ख़त्म नहीं हुई है सलमान की कहानी..

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सलमान ख़ान में मुझे तीन आदमी नज़र आते हैं या आज की ज़ुबान में कहें तो तीन कैमियो का मिश्रण.
वह बिना किसी जतन के ब्लॉकबस्टर फ़िल्में देते हैं. ऐसा लगता है कि लोग उन्हें चाहते हैं और आलोचक तक उनकी सफलता में कमी निकालने में असहाय महसूस करते हैं.
अमिताभ बच्चन या नसीरुद्दीन शाह अभिनय कर सकते हैं, जबकि सलमान जो हैं उसी के लिए जाने जाते हैं.
वो अपनी सहजता में उतने ही पूरे दिखते हैं, जितना रहमान या इल्लै राजा अपनी प्रतिभा के साथ. फिर भी वो सफल हैं.

धर्माचार्य बने पत्रकार
एक दूसरे सलमान हैं: टीवी कार्यक्रम ‘बिग बॉस’ वाले सलमान. वो बड़े भाई की भूमिका निभाते हैं, जो समझदार है और कॉमन सेंस वाला होस्ट है और उनकी मौजूदगी से ही कार्यक्रम चल जाता है.
इसमें ज़्यादातर अभिनेता दूसरे दर्जे के हैं जो पहले दर्जे का होना चाहते हैं या ऐसा जताते हैं. सलमान दूसरे दर्जे के हैं और ऐसे ही रहकर ख़ुश हैं.
तीसरे सलमान वो खुद हैं: एक प्यारा आदमी जो एक चैरिटी चलाता है, अर्जुन कपूर को कई किलो वजन कम कर स्टार बनने के लिए मनाता है और एक ऐसा आदमी जो अब भी इंसान है, जिसकी सीमाएं हैं.
बुधवार को सलमान पर आए फ़ैसले से बॉलीवुड और मीडिया बावला सा हो गया और हर छोटा-मोटा वकील और पत्रकार धर्माचार्य की तरह उपदेश देने लगा.
पीड़ित के परिवार की प्रतिक्रिया यह थी कि, न्याय तो ठीक है, लेकिन मुआवज़ा मिलता तो बेहतर रहता. एक स्तर पर तो फ़ैसले के साथ मामला शांत हो गया, लेकिन दूसरी ओर इससे नई मुश्किलों का पिटारा खुलने की आशंका है.
क़ानून पर कोई सवाल नहीं उठा रहा है, लेकिन लगता है कि फ़ैसले से कुछ लोग संतुष्ट नहीं हैं. ऐसा लग रहा है कि जैसे यह कहानी ठीक तरीक़े से आगे नहीं बढ़ पाई.

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महज़ स्टार नहीं
पहली समस्या तो मामले के इतना लंबा चलने से है. अगर राजनीति में एक हफ़्ता लंबा समय है तो क़ानूनी मामलों में एक दशक अनंतकाल जैसा है.
मैं मानता हूं कि इसमें थोड़ा पाखंड है. मुझे नहीं लगता कि फ़ुटपाथ पर जीने और मरने वाले पीड़ित और उसके परिवार के बारे में किसी ने थोड़ी देर को सोचा भी होगा.
अब जब इंसाफ़ हो चुका है, सलमान न सिर्फ़ ख़बरों में हैं बल्कि चिंता भी उन्हीं की जा रही है.
आप उन्हें एक अमीर बिगड़ा हुआ स्टार कहकर ख़ारिज़ नहीं कर सकते, जो अपनी लंबी ‘जवानी’ के बावजूद पचास के क़रीब पहुंचता जा रहा है.
वो एक परिपक्व आदमी हैं और उन्हें अपनी ज़िंदगी को लेकर कुछ पछतावा तो ज़रूर ही होगा. ज़ेल से उनका करियर मोटे तौर पर ख़त्म ही हो जाएगा. पांच साल में वह बॉलीवुड की याद बनकर रह जाएंगे, जिनकी जगह स्क्रीन का कोई अन्य कम चमकदार पहलवान ले लेगा.
आपको अहसास होता है कि वर्ग विश्लेषण से कुछ नहीं होगा. लोग उनके चाहने वाले हैं. कई बार तो उन लोगों को भी उनमें कुछ दमदार नज़र आता है जो मानते हैं कि वो एक ख़राब अभिनेता हैं.
ऐसा लगता है कि एक दशक लंबी चली सुनवाई के दौरान वो कुछ परिपक्व हुए हैं और लोगों में भी उनके प्रति प्रेम बढ़ा है. अगर दुर्घटना के कुछ ही महीनों के अंदर मुक़दमा चलता और फ़ैसला होता तो सलमान के लिए रोने वाले काफ़ी कम होते.
तब वह सिर्फ़ एक स्टार होते न कि जनता के बीच के एक लेजेंड, जो कि वो अब हैं.

