ठग्स ऑफ हिंदुस्तान, साल की सबसे बड़ी फिल्म “ठग” नही पाई – इदरीस खत्री

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फिल्म समीक्षक – इदरीस खत्री 
समय :- 164 मिनट
अदाकार :- अमिताभ, आमिर, कैथरीना, फातिमा सना, जैकी श्रॉफ, रोनित रॉय, शशांक अरोरा, ल्योड़ ओवेन व अन्य
आधारित :- कन्फेशन ऑफ ठग, फिलीप मेडोस टेलर के उपन्यास (1839) पर, (यह चर्चागत विषय-इस पर अगली समीक्षा)
निर्देशक व पटकथा:- विजय कृष्ण आचार्य उर्फ विक्टर
संगीत:- अजय अतुल
गीत:- अमिताभ भट्टाचार्य
निर्माता:-YRF-आदित्य चोपड़ा
भाषा:- हिंदी, तमिल, तेलगू
छायांकन:- मानुष नंदन
इफेक्ट:- विशाल आनंद, लुइस ब्रेड्स
वेषभूषा:- रविन्द्र पाटिल
सेट:- रचना मन्डल
स्क्रीन्स:- 5300 भारत, 1500 ओवरसीज़
बजट:- 250 करोड़₹(160+90 करोड़)
दोस्तो फ़िल्म के कहानी से पहले फ़िल्म पर चर्चा कर लेते है सीने प्रेमियो का देश के महानायक अमिताभ बच्चन और मिस्टर परफेक्शनिस्ट आमिर खान को साथ मे पर्दे पर देखना निसन्देह स्वप्न पूरा होने जैसा ही होगा, आमिर ने फ़िल्म में से 70%आमदनी बतौर मेहनताना मांगी थी जो कि Y RF यशराज फ़िल्म ने मान ली थी,इस हिसाब से आमिर के खाते में जाएगे 700 करोड़ ₹,
 फ़िल्म 5300 स्क्रीन्स पर भारत मे जिसमे 4700 स्क्रीन्स में हिंदी, 300+300 में तमिल तेलगू में प्रदर्शित होगी,
फ़िल्म का पहले नाम ठग था, जो कि बाद में ठग्स ऑफ हिंदुस्तान किया गया,
दीवाली की छुट्टियों के कारण 4 दिन का सप्ताहन्त निश्चित ही 100 करोड़ पार करने की उम्मीद की जा सकती है
आमिर की फ़िल्म दंगल ने चायना में 2100 करोड़ का व्यापार किया था वहां पर 85000 सिनेमा घर है
भारत मे लगभग 25000 सिनेमा सिंगल ओर मल्टीप्लेक्स मिला कर
5300 स्क्रीन्स पर प्रदर्शन हैप्पी न्यू ईयर का रिकॉर्ड 44 करोड़ पहले दिन का टूट सकता है,,,
विक्टर मूल लेखक रहे है इसके पहले धूम 3 निर्देशित कर चुके है, बतौर लेखक गुरू, धूम सीरीज, रॉ वन संवाद लिख चुके है,, बतौर निर्देशन धूम 3, टशन के बाद तीसरी फिल्म है,
कहानी
बात शुरू होती है 1735 ई से, सईद बैग मिर्ज़ा (रोनित रॉय) छोटी सी रियासत रौंकपूर के राजा है,
औऱ ईस्ट इंडिया कम्पनी छल,कपट, लोभ यानी एन केन प्रकारेण पूरे हिन्दोस्तान पर कब्ज़ा करना चाहती है,
यहां भी ब्रिटिश जनरल क्लाइव (लायड ओवन) पहुच जाते है और राजा, पत्नी, बेटे को जान से मार देते है, राजा की एक बेटी है ज़फिरा जो कि बच्ची है उसे भी मारने की कोशिश की जाती है लेकिन राजा का सिपहसालार खुदाबख्श(अमिताभ) उसे बचा कर निकाल कर ले जाता है|ज़फिरा को युद्ध कौशल सिखाई जाती है और वह अपने माँ, पिता, भाई की मौत का बदला लिए बड़ी होती है, 11 साल बीत जाते है,अब खुदाबक्ष औऱ ज़फिरा(फातमा सना) के साथ एक आज़ाद नामक फ़ौज बना लेते है, अंग्रेजो से लड़ने के लिए
इधर फिरंगी मल्लाह(आमिर खान) जिसकी फितरत में धोखा ओर फरेब है, ठगी करके जीवन यापन करता है,
एक बार अंग्रेज उसे धोखा दे देते है और मोत के घाट उतार रहे होते है कि आज़ाद फ़ौज उन के जहाज पर आक्रमण कर देते है उसमें फिरँगी मल्लाह को गोली पड़ जाती है और दुर्घटना वश पड़ी गोली आज़ाद फ़ौज में फिरंगी मल्लाह खुदाबक्ष का चहेता हो जाता है, इलाज के लिए आज़ाद फ़ौज उसे अपने खुफिया ठिकाने पर ले जाती है, फिरंगी अपनी फितरत के चलते अलाबक्ष आज़ाद को पकड़ने के लिए फिरंगी से सौदा पटा लेते है,
फिरंगी इस काम के लिए जेल में बंद एक साथी सनीचर (जीशान अय्यूबी) को साथ ले लेता है, औऱ मिज़ापुर के राजा (शरद सक्सेना) ईस्ट इंडिया से लड़ने के लिए चोरी छिपे आज़ाद फ़ौज़ को हथियार देता है तो इसमें अलाबक्ष  पकड़ा जाते है, फिरंगी को ज़फिरा की सुरक्षा का वादा देकर, अब ईस्ट इंडिया कम्पनी आज़ाद फ़ौज़ को पकड़ना चाहती है फिर से फिरंगी के साथ जाल फैलाया जाता है क्योकि खुदाबख्श ज़फिरा की जिम्मेदारी फिरंगी पर डाल देते है तो फिरंगी पूरी आज़ाद फ़ौज़ को लेकर दशहरे के दिन हमले की योजना बनाते है जिसमे मदद करती है नचनिया सुरैया जान(कैटरीना)लेकिन कहानी में आता है ट्विस्ट
इन सब ट्विस्ट ओर टर्न के लिए फ़िल्म देखना पड़ेगी,
फ़िल्म भव्य बजट, भव्य कम्प्यूटर जनित तकनीक, युद्ध दृश्य, VFX, विज्वल इफेक्ट से भरी पड़ी है, साथ ही कुछ ड्रोन दृश्य भी अच्छे है लेकिन किसी फिल्म की रीढ़ की हड्डी होती है कहानी, जो कि 80 के दशक की लगती है,
बस यही फ़िल्म औऱ निर्देशक गच्चा खा गए,
नावेल कन्फेशन ऑफ ठग को इस कदर तोड़ा मरोड़ा गया है कि फ़िल्म में कब देशभक्ति जाग जाती है, कब गायब हो जाती है समझ से परे यानी इतिहास से भरपूर मखोल, देश के भूगोल से भी यही किया गया है क्योंकि राजस्थानी रियासत में समुंद्र किनारा ???
वेशभूषा पर काम नही किया गया,
गांनो में वश्मल्ले ही आकर्षित करता है शेष काम चलाऊ ही लगे है, कहि कहि पर पार्श्व संगीत दिल को छूता है लेकिन हर जगह नही|
अभिनाभ की गांनो की शायरी ठीक ठाक ही है लेकिन उचित संगीत के बिना गाने मृत हो जाते है,
कैथरीना के लिए ज्यादा कोई काम नही था उससे ज्यादा काम तो खुदाबक्ष की बाज से लिया गया है
भव्य सेट, भव्य फिल्मांकन फ़िल्म की सफलता की ग्यारंटी नही हो सकते,
जब तक अमिताभ फ़िल्म में दिखते है फ़िल्म दौड़ती है शेष समय निर्देशक फ़िल्म से बांध नही पाए
फ़िल्म में जो भी मोड़ आते है दर्शक पहले ही समझ लेते है,
एक बड़ा सवाल ठग के कन्फेशन पर आधारित किताब को देशभक्ति से जोड़ कर भी मखोल उड़ाना ही माना जाएगा????
ओर ईस्ट इंडिया कम्पनी के एक जनरल को मार दिया जाए तो ईस्ट इंडिया कम्पनी दोबारा प्रयास न करेगी कब्जे का यह भी हास्यास्पद ही लगता है
खेर फ़िल्म ने निराश किया
अभिनय में आमिर मंजे हुवे लगते है लेकिन पाइरेट्स के जेक सपेरों से कोसो पीछे लगते है, अमिताभ जो करदे वही अभिनय होता है, फातिमा सना ओर कैटरीना को अभिनय में बहुत सीखना बाकी है, सनीचर की भूमिका में जीशान अय्यूबी अभिनय डिप्लोमा धारी धरती पकड़ अभिनेता है जो कि लगे भी शानदार के साथ अभिनय भी जानदार ओर जीवन्त लगा है,
फ़िल्म देखते समय 80 के दशक की फिल्मों की याद आती है वोभी 2K18 में,जो कि फ़िल्म के लिए ओर निर्देशक विक्टर के लिए हानिकारक है, फ़िल्म टिपिकल बॉलीवुड मसाला बनाने के चक्कर मे देशभक्ति से भी बाहर हो गए निर्देशक
दीपावली के सप्ताहन्त से फ़िल्म का बजट निकलना आसान होगा
अमिताभ और आमिर को पर्दे पर निहारना फ़िल्म की लागत और कमाई निकाल सकता है,,
फ़िल्म को 2.5 स्टार्स
क्योकि बड़ी उम्मीदें बड़ी निराशा भी लाती है यही हुआ इस फ़िल्म के साथ भी,,
इदरीस खत्री 

फिल्म समीक्षक – इदरीस खत्री

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