यावसाय से बाहर आने को यह ग्रामीण परिवार तैयार ही नहीं थे, महिलाओं को भेजने का तो प्रष्न ही नहीं उठता था। परिवार के रीति-रिवाज, उठना बैठना, संगत तथा जातिवाद भी स्वयं सहायता समूहों के गठन में परेषानी पैदा कर रहा था।

निरन्तर प्रयास अथवा सम विचार वाले परिवारों को समझा कर हिन्दुस्तान जिं़क ने स्वयं सहायता समूह के गठन की शुरूआत की। यहीं से हिन्दुस्तान जिं़क ने स्वयं सहायता समूहों का गठन प्रारंभ किया। एक से दस, दस से बीस, बीस से सौ, सौ से दोसो, फिर चारसों और अब 2014 में 475 स्वयं सहायता समूहों का गठन हो चुका हैं। यह सभी समूह आज हिन्दुस्तान जिं़क के ‘सखी’ स्वयं सहायता समूह के रूप में जाने जाते है।

शुरूआती दौर में समूह के गठन के तुरन्त बाद इन महिलाओं को बचत के बारे में सिखाया गया। इसके पश्चात् इन महिलाओं को बैंकों द्वारा जोड़कर बैंकों में खाते खुलवाये गये। अब यही महिलाएं अपनी बचत को बैंको में जमा करने लगी हैं। दूसरा पड़ाव था इन महिलाओं को इनकी इच्छानुसार एवं बढ़ते बाज़ार के मुताबिक प्रषिक्षण प्रदान कराना।

ग्रामीण महिलाएं मूलतः दो परिवेष में प्रषिक्षण प्राप्त करना चाहती थी। पहला कृषि व पशुपालन संबंधित तथा दूसरा गैर-कृषि यानि वस्त्रों व साज-सज्जा के सामान संबंधित। कुछ ऐसी भी महिलाएं थी जो अपने परम्परागत टेरीकोटा व्यवसाय से ही जुड़ी रहना चाहती थीं।

खेतीबाड़ी से जुड़ी महिलाओं को हिन्दुस्तान जिं़क ने कृषि उत्थान, नकदी फसल, मल्टि क्रॉपिंग तथा बीज व उर्वरक के चयन में प्रषिक्षत किया। पशुपालन में मुर्गी पालन व बकरी पालन से किस प्रकार लाभ उठाया जाए इस पर जोर दिया गया।

ग्रामीण महिलाओं नें सिलाई, कढ़ाई, बुनाई, मीनाकारी, एम्ब्रोइडरी, गहने बनाना, घर की साज-सज्जा का सामान तथा कपड़े बनाना आदि में अत्यन्त रूचि दिखाई। इन महिलाओं को इन्ही क्षेत्रों में प्रषिक्षण दिया गया।

‘सखी’ स्वयं सहायता समूह की यह महिलाएं दिन में लगभग 4 घंटे काम करती है। समय के सदपयोग का इससे बेहतर उदाहरण नहीं मिल सकता। महिलाएं अपने घरेलू कार्यो अथवा दिनचर्या के कार्यो के साथ-साथ नियमित तौर पर प्रतिदन प्रषिक्षण लेती है अथवा सामान बनाती है।

‘सखी’ स्वयं सहायता समूहों के बनाये सामानों को बेचने के लिए हिन्दुस्तान जिंक ने इन समूहों को विभिन्न बाजारों से जोड़ा है। मूलरूप से स्वयं सहायता समूह वही वस्तुएं बनाते हैं जिसकी बाजार में मांग हो तथा बेचना आसान हो। यह बाजार केवल राजस्थान तक सिमित न रह कर दिल्ली, मुम्बई तथा गुजरात तक फैल चुका हैं। विभिन्न चर्चित ब्राण्ड भी इन ‘सखी’ स्वयं सहायता समूहों से सामान खरीद रहे हैं।

लगभग सभी स्वयं सहायता समूह बैंकों से जुड़ चुके हैं तथा यह महिलाएं अपना खाता स्वयं संचालित करती है एवं लेन-देन करती है। इसके अलावा इन महिलाओं ने अपना चिट फण्ड भी बनाया है जिसमें हर महिला अपना योगदान देती है। वक्त पड़ने पर इन महिलाओं को अति न्यूनतम दर पर पैसा उपलब्ध हो जाता है।

आज ये महिलाएं सामाजिक रूप से सषक्त एवं आत्मविष्वासी है तथा इन्होंने समाज में अपना एक अलग स्थान बनाया हैं। आज ये महिलाएं ना सिर्फ परिवार में आर्थिक योगदान दे रही है अपितु परिवार के जीवनशैली, जिसमें घर का रख-रखाव भी शामिल है, में भी परिवर्तन ला रही है। अपने बच्चों को नियमित षिक्षा दिलाने में भी इन महिलाओं का सराहनीय योगदान है।

‘सखी’ अभियान इन सभी ग्रामीण एवं आदिवासी उद्यमी महिलाओं की आवाज है।

आज चुनौती इस बात की है कि हम कैसे मिलजुल कर इन कम पढ़ी-लिखी व घर परिवार के दायरे में सिमटी महिलाओं को उद्यमषीलता से जोड़कर सषक्त बना सकें। इसके लिए सार्थक पहल का माध्यम है स्वयं सहायता समूह का गठन ताकि चन्द महिनों में वे अपनी छोटी-छोटी बचत से मिलजुल कर अपने हुनर के अनुरूप वस्तुओं व सेवाओं का निर्माण करें और उनकी बिक्री से आय अर्जित कर आर्थिक व सामाजिक रूप से सषक्त बनें।

महिलाओं के सषक्तिकरण के लिए स्वास्थ्य, षिक्षा व आर्थिक स्वावलंबन के साथ ही निर्णय लने की प्रक्रिया में उनकी सक्रिय भागीदारी अति आवष्यक है। इसके लिए भागीरथ प्रयासों की जरूरत है।

षिक्षित महिलाओं और जन प्रतिनिधियों का यह कर्तव्य और दायित्व बन जाता है कि वे गा्रमीण महिला जागरण एवं सषक्तिकरण के लिए अपनी सक्रिय भागीदारी निभायें ताकि इन ग्रामीण महिलाओं के सर्वांगीण विकास और कल्याण के कार्यक्रमों का पूरी ताकत और इच्छा शक्ति के साथ निर्वहन किया जा सके।

ग्रामीण व आदिवासी महिलाओं के सषक्तिकरण के लिए समाज के विभिन्न वर्गों को समर्पित रूप से प्रयास करने होंगे। खास तौर से औद्योगिक घरानों को जो सामाजिक सरोकारों के अंतर्गत यह सोच साकार कर सकते हैं कि ‘‘जिंदगी तब बेहतर होती है जब आप खुष होते हैं, लेकिन जिंदगी तब बेहतरीन होती है जब अपकी वजह से लोग खुष होते है।’’

यदि हम इन तकरीबन 41 करोड़ ग्रामीण महिलाओं को सामाजिक व आर्थिक रूप से सुदृढ़ बना पाएं तो यही मूल मंत्र होगा गांवों व भारत देष के विकास का। यहीं ग्रामीण महिलाएं अपने घरेलू उद्योगों द्वारा भारत की अर्थव्यवस्था में अपना महत्वपूर्ण योगदान देने में सक्षम होंगी।

हिन्दुस्तान जिंक का ‘सखी’ अभियान महिलाओं में सामाजिक व आर्थिक सषक्तिकरण द्वारा, भारत के विकास के लिए एक पहल है।

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