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भुलाए नहीं जाएंगे
मैं ज़रा एक ऐसी बात बताऊं जिसमें बॉलीवुड के रंग तो हैं ही, लेकिन यह उससे कहीं बढ़कर है. यह नैतिक मरम्मत (ethical repair) का विचार है.
नैतिक मरम्मत एक ऐसी क्रिया है जिसमें अपराधी अपने अपराध का पश्चाताप करता है और उस परिवार के लिए कुछ करता है जिसका उसने नुक़्सान किया है.
मैं ख़ैरात की नहीं बल्कि असली योगदान की बात कर रहा हूँ जिसमें दरअसल सलमान फुटपाथ पर रहने वालों के लिए कुछ करते हैं, समाजसेवा के लिए नहीं बल्कि सचमुच इंसानियत के नाते, वंचित समुदाय के लिए.
यह एक ऐसी शहरी घटना है जिस पर बॉलीवुड की कई पटकथाएं आधारित रही हैं. मुझे लगता है कि सलमान ख़ान में कुछ है जो इसके काबिल है
मुझे उम्मीद है कि यह कोई ऐसी पटकथा नहीं बनेगी जिसे उनके प्रशंसकों पर बम की तरह फेंका जाएगा.
लेकिन मुझे लगता है कि सलमान खान की कहानी अभी ख़त्म नहीं होने जा रही. वो हमारे अंदर इस क़दर हिस्से बन चुके हैं कि उन्हें आसानी से नहीं भुलाया जा सकता.

मुफ़्ती हूं, चरमपंथी नहीं: मुफ़्ती क़य्यूम

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गुजरात के अक्षरधाम मंदिर पर हुए चरमपंथी हमले के आरोप में 11 सालों तक जेल में रहने के बाद मुफ़्ती अब्दुल क़य्यूम पिछले साल रिहा हुए.
सुप्रीम कोर्ट से बाइज़्ज़्त बरी होने वाले मुफ़्ती अब्दुल क़य्यूम का कहना है कि इन 11 सालों में एक मौक़ा ऐसा भी आया जब उनकी पत्नी ने आत्महत्या करने की कोशिश की थी.
मुफ़्ती क़य्यूम के अनुसार इन सब के बावजूद भारत की न्यायपालिका पर उनका यक़ीन कभी कम नहीं हुआ और उन्हें पूरा भरोसा था कि उन्हें अदालत से रिहाई मिल जाएगी.
सुनें मुफ़्ती अब्दुल क़य्यूम से पूरी बातचीत
दिल्ली में मुफ़्ती क़य्यूम की लिखी किताब ’11 साल सलाख़ों के पीछे’ का विमोचन हुआ.
बीबीसी संवाददाता इक़बाल अहमद ने इस मौक़े पर मुफ़्ती क़य्यूम से बात की.
क़य्यूम ने जो कहा

अगर मेरी इस किताब के बाद कोई एक आदमी भी ज़ुल्म से बच जाएगा तो मुझे सबकुछ मिल गया.
मुझे अल्लाह पर हमेशा ही यकीन और ईमान था. सुप्रीम कोर्ट पर भी मुझे भरोसा था. इसलिए मैंने पहले से ही कई चीज़ें नोट करके रखी थीं.
हालांकि कई ऐसे मौक़े आए जब ऐसा लगता था कि मुझे मार दिया जाएगा. जैसे एक बार मुझे ‘एनकाउंटर’ के लिए ले गए.
‘देश के क़ानून के भरोसे रहा जेल में ज़िंदा’
इस केस के बारे में आपको एक अजीब बात बताऊँ कि अभियोजन पक्ष के पास सत्ता है, ताक़त है लेकिन उनका सारा केस गड्डमड्ड है…
उन्होंने बार-बार लिखा है…उसके कुछ दिनों बाद…उसके कुछ दिनों बाद. कहीं किसी तारीख वगैरह का कोई ज़िक्र नहीं है. लेकिन मैंने सारी बातें तारीख के साथ लिखी हैं.
तीन महीने में लिखी क़िताब
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मैंने सारी चीज़ें ख़ासकर तारीखें दिमाग़ में बैठाए रखीं कि अगर मैं रिहा हो गया तो मैं लिखूँगा. और मेरा एक ही मक़सद था कि आइंदा किसी के साथ ऐसा जुल्म या अन्याय न हो.
मैंने 2-3 महीने में किताब पूरी कर ली थी. लेकिन इसके बाद उसमें सुधार होता रहा. अब भी कुछ ग़लतियाँ रह गई हैं लेकिन हम उसे अगले संस्करण में सही कर लेंगे.
सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का मैंने गुजराती में अनुवाद किया है. वकील इरशाद हनीफ़ ने इसका उर्दू अनुवाद किया है.
जहां तक पुलिस और प्रशासन का अनुभव है, मेरे साथ जानवरों जैसा मेंटल टॉर्चर किया गया. मेरी पत्नी ने खुदकुशी की कोशिश की, मैंने भी कई बार आत्महत्या के बारे में सोचा.
हिंदू ग़रीब

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सौराष्ट्र का एक ग़रीब हिंदू कैदी था, जिसे साढ़े छह सौ ग्राम अनाज चोरी करने को लेकर उसे 10 साल की सज़ा दी गई और उसके पास इतने पैसे नहीं हैं कि वो हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट से इंसाफ़ मांग ले और बरी हो जाए.
गुजरात में एक आदिवासी को सिर्फ पचास रुपए की लूट के लिए 38 साल तक ज़ेल में रहना पड़ा था.
इस अन्याय का शिकार तो केवल मुसलमान ही नहीं बल्कि गैर मुस्लिम भी हैं.
मेरे केस में तो सुप्रीम कोर्ट ने गृह सचिव और सरकार को फटकार भी लगाई है और मैं समझता हूं कि यह जजमेंट एक मिसाल बनने वाला है.
हमने पहले भी कोई ग़लत काम नहीं किया था. हम तो गोधरा कांड के बाद उजड़े हुए मुसलमानों को मदद पहुंचाने और सहारा देने का काम कर रहे थे.
उस दौरान भी हमने कोई ग़लत काम नहीं किया और आगे भी नहीं करेंगे.
हम क़ानून के दायरे में रहकर अपने हक़ की लड़ाई लड़ेंगे.

कानून के कद्रदान – गुलाब चंद कटारिया

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gulab-chand-katariyaमंत्री हो तो राजस्थान के गृहमंत्री गुलाब चंद कटारिया जैसे जो बोलते हैं तो बड़ी बेबाकी से। बोलते समय विरोधी तो विरोधी, अपनों को भी नहीं बख्शते।
जयपुर में एक सरकारी समारोह में बोले कि जो नियमों का उल्लंघन करे उसे उल्टा लटका दो। कटारिया ये भी बोले कि हमारे यहां रिश्वत देकर बेकार गाड़ी का प्रमाणपत्र भी आसानी से बन जाता है। लोगों का दिल-दिमाग ठीक करने के लिए कानून का डंडा भी जरूरी है।
कटारिया जो कुछ बोले, दिल से बोले। बात सोलह आने सच है कि कानून तोड़ने वाले को उल्टा लटका दो। वो तो सुधर ही जाएगा, उसका हश्र देखकर दूसरे भी तौबा कर लेंगे लेकिन अच्छा होता गृहमंत्री ये भी बता देते कि कानून तोड़ने वालों को उल्टा लटकाएगा कौन? रिश्वत देकर फर्जी फिटनेस प्रमाणपत्र बनवाने वालों को रोकेगा कौन? सस्ती वाहवाही लूटने के लिए भाषण देना जितना आसान है, कहे को करके दिखाना उतना ही मुश्किल।
ये बात कटारिया या राजस्थान तक सीमित नहीं है बल्कि हर राज्य में ऐसे नेता मिल जाएंगे जो व्यवस्था को सुधारने के लिए न जाने क्या-क्या बोल जाते हैं।
बीते कुछ सालों के उदाहरणों पर नजर डाली जाए तो साफ हो जाता है कि देश में कानून तोड़ने वालों में नेता-अफसर सबसे आगे रहते हैं।
भ्रष्टाचार-घोटाले हों तो नेता-अफसरों के ही नाम सामने आते हैं। सांसद-विधायक अपने सरकारी आवास किराए पर उठाते हुए मिल जाते हैं तो पैसे लेकर सवाल पूछने में भी ये पीछे नहीं रहते। देश में कानून तोड़ने वालों को सबक सिखाना जरूरी है लेकिन सिर्फ भाषणों से नहीं। इसके लिए कुछ विशेष करने की जरूरत नहीं सिर्फ कानून की पालना ही पर्याप्त होगी।
भाषणों में आदर्श और नैतिकता की बातें करने वाले यही नेता कानून तोड़ने वालों के बचाव में खड़े नजर आ जाते हैं। हमारी परेशानी ये है कि राजनेता हर काम राजनीतिक तराजू में रखकर तौलते हैं। हर राजनीतिक दल कहे कुछ भी लेकिन हकीकत यही है कि सत्ता में आते ही अपने उन कार्यकर्ताओं से मुकदमे हटाने का काम करता है जिन्होंने विपक्ष में रहते कानून तोड़ने का काम किया था। जाहिर है इससे पुलिस और प्रशासन में संदेश अच्छा नहीं जाता।
देश में कानून का राज लागू करना मुश्किल नहीं लेकिन जरूरत हौसला दिखाने की और जरूरत पड़ने पर झूठ को झूठ कहने का साहस दिखाने की भी। अपने-अपनों को बचाने के फेर में कानून की रोज धज्जियां उड़ती हैं। कानून की पालना के मामले पर राजनीतिक दल एक हो जाएं तो राजस्थान के गृहमंत्री का सपना जरूर पूरा हो सकता है लेकिन ऐसा होगा इसकी उम्मीद शायद ही किसी को हो।
देश में कानून का राज लागू करना कतई मुश्किल नहीं लेकिन जरूरत हौसला दिखाने की और जरूरत पड़ने पर झूठ को झूठ कहने का साहस दिखाने की भी है।

दही कब खाएं, कब न खाएं?

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curd-for-hair-and-skinअक्सर लोगों के मन में यह दुविधा रहती है कि दही किस मौसम में खाएं, कब खाएं और किस रोग में न खाएं। आयुर्वेद की चरक संहिता में दही के लिए दधी: कल्पतरू लिखा गया है यानी दही खाना कल्पतरू के समान है जिससे शरीर के सारे रोग नष्ट हो जाते हैं। दही खाते समय इन बातों का ध्यान रखें।
इस मौसम में खाएं
आयुर्वेद विशेषज्ञ वैद्य पदम जैन के अनुसार हालांकि आम धारणा बारिश के मौसम में दही को नहीं खाने की है लेकिन 16वीं शताब्दी के वनौषधि ग्रंथ भावप्रकाश में दही को बारिश और गर्मी में खाना उपयोगी बताया गया है। सर्दी में खाने की मनाही है। दही ठंडा व भारी होता है इसलिए शीत ऋतु में खाने से मांसपेशियों व नसों में रुकावट आकर नर्व सिस्टम व चेतना कमजोर होने लगती है जिससे व्यक्ति में थकान, निद्रा और आलस जैसे लक्षण होने लगते हैं।
डिनर में न लें
आयुर्वेद विशेषज्ञ डॉ. रमाकांत शर्मा के अनुसार दोपहर में 2-3 बजे से पहले दही खाना लाभकारी है। डिनर में लेने से यह फेफड़ों में संक्रमण, खांसी-जुकाम के अलावा जोड़ों की तकलीफ बढ़ाता है।

इन रोगों में लाभकारी
इसे खाली पेट सुबह के समय खाने से अल्सर, एसिडिटी, हाथ-पैरों के दर्द, नेत्र जलन व आंतों के रोगों में आराम मिलता है। एक समय में 250 ग्राम दही खाया जा सकता है।
ऐसे करें प्रयोग
जिन्हें शरीर में कमजोरी, वजन न बढऩे, अपच या भूख न लगने की समस्या हो उन्हें भोजन के बाद एक कटोरी मीठा दही खाना चाहिए। दही को दूध व दूध से बनी चीजों के साथ न खाएं वर्ना अपच की समस्या हो सकती है।

रेलवे में निकली वैकेंसी

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job-in-railway-जयपुर। रेलवे रिक्रूटमेंट सेल और साउथ वेस्टर्न रेलवे, हुबली ने टिकट असिस्टेंट स्टेशन मास्टर के लिए वैकेंसी निकाली है।
31 मई तक आवेदन करने की अंतिम तिथि है। ये वैकेंसी साउथ-वेस्टर्न रेलवे में रेगूलर काम कर रहे कर्मचारियों के लिए हैं।
पद का नाम
असिस्टेंट स्टेशन मास्टर
पदों की संख्या: 118
पे स्केल: 5200-20200; (GP-2800) रुपये
उम्र सीमा: जनरल 42 साल, ओबीसी 45 साल, एससी/एसटी 47 साल
योग्यता: किसी भी मान्यता प्राप्त यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएट और रेल परिवहन और प्रबंधन में डिप्लोमा.

क्रिकेट अकादमी की जमीन पर बनेगा स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स

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sport-complax-उदयपुर. महाराणा प्रताप खेलगांव में क्रिकेट स्टेडियम और क्रिकेट अकादमी स्थापित करने के लिए राजस्थान क्रिकेट एसोसिएशन (आरसीए) को दी गई 9.67 हैक्टेयर जमीन पर पांच वर्षों में भी काम शुरू नहीं होने पर अब यूआईटी अकादमी के लिए दी गई भूमि का 3.5 हैक्टेयर हिस्सा वापस लेने के मानस में है।
यह भूमि लेकर वहां 14 करोड़ रुपए की लागत से स्पोट्र्स कॉम्प्लेक्स बनाने की योजना बनाई जा रही है।
यूआईटी ने क्रिकेट स्टेडियम और वहां अकादमी के लिए वर्ष 2010 में आरसीए को 9.67 हैक्टेयर जमीन दे दी थी।
आरसीए में सियासी घमासान चलता रहा। इसके कारण न पिछली सरकार के कार्यकाल में स्टेडियम विकसित हो सका और न ही मौजूदा सरकार कार्य करवा सकी है।
इसके लिए यूआईटी नोटिस देकर आरसीए को चेता चुकी है। स्पोट्र्स कॉम्प्लेक्स के अलावा खेलगांव में टेनिस, बास्केटबॉल, खो-खो, कबड्डी, हैंडबॉल, तरणताल, क्रिकेट स्टेडियम आदि खेल सुविधाएं विकसित की जा चुकी हैं। बस क्रिकेट का पाया ही कमजोर नजर आ रहा है।
अध्यक्ष से चर्चा, बना मानस
सरकार ने हाल ही उदयपुर में स्पोट्र्स कॉम्प्लेक्स विकसित करने के लिए 14 करोड़ रुपए का बजट पारित कर राशि भी दे दी है।
प्रशासन की मदद से यूआईटी ने खेल गांव के पास जमीन तलाशी। इस दौरान अकादमी के लिए आवंटित भूमि आरसीए से वापस लेने की जरूरत जताई गई। इस पर स्पोट्र्स कॉम्प्लेक्स विकसित करने की शुरुआती योजना बनाई गई है।
यह योजनाजिला कलक्टर एवं यूआईटी अध्यक्ष रोहित गुप्ता के सामने पेश की गई।
अध्यक्ष गुप्ता से चर्चा के बाद हाथोंहाथ यूआईटी और खेल विभाग के अधिकारियों ने बैठक कर स्पोट्र्स कॉम्प्लेक्स के लिए दी जाने वाली सुविधाओं और इसके लिए आरसीए से जमीन लेने की तैयारियों के मद्देनजर आवश्यक रिपोर्ट बनाई।
लगभग डेढ़ घंटे चली बैठक में दोनों एजेंसियों के अधिकारियों ने रिपोर्ट के प्रारूप को अंतिम रूप दिया। अब आरसीए को भूमि वापस लेने का पत्र भेजा जाएगा।

फेसबुक ने लांच किया एक नया एप, जानें खासियत

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facebook21-55277a6492ad6_lअगर आपको कोई अननॉन नबंर से कॉल कर रहा है तो परेशान होने की जरूरत नहीं है। अब फेसबुक नया कॉलर आइडी-टाइप ऐप एंड्रायड यूजर्स के लिए लेकर आया है।
हैलो नाम का यह एप फेसबुक से डाटा का इस्तेमाल करके बताता है कि कौन कॉल कर रहा है और अनवांटेड कॉल्स को ब्लॉक करने में मदद करता है। यह एप फेसबुक प्रोफाइल से इनकमिंग और आउटगोइंग कॉल्स के फोन नंबर्स मैच करता है।
आपको बता दें कि यह फीचर केवल तभी काम करता है जब कॉलर ने अपना नंबर फेसबुक के साथ शेयर किया हो। एप को गूगल प्ले स्टोर से फ्री में डाउनलोड किया जा सकता है।
डाउनलोड करने के बाद आपको फेसबुक से साइन-इन कर परमिशन देनी होती है। यह एप आपको खास नबंर्स को ब्लॉक करने की सुविधा भी देता है।

मौत की सूचना पर मिलेगा 200 रु. का टॉक टाइम

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mobile-recharge-Udaipur.यह सुनने में थोड़ा अजीब भले ही लगे लेकिन यह सच है। मौत की सूचना देने पर सरकार अब 200 रुपए का मोबाइल टॉक टाइम देगी। सरकार इस योजना को अंतिम रूप देने में लगी हुई है।
ऐसी प्रसूताएं जिनकी मौत शिशु के जन्म देने के बाद हो जाती है। उन प्रसूताओं के नाम और पते की सूचना चिकित्सा विभाग के अधिकारियों के मोबाइल पर देना होगा। सूचना सहीं हुई तो जिस नंबर से कॉल आया है, सरकार उस मोबाइल नंबर पर 24 घंटे के भीतर 200 रुपए का रिचार्ज करवाएगी।
इसके लिए बीते सप्ताह राज्य स्तरीय विभागीय अधिकारियों की बैठक भी हो चुकी है। बैठक में वीडियो कांफ्रेसिंग के जरिए सभी आरसीएचओ और सीएमएचओ को योजना के बारे में जानकारी दी गई।
क्यों लाई गई योजना
सरकार का मानना है कि चिकित्सा विभाग को मातृ मृत्युदर की सही सूचना नहीं मिल पाती है।
दूर-दराज के इलाकों में कई प्रसूताओं की मौत की सूचना रिकार्ड में दर्ज नहीं हो पाती है। ऐसे में प्रसूताओं की मौत के सही आंकड़े सामने नहीं आ पाते हैं। वहीं सरकार का यह मानना है कि इस योजना से प्रसूता के मौत के कारणों का विश्लेषण भी किया जा सकेगा।
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छात्रा से दुर्व्यवहार मामले में असिस्टेंट प्रोफेसर रईस को चार्जशीट देने की तैयारी

charge sheetउदयपुर. शोध छात्रा से दुर्व्यवहार, अभद्र भाषा का उपयोग करने के मामले में असिस्टेंट प्रोफेसर रईस अहमद को सुखाड़िया विश्वविद्यालय प्रशासन ने चार्जशीट देने की तैयारी कर ली है। बीते दