Water Problem is Ruining Children’s Future

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Dream of every child is to study and become someone who is educated, dignified, carries respect in society and is self-sufficient. It is fundamentally right also. But even before the journey begins, like a dream, it already ends like a dream for millions of children living in rural villages.

As a nation we have been struggling with atrocities on girl child. Campaigns like ‘Save Girl Child’ have made all of us conscious and also cautious. Women and girls across the world collectively spend about 200 million hours every day, collecting water i.e. 200 million hours – or more than 22,800 years – every day collecting this vital resource.

But here the matter is not about girl child. Issue is about who fetches fresh drinking water from considerable distances since most of the villages in India do not have drinking water wells anymore. If the child goes daily to fetch drinking water, alone or along with her mother, when will the child go to school.

The number of steps the child travels to fetch water is almost equal to the drops of water the vessel can carry.

If you think that scaling mountains every single day to secure drinking water is a myth in present-day India, it is time you think again. Reports emerging from Madhya Pradesh’s Damoh district reveal how boys and girls as young as 11 years of age have to climb down a nearly 70 feet deep open well for a single pitcher of water.

For children who are sent by their parents to fetch water from the well which usually touches the ground in summer, putting their lives in danger is now part of their daily routine.

The wells in the villages were identification of how much deep is the water below the earth… Today it only counts how much deep you can dig the well to get water.

Are we thinking our child will get enough water to drink even if we still think casually ? Forget about it.

As we say, Save Water – Before we mine it like a metal…

“Manthan”, an initiative by Hindustan Zinc, is a series of stories to bring awareness about various concerns like air pollution, water pollution, plastic pollution, noise pollution, climate change, road safety and wildlife protection.

 उदयपुर शहर का जन प्रतिनिधि कोई युवा नहीं होना चाहिए ? – स्मार्ट सिटी को है स्मार्ट युवा जनप्रतिनिधि की दरकार . 

उदयपुर। चाहे भाजपा हो या कांग्रेस दोनों बड़ी राजनातिक पार्टियां अपने युवा कार्यकर्ताओं के जोश के साथ आगे बढ़ रही है। इन्ही कार्यकर्ताओं की वजह से हर चुनाव को पुरे दम ख़म के साथ लडती है तो फिर एसी क्या वजह है कि जब विधानसभा टिकिट की दावेदारी की बात आती है  तो यही पार्टियाँ युवाओं को दर किनार कर वही पुराने 70 प्लस के नेताओं को टिकिट दे देती है।
उदयपुर शहर स्मार्ट सिटी में शुमार है यह बात अलग है कि अभी तक इसकी स्मार्टनेस कही दिखाई नहीं देती , लेकिन क्या इस स्मार्ट सिटी का विधायक स्मार्ट और तेज़ तर्रार युवा नहीं होना चाहिएम ?
70 प्लस के मोजुदा नेताओं के मार्गदर्शन के चलते क्या एक युवा शहर के विकास के लिए दोगुनी शक्ति से काम नहीं कर पायेगा ?
कांग्रेस और भाजपा के आलाकमान टिकिट बंटवारे के लिए अपने अपने जुगाड़ लगा रहे है जहाँ कांग्रेस के आला पदाधिकारी कॉल पर फीडबैक ले रहे है तो , भाजपा के आला कमान रणकपुर में वोट करवा कर उम्मीदवारों का रुझान जान रहे है।

उदयपुर शहर विधानसभा भाजपा का  कौन हो सकता है युवा दावेदार ?

अगर हम उदयपुर शहर भाजपा की बात करें तो लगभग सभी का मानना है कि गुलाबचंद कटारिया के आगे कुछ सोचा नहीं जा सकता क्यों कि चाहे कोई कितनी भी जुगत लगा ले कटारिया अगर चुनाव लड़ना चाहेगें तो टिकिट उन्ही को मिलेगा, कोई और उम्मीदवार नहीं हो सकता।  ऐसे में उदयपुर शहर से किसी युवा चेहरे की तो उम्मीद ही नहीं की जा सकती कटारिया के बाद अगर सेकण्ड लाइन के भाजपा नेता के बारे में देखें तो लाइन लम्बी है. हालाँकि कई भाजपा के नेता कहते है कि कटारिया ने सेकण्ड लाइन को शहर में कभी पूरी तरह ऊपर नहीं आने दिया और समय समय पर उनके हाथ के निचे सेकण्ड लाइन के नेताओं की सूचि बदलती रहती है.
पेनल में अगर नाम की चर्चा है तो उनमे देहात जिलाध्यक्ष गुणवंत सिंह झाला, शहर जिलाध्यक्ष दिनेश भट्ट, युआईटी चेयरमैन रविन्द्र श्रीमाली, नगर निगम महापौर चन्द्र सिंह कोठारी और नगर निगम निर्माण समिति के अध्यक्ष पारस सिंघवी के नाम आते है इनमे अगर किसी युवा चेहरे की तरफ देखें तो एक मात्र पारस सिंघवी और चन्द्र सिंह कौठारी का नाम आता है लेकिन क्या गुलाबचंद कटारिया और भाजपा के आला कमान पारस सिंघवी के नाम पर मुहर लगा सकते है.

कांग्रेस में कौन हो सकता है युवा उम्मीदवार :

भाजपा की तरह ही कुछ हाल शहर कांग्रेस का भी है जहाँ उम्मीदवारों की लाइन लम्बी है जिसमे दिनेश श्रीमाली, सुरेश श्रीमाली, गिरजा व्यास, गोपाल शर्मा, लाल सिंह झाला अपनी उम्मीदवारी की ताल ठोक रहे है। इनमें अगर युवा उम्मीदवार की बात करें तो दिनेश श्रीमाली एक ऐसा चेहरा है जिसकी शहर में एक अलग पहचान है । पिछले विधानसभा चुनाव में मोदी लहर होने के बावजूद गुलाबचंद कटारिया जैसे दिग्गज नेता के सामने दिनेश श्रीमाली ने खासी टक्कर दी थी। अगर इस बार कांग्रेस दिनेश श्रीमाली को टिकिट देती है उदयपुर शहर की सीट कांग्रेस के खाते में जाने के चांस काफी बढ़ सकते है। हालांकि गिरजा व्यास जैसी वरिष्ठ नेता अगर शहर से टिकिट की मांग करती है तो दिनेश श्रीमाली सहित बाकी उम्मीदवारों की थोड़ी मुश्किलें बढ़ सकती है । वैसे शहर कांग्रेस के कार्यकर्ताओं का तो यह भी कहना है कि अगर युवा चेहरा अगर नही आता है तो शहर में खुद कांग्रेसी ही पार्टी के लिए मुसीबत खड़ी कर सकते है ।।
इनके अलावा भी भाजपा और कांग्रेस से कुछ उम्मीदवार ऐसे भी है जो सोशल मिडिया के जरिये अपना प्रचार कर रहे है , यह तो अब वक़्त ही बताएगा कि किसको टिकिट मिलता है और कोण किसपर भारी पड़ता है लेकिन एक बात तो तय है कि उदयपुर शहर जैसी विधान सभा को एक युवा जन प्रतिनिधि की जरूरत है जो शहर के मिजाज को अच्छी तरह समझ विकास के कुछ नए आयाम स्थापित कर सके .

ग्लोबल हंगर इंडेक्स: भुखमरी दूर करने में और पिछड़ा भारत, 119 देशों में से 103वें पर पहुंचा

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भुखमरी खत्म करने वाले देशों की सूची में भारत और पीछे चला गया है. साल 2018 का The Global Hunger Index (GHI) जारी किया गया है और इसके मुताबिक भारत 119 देशों की सूची में 103वें स्थान पर है. पिछले साल भारत 100वें स्थान पर था.

ध्यान देने वाली बात ये है कि केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार में भारत  Global Hunger Index (GHI) में लगातार पिछड़ता जा रहा है. इस मामले में साल 2014 में भारत 99वें स्थान पर था. वहीं साल 2015 में थोड़े सुधार के साथ भारत 80वें स्थान पर जा पहुंचा. इसके बाद साल 2016 में 97वें और साल 2017 में 100वें पायदान पर पहुंच गया.

Global Hunger Index (GHI)वैश्विक, क्षेत्रीय, और राष्ट्रीय स्तर पर भुखमरी का आंकलन करता है. भूख से लड़ने में हुई प्रगति और समस्याओं को लेकर हर साल इसकी गणना की जाती है. जीएचआई को भूख के खिलाफ संघर्ष की जागरूकता और समझ को बढ़ाने, देशों के बीच भूख के स्तर की तुलना करने के लिए एक तरीका प्रदान करने और उस जगह पर लोगों का ध्यान खींचना जहां पर भारी भुखमरी है, के लिए डिजाइन किया गया है.

ग्लोबल हंगर इंडेक्स में ये देखा जाता है कि देश की कितनी जनसंख्या को पर्याप्त मात्रा में भोजन नहीं मिल रहा है. यानि देश के कितने लोग कुपोषण के शिकार हैं. इसमें ये भी देखा जाता है कि पांच साल के नीचे के कितने बच्चों की लंबाई और वजन उनके उम्र के हिसाब से कम है. इसके साथ ही इसमें बाल मृत्यु दर की गणना को भी शामिल किया जाता है.

ग्लोबल हंगर इंडेक्स में भारत का खराब प्रदर्शन लगातार जारी है. भारत की स्थिति नेपाल और बांग्लादेश जैसे पड़ोसी देशों से भी खराब है. इस मामले में चीन भारत से काफी आगे है. चीन 25वें नंबर पर है. वहीं बांग्लादेश 86वें, नेपाल 72वें, श्रीलंका 67वें और म्यामांर 68वें स्थान पर हैं. पाकिस्तान भारत से पीछे है. उसे 106वां स्थान मिला है.

जीएचआई की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में भूख की स्थिति बेहद गंभीर है. संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम की ‘2018 बहुआयामी वैश्विक गरीबी सूचकांक’ के मुताबिक साल 2005-06 से 2015-16 के बीच एक दशक में भारत में 27 करोड़ लोग गरीबी रेखा से बाहर निकल गए हैं. हालांकि ग्लोबल हंगर इंडेक्स की हालिया रिपोर्ट ने इन दावों पर सवाल खड़े कर दिए हैं.

उदयपुर जिले की 8 विधानसभा सीटों पर कांग्रेस के दावेदार लगा रहे है जोर – जानिये कौन कौन है किसको मिल सकता है कांग्रेस से टिकिट।

उदयपुर। सत्ता में आने की चाह में जहां कांग्रेस पूरी तरह से सक्रिय हो गई है, वहीं टिकट दावेदार भी पूरी तरह से सक्रियता बनाए हुए हैं। दावेदारों के साथ ही पार्टी भी प्रत्याशियों के चयन की प्रक्रिया में जुटी हुई है। दावेदारों को पहली सूची जारी होने का बेसब्री से इंतजार है।इसको लेकर कई दावेदार जयपुर में डेरा डाले हुए हैं। राजस्थान में कांग्रेस को मेवाड़ से बड़ी उम्मीद है। आला नेता पहले ही साफ कर चुके हैं कि प्रत्याशियों के चयन में किसी भी तरह की कोताही नहीं बरती जाएगी। मजबूत व जनता में गहरी पैठ रखने वाले प्रत्याशियों को ही टिकट दिया जाएगा। उदयपुर शहर और ग्रामीण के अलावा जिले की अन्य सीटों पर भी कई दावेदार हैं।

टिकट की जुगाड़ में जयपुर में डेरा
पिछले दो दिनों से जयपुर में टिकट के दावेदारों से पार्टी पदाधिकारी। बायोडाटा ले रहे हैं। उनसे उनकी क्षेत्र में पकड़ व अन्य मुद्दों पर चर्चा की जा रही है। जिले से टिकट के दावेदारों ने वहां पहुंचकर अपना मजबूती से पक्ष रखा।
भाजपा से लोहा लेना बड़ी चुनौती : मेवाड़ में पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा ने एकतरफा जीत । हासिल की थी। उदयपुर संभाग में कांग्रेस को मात्र 2 सीटों पर ही संतोष करना पड़ा था। हालांकि पिछले 5 साल में भाजपा से नाराजगी का फायदा कांग्रेस को मिलेगा।

कहां से कौन व कितने दावेदार
उदयपुर शहर : दिनेश श्रीमाली, डॉ. गिरिजा व्यास, पंकज शर्मा, सुरेश श्रीमाली, नीलिमा सुखाड़िया।
उदयपुर ग्रामीण : सज्जन कटारा, विवेक कटारा, शंकरलाल मीणा, मोहनलाल भील, कालूलाल मीणा, शारदा रोत, ओम प्रकाश गमेती।
मावली : पुष्कर डांगी, जगदीशराज श्रीमाली, गोरधनसिंह चौहान, जीतसिंह चुंडावत, सुरेश सुथार, गोपालसिंह चौहान, राजकुमार श्रीमाली।
वल्लभनगर: गजेंद्रसिंह शक्तावत, देवेंद्रसिंह शक्तावत, कुबेरसिंह चावड़ा, सूरजमल मेनारिया।। खेरवाड़ा: दयाराम परमार, बंशीलाल मीणा, सविता मीणा।
सलूंबर : रघुवीर मीणा, बसंती देवी मीणा, रेशमा मीणा।
गोगुंदा :मांगीलाल गरासिया, बत्तीलाल मीणा।
झाड़ोल : हीरालाल दांगी, सुनील भजात, शांतिलाल स्नोकरिया।

यूपी पुलिस का एक और कारनामा, इस बार ‘भूतों’ के खिलाफ कोर्ट में पेश कर दिया चालान 

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इन दिनों उत्तर प्रदेश पुलिस (Uttar Pradesh Police) की अजब-गजब कहानियां सुनने को मिल रही हैं. एक दिन पहले ही संभल जिले में बदमाशों को पकड़ने गई पुलिस की पिस्तौल ने जब ऐन मौके पर जवाब दे दिया तो मुंह से ‘ठांय-ठांय’ की आवाज निकाल बदमाशों को डराने का प्रयास किया. ताजा मामला हमीरपुर जिले का है, जहां यूपी पुलिस एक कदम और आगे निकल गई. नवरात्र के दौरान कानून और सुरक्षा व्यवस्था में खलल न पड़े, इसके लिए पुलिस ने 31 लोगों का नाम चिन्हित कर उप जिला मजिस्ट्रेट सदर के न्यायालय में उन्हें पाबंद करने की चालानी रिपोर्ट पेश की, लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि इन 31 लोगों में 3 ‘भूत’ यानी ऐसे लोग शामिल थे जिनका काफी पहले ही निधन हो चुका है.

जानकारी के मुताबिक हमीरपुर नगर कोतवाल शैल कुमार सिंह ने 4 अक्टूबर को नवरात्र में शांति भंग की आशंका के मद्देनजर कुल 31 लोगों को चिन्हित कर उप जिला मजिस्ट्रेट सदर की अदालत में चालानी रिपोर्ट पेश कर पाबंद किए जाने का अनुरोध किया था. सूची में जिन लोगों का नाम था उसमें से नीशू द्विवेदी पुत्र प्रेम नारायण, नन्हे अवस्थी पुत्र देवी शरण और कल्लू पुत्र नामवेद की मौत हो चुकी है. चौंकाने वाली बात यह है कि अदालत ने इस चालानी रिपोर्ट पर वाद संख्या-2266 पंजीकृत कर छह अक्टूबर को बिना परीक्षण किए सीआरपीसी की धारा-111 के तहत पाबंद करने का आदेश निर्गत कर सभी को 10 अक्टूबर को तलब भी कर लिया.

बड़े शिक्षा, मीडया और इवेंट ग्रुप द्वारा करवाया जारहा डांडिये का इवेंट ही गरबा है ? या फिर यह नवरात्रा के नाम पर कमाई का एक ज़रिया है जिसका स्वरुप दिनों दिन बिगड़ता जा रहा

उदयपुर। नवरात्रा क्यों मनाया जाता है ?
छोड़िये जाने दीजिये इसका जवाब १०० में से २ लोगों को ही मालूम होगा। ये बताइये नवरात्रा में गरबा क्यों खेला जाता है ? शायद इसका जवाब भी इक्का दुक्का ही दे पायेगें जबकि नवरात्रा में गरबा खेलने जाने का ही तो सबको इंतज़ार रहता है लेकिन फिर भी कभी इस के बारे में जानने की कोशिश नहीं कि।
नवरात्रा क्यों मनाया जाता है इसके बारे में दो कथाएं प्रचलित है एक महिसासुर के वध वाली और दूसरे भगवान् श्री राम द्वारा रावण से युद्ध के पहले नो दिन तक देवी की पूजा करने वाली। दोनों कथाओं को शास्त्रों में या गूगल पर पढ़ लीजिये।
अपन बात कर रहे है यहाँ पर गरबा कि जी हाँ देवी माँ को प्रसन्न करने वाले नृत्य गरबा की। जो बड़े श्रद्धा के साथ पारम्परिक तरीके से किया जाता है। जिसको अगर बहुत ही सरल भाषा में कहना चाहूँ तो एक मिट्टी के बर्तन में ‘जौ’ और ‘तिल’ की घास उगाई जाती है, इसे एक पटिये पर रख एक जगह स्थापित करते है, उसी बर्तन को गरबा कहा गया है। इसे किसी खुले स्थान में रखा जाता है साथ ही इसके साथ एक दीपक भी जलाया जाता है। इसके इर्द-गिर्द एक गोला बनाकर डांस किया जाता है। उसे गरबा डांस कहते है। हालाँकि ‘गरबा बर्तन’ बनाना गुजरात में ही देखने को मिलेगा। अन्य दूसरी जगह जहाँ गरबे किए जाते है वहाँ बीच में अम्बा माँ की तस्वीर या मूर्ति रख और दीपक जलाकर गरबा किया जाता है। स्थापित करने के दसवें दिन गरबा का विसर्जन किया जाता है।

लेकिन यही गरबा अब बदलते परिवेश में ना जाने कैसा रूप ले चुका है। पहले आया डांडिया रास जो भगवान् श्री कृष्ण से प्रेरित था लेकिन उसका रूप भी इतना बिगड़ा कि अब हर जगह जाने कोनसा रूप देखने को मिलता है। बड़े बड़े कॉर्पोरेट्स और मीडिया ग्रुप ने नवरात्रा के इस डांडिया रास को महज़ एक कमाई का जरिया बना दिया है। ४ से ९ दिन चलने वाला एक ऐसा बड़ा इवेंट बना दिया है जिसके बुते यह लाखों रूपये कमाते है। बड़े बड़े घरानों के लोग इसमें शिरकत करते है। कॉरपरेट घरानों से स्पोंसर्ड करवा कर जाने कैसा गरबा और जाने कैसा डांडिया करवाया जाता है। अगर आपको कोई एंटरटेनमेंट का इवेंट करना है तो जरूर करिये लेकिन कम से काम नवरात्रा में माता के नाम पर तो इस तरह का बाज़ारवाद मत फैलाइये। शनिवार को उदयपुर के करीब चार बड़े गरबा इवेंट में गया जो किसीक बड़े ग्रुप या किसी मीडिया ग्रुप द्वारा आयोजित किये जा रहे है जहाँ पर पूरी तरह से नवरात्रा और माता के नाम बाज़ारवाद फैला हुआ दिखाई दे रहा था। हर जगह एंट्री पास द्वारा की जारही थी। यह पास या तो ख़रीदे जा सकते है या फिर उस ग्रुप को आप किसी तरह ग्राहक के रूप में दिखे तो आपको उपलब्ध करवाया जाता हैं। इन गरबा इवेंट के अंदर का माहौल यहाँ पर लिखने जैसा नहीं है लेकिन जो भी है कम से कम वह नवरात्रा के गरबा जैसा तो बिलकुल भी नहीं है। भक्ति संगीत की जगह फूहड़ फ़िल्मी गाने है और उस पर मस्ती करते युवा खेर जाने दीजिये आप कभी जाइये देखिये और सोचिये की क्या सच में वही गरबा रास है जिसके द्वारा देवी माँ को प्रसन्न किया जा सकता है। मुझे लगता है यह बिलकुल भी नहीं। परिवर्तन ठीक है लेकिन परिवर्तन इस तरह का हो तो वह बिलकुल भी ठीक नहीं। चलिए सोचियेगा जरूर और हाँ गूगल पर यह जरूर सर्च करियेगा की नवरात्रा क्यों मनाया जाता है जानकारी रहेगी तो ठीक रहेगा भविष्य में अगर कोई पूछे तो उसका जवाब तो आप दे पायेगें।

डराने-धमकाने वाली और कड़वाहट से जकड़ी पार्टी बनती जा रही है बीजेपी

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सरकार के लिए पिछले कुछ हफ्ते अच्छे नहीं रहे हैं. हाल में इसके एक सीनियर मंत्री ने कहा कि 2014 में बीजेपी ने चुनाव जीतने के लिए जनता से झूठे वादे किए थे. यह साहब कुछ साल पहले पार्टी अध्यक्ष थे. पिछले कुछ हफ्तों में रफाल सौदे में अनिल अंबानी, आधार, धारा 377, सबरीमाला पर सुप्रीम कोर्ट के फैसलों, पेट्रोल-डीजल की ऊंची कीमतों, रुपए और शेयर बाजार में गिरावट और एक मंत्री पर सैक्सुअल हैरसमेंट के आरोप को लेकर भी सरकार को शर्मिंदगी उठानी पड़ी है.

गलतियों ने बीजेपी को दिया झटका

इसलिए केंद्र और बीजेपी दोनों बैकफुट पर हैं. इन मामलों से पार्टी की छवि पर तो दाग लगा ही है, उसकी नीतियों पर भी सवाल खड़े हुए हैं. अचानक इतनी गलतियों से सरकार की विश्वसनीयता को गहरा धक्का लगा है. विपक्ष मना रहा है कि 1989 में जिस तरह से बोफोर्स के चलते कांग्रेस की दुर्गति हुई थी, उसी तरह से आगामी चुनाव में रफाल विवाद से बीजेपी की मिट्टी पलीद हो जाए. विपक्ष के हौसले यूं ही बुलंद नहीं हैं.

यह तो बीजेपी के कट्टर समर्थक भी मानते हैं कि 2014 जैसा प्रदर्शन पार्टी 2019 में नहीं कर पाएगी. इसलिए अब बहस इस पर होने लगी है कि उसे 2019 में 272 (बहुमत के लिए जरूरी) से कितनी कम सीटें मिलेंगी. अगर स्थिति बहुत खराब रही तो उसे 272 से करीब 130 सीटें कम मिल सकती हैं. स्थिति बहुत अच्छी रही तो 50-60 सीटें कम. बेशक, राम मंदिर निर्माण से यह तस्वीर बदल सकती है. अगर कांग्रेस को 140-150 से अधिक सीटें नहीं मिलती है तो सबसे बुरी स्थिति में भी बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी होगी. इसलिए राष्ट्रपति उसे सरकार बनाने का न्योता देंगे.

ऐसे में यह सवाल पूछना बनता है कि सरकार चलाने को लेकर संघ परिवार ने क्या सबक सीखे हैं? क्या बड़े गठबंधन सरकार की मजबूरी से उन गलतियों से बचा जा सकता था, जो वह 2014 के बाद से कर रहा है? यह बहुत हद तक इस पर निर्भर करेगा कि बीजेपी 272 से कितनी पीछे रहती है. अगर वह बड़े अंतर से पीछे रहती है तो उसे ज्यादा सबक की जरूरत पड़ेगी.

क्या संघ टोनी ब्लेयर का रास्ता चुनेगा?

इस संदर्भ में परिवार के तीन अंग- आरएसएस, बीजेपी और प्रधानमंत्री की अहमियत अधिक है. अगर मोहन भागवत की लेक्चर सीरीज की मानें तो लगता है कि आरएसएस ने भारत के राजकाज के कुछ अहम सबक सीखे हैं. उन्होंने कहा कि आरएसएस वह करने को तैयार है, जो ब्रिटेन में टोनी ब्लेयर ने लेबर पार्टी के लिए किया था यानी वह अपनी बुनियादी विचारधारा की समीक्षा के लिए तैयार है. 1995 में ब्लेयर ने लेबर पार्टी की समाजवाद के प्रति प्रतिबद्धता को चार्टर से हटा दिया था और इससे जनता में उसकी लोकप्रियता बढ़ी थी.

क्या बीजेपी और प्रधानमंत्री भी ऐसा करेंगे? आज मोदी के 2019 में प्रधानमंत्री बने रहने पर सवालिया निशान लग रहा है. मान लेते हैं कि उनके नेतृत्व में ही पार्टी चुनाव लड़ेगी क्योंकि उन्हें हटाए जाने पर बीजेपी की सीटें और कम हो जाएंगी. आखिर मोदी ने पहले कार्यकाल में शासन को लेकर कौन से सबक सीखे हैं? उनके गवर्नेंस स्टाइल की दो चीजें खास हैं. पहला, उन्होंने सेवाओं की डिलीवरी पर ध्यान दिया क्योंकि उन्हें लगता है कि इससे अधिक वोट मिलेंगे. दूसरा, गवर्नेंस को पीएमओ (प्रधानमंत्री कार्यालय) से चलाया गया क्योंकि इससे उन्हें पूरे प्रोसेस को कंट्रोल करने में मदद मिलती है.

मोदी पीएम से ज्यादा एक सीईओ

इसलिए मोदी प्रधानमंत्री से ज्यादा एक सीईओ रहे हैं. उनका पहला दायित्व यह था कि वह लोगों को भरोसा दिलाएं कि सरकार उनकी विरोधी नहीं है. इस मामले में वह अटल बिहारी वाजपेयी के बजाय इंदिरा गांधी जैसे साबित हुए हैं. इसलिए उन्हें सीईओ के रोल को कम और प्रधानमंत्री की भूमिका को बढ़ाना होगा.

सत्ताधारी पार्टी की आज यह छवि बन गई है कि राजनीतिक और प्रशासनिक पावर की बात हो तो वह नैतिकता की परवाह नहीं करती. वह निरंकुश है. उसके तौर-तरीकों से लोग डर गए हैं. बीजेपी को समझना होगा कि डराने-धमकाने की राजनीति अच्छी नहीं होती. आपको लग सकता है कि अनुशासन पर जोर देना डराना-धमकाना नहीं है, लेकिन यह पहले मुर्गी आई कि अंडा जैसा सवाल है.

संसद और मंत्रालयों ने जो संस्थाएं बनाईं, भले ही आज वे लड़खड़ा रही हैं, लेकिन संवैधानिक शक्तियों के तहत जो संस्थाएं बनी हैं, उन्होंने सत्ता की मनमानी पर अंकुश लगा रखा है. बीजेपी में डराने-धमकाने यह संस्कृति नई है. अगर पार्टी नेतृत्व निरंकुश सत्ता के हक में नहीं है तो उसे इसे रोकना होगा.

बीजेपी को निराशावाद और कड़वाहट ने जकड़ा

पहले बीजेपी में उदारवादी सोच रखने वाले नेता भी मुखर रहते थे, लेकिन अब पार्टी को इंदिरा गांधी के निराशावाद के वायरस और कड़वाहट ने जकड़ लिया है. इसलिए बीजेपी को आज जनता से वैसे ही विरोध का सामना करना पड़ रहा है, जैसा 1977 में इंदिरा गांधी को करना पड़ा था. यह बुरी खबर है क्योंकि 2014 में पार्टी ने भले ही अपने दम पर बहुमत हासिल किया था, लेकिन उसे सिर्फ 31 पर्सेंट वोट ही मिले थे.

इसलिए विपक्ष अगर सिर्फ हिंदी भाषी राज्यों की सभी सीटों पर मिलकर बीजेपी के खिलाफ संयुक्त उम्मीदवार उतार दे तो हवा बदल सकती है. क्या ऐसा होगा? क्या विपक्ष ऐसा करेगा? दिसंबर में राजस्थान और मध्य प्रदेश के चुनावी नतीजे आने के बाद इस सवाल का जवाब मिलेगा.

अपराधी आज़म फिरौती और अवैध वसूली, धमकियों जैसे 50 से अधिक मामलों में था वांटेड – जानिये पुलिस ने कैसे और कहाँ से किया गिरफ्तार।

उदयपुर। पिछले चार साल से फरार ५० से अधिक मामलों में वांछित कुख्यात अपराधी आज़म खान को उदयपुर पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। शनिवार को प्रेस वार्ता के दौरान जिला पुलिस अधीक्षक कुंवर राष्ट्रदीप सिंह ने बताया की किस तरह से पुलिस की टीम की कड़ी मेहनत से कुख्यात अपराधी को पकड़ने में कामयाबी मिली। जिला पुलिस अधीक्षक ने बताया कि शहर में माह मई जून में हुई फायरिंग एवम् शहर के अन्य कई प्रकरणों में विगत लम्बे समय से वांछित आजम खान पुत्र सईद खांन मुसलमान निवासी चुडी घरों का मोहल्ला मुखर्जी चौक थाना धानमंडी की गिरफतारी हेतु एक टीम अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक(शहर) श्री पारस जैन एवम् अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक(मुख्यालय) श्री बृजेश सोनी के निर्देशन में वताधिकारी वत पर्व भगवत सिंह हिंगड के नेतृत्व में स्पेशल टास्क फोर्स प्रभारी गोरधन सिंह भाटी मय स्पेशल टीम एवम् थानाधिकारी थाना भुपालपुरा श्री हरेन्द्र सिंह सौदा की टीम गठित की उक्त गठित टीम द्वारा शहर में हुई लगातार फायरिंग के पश्चात सर्वप्रथम फायरिंग करने वाले अभियुक्त आदित्य उर्फ शुभम को गिरफतार किया। आदित्य से पूछताछ कर आजम खान के ठिकाने का पता लगाने का प्रयास किया तो सामने आया कि उक्त आजम खान लगातार एक जगह नहीं रूक कभी मुम्बई तो कभी अहमदाबाद तो कभी बडौदा,दिल्ली ईत्यादि जगह घूमता रहता है। इस हेतु उक्त टीम द्वारा संभावित सभी स्थानों पर लगातार पीछाकर निवास का पता लगाने की कोशिश की,तो सामने आया कि आजम खान ने आदित्य की गिरफतारी के पश्चात मुम्बई में अपना ठिकाना छोड़ दिया है। एवम् वर्तमान में अपना ठिकाना दिल्ली में कर रखा है। इसकी जानकारी होने पर उक्त टीम द्वारा तत्काल दिल्ली पहुँच आजम के सम्भावित स्थानो पर पता करते हुये उसे दबोचा। आजम को दिल्ली से उदयपुर लाकर थाना भुपालपुरा में प्रार्थी लोकेश तलेसरा निवासी दुर्गा नर्सरी रोड को पूर्व में रूपये ऐंठने की धमकी दी थी, उसी प्रकरण में। गिरफ्तार किया जिससे लगातार पुछताछ जारी है। थाना भुपालपुरा के अन्य दो प्रकरणो मे जिनमे एक प्रकरण में अभियुक्त सद्दाम नियारगर को पिस्टल देने मे एवम् दुसरे प्रकरण मे सम्पत मोची को प्रोपर्टी विवाद मे धमकी देने का दर्ज है। थाना भुपालपुरा से आजम खांन की गिरफतारी पर जिला पुलिस अधीक्षक कार्यालय से ईनाम भी घोषित हो रखा है। आजम सन् 2013-14 में लगभग डेढ वर्ष पुराने मामलो में केन्द्रीय कारागृह उदयपुर रहा था।

आज़म पर करीब 50 केस दर्ज़ है।
आजम की अक्टुम्बर 2014 मे जमानत होने के पश्चात उदयपुर छोड विगत 4 वर्षों से बाहर मुम्बई, गुजरात एवम् मध्य प्रदेश में जगह बदल बदल कर रह रहा था। आजम ने इस वर्ष माह मई 28 को सोहनपुरी पर प्रोपर्टी विवाद मे आदित्य के मार्फत रजिस्ट्री कार्यालय मे फायर करवाया था। इसी तरह जुन 04 को मधुबन मे प्रोपटी व्यवसायी के कार्यालय में जाकर आदित्य ने आजम के कहने पर फायर करने की कोशिश की थी ।इसी तरह दिनांक 7 जुन को सवीना स्थित कालुलाल जैन के ऑफीस पर आदित्य ने आजम के कहने पर ऑफीस के शीशे पर फायर कर दो खोखे की मांग की थी एवम् जुलाई 16 को आदित्य ने आजम के ही कहने पर बापु बाजार में कन्नू कुमावत पर फायरिंग की थी।इन प्रकरणो मे आदित्य, भीमा, पंकज को पुर्व में ही गिरफतार कर लिया था। आजम थाना अंबामाता में भी ईमरान कुंजडा के छोटे भाई मोहम्मद हुसैन पर हुई फायरिंग में षडयंत्र में भी वांछित है। इसी तरह थाना हिरणमगरी में अभियुक्त शज्जाद उर्फ चीनी को भी अवैध हथियार देशी पिस्टल देने के मामले में भी आजम वांछित है।। आजम ने पुर्व में प्रोपर्टी व्यवसायी प्यारेकिशन अग्रवाल, शांतीलाल जैन, प्रमोद छापरवाल और ईकराम कुरेशी को रूपयो के लिये धमकाया था एवम् मोतीलाल डांगी’ और ईकराम बाटी निवासी राजनगरपर रूपयो के लिये फायर किया था। उक्त सभी मामले में आजम

कुख्यात अपराधी आज़म खान को उदयपुर पुलिस ने किया गिरफ्तार – 50 मामलों में था वांटेड।

उदयपुर। उदयपुर की पुलिस ने एक अहम कार्रवाई को अंजाम देते हुए हार्डकोर कुख्यात अपराधी आजम को गिरफ्तार कर बड़ी सफलता हासिल की है। हिस्ट्रीशीटर आजम को पुलिस ने देहली में गिरफ्तार किया है। आजम खान चार साल पहले जेल से छूटा और तभी से फरार हो गया था। आजम पर अब तक 50 मामलों में वांछित चल रहा था और उदयपुर पुलिस को काफी दिनों से इसकी तलाश थी। हिस्ट्रीशीटर आजम को गिरफ्तार करने में एसटीएफ के थानाधिकारी गोर्वधन सिंह भाटी, भूपालपुरा थानाधिकारी हरेन्द्र सिंह सौदा, कांस्टेबल प्रहलाद पाटीदार, योगेश और सलीम की मुख्य भूमिका रही है। आपको बता दे की कुख्यात अपराधी आजम खां सोराहबुद्दीन एनकाउंटर मामले में मुख्य गवाह भी है। दो माह पूर्व सूचना पर उदयपुर पुलिस मुम्बई स्थित ठिकाणे पर दबिश दी, लेकिन षातिर अपराधी आजम मौका पाकर फरार हो गया। वहीं गिरफ्तारी के डर से आजम पिछली कई पेशियों पर मुम्बई सीबीआई स्पेशल कोर्ट भी नहीं पंहुचा था। जहां सोहराबुद्दीन तुलसी एनकाउण्टर केस की सुनवाई चल रही है। आजम ने कोर्ट से किसी भी दिन आकर बयान देने की अनुमति का निवेदन भी किया था, जो कोर्ट ने खारिज कर दिया था। ऐसे में अब तक आजम के कोर्ट में बयान नहीं हुए थे। पुलिस ने शनिवार को आजम खान को दिल्ली से गिरफ्तार कर लिया, जहां शाम को जिला पुलिस अधीक्षक कुंवर राष्ट्र्दीप ने प्रेसवार्ता पूरी जानकारी दी। आपको बता दे कि आजम के गुर्गों ने शहर में लम्बे समय से दशहत फैलाने और फिरौती मांगने के लिए कई नामी लोगों पर फायरिंग की वारदात को अंजाम भी दिया था।

राजस्थान में “जीका” वायरस बना हुआ है जी का जंजाल .

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उदयपुर। राजस्थान जहां पहले स्वाइन फ्लू, डेंगू और मलेरिया में नंबर वन था वहीं अब zika virus पीडितों के मामलों में भी नंबर वन आ गया है। जीका का पहला केस जयपुर के शास्त्री नगर में आया जरूर था लेकिन अब zika virus पूरे जयपुर शहर अपने पैर पसार चुका है। वहीं विभाग अब भी शास्त्री नगर में घर घर सर्वे कर लार्वा को नष्ठ कर जीका वायरस की स्थिति नियंत्रण में होने की बात कह कर अपनी पीठ थपथपा रहा है। शुक्रवार को जीका वायरस ने नहरी का नाका, बैनाड रोड,न्यू सांगानेर रोड स्थित क्षेत्र में दस्तक दे दी है और अब जीका धीरे धीरे पूरे शहर को अपनी गिरफ्त में ले रहा है। वहीं स्वाइन फ्लू,डेंगू और अब जीका के मामलों में राजस्थान पूरे देश में नंबर वन पर आ गया है।
जीका वायरस अब जयपुर के शास्त्री नगर से निकल कर अन्य क्षेत्रों में भी अपनी दस्तक देता है। विभाग के अफसरों का कहना है कि वायरस का फैलाव धीरे धीरे अब पूरे शहर में फैल रहा है। वायरस शास्त्री नगर से कई किलोमीटर दूर न्यू सांगानेर रोड और बैनाड रोड तक भी पहुंच गया है। वायरस के फैलाव को देखते हुए शहर के वाशिंदों में भय व्याप्त हो गया है। शुक्रवार को राजधानी जयपुर में 10 नए मामले जीका वायरस के सामने आए। इनमें से 5 मामले शास्त्री नगर के थे और 5 मामले इन बाहरी क्षेत्रों में थे।
चूंकि जीका वायरस की पहचान करना बेहद ही मुश्किल है। संक्रमित व्यक्ति पूरी तरह स्वस्थ दिखता है और उसे शुरूआत में हल्का सा बुखार रहता है। विभाग के अफसरों का कहना है कि संक्रमित व्यक्ति बाहरी इलाकों में भी जा रहे हैं और जीका का वायरस डेंगू में मच्छर के जरिए अन्य लोगों को भी अपना निशाना बना रहा है।
हर बीमारी में राजस्थान नंबर वन : देश में राजस्थान स्वाइन फ्लू के पॉजिटिव मामले और मौंत के मामले में नंबर वन है। वहीं डेंगू के मामलों में भी अब तक नंबर वन चल रहा है। अब जीका वायरस के मामलों में भी राजस्थान नंबर वन पर है।
जब शास्त्री नगर में जीका वायरस का पहला मामला सामने आया तो विभाग इस मामले को दबा गया। क्षेत्र में जब जीका वायरस के मरीजों की सुनामी आई तो दस दिन बाद अफसर क्षेत्र में पहुंचे। लेकिन अफसरों ने वायरस को नियंत्रण करने से ज्यादा विभाग के संसाधन मामलों में दबाने में लगाए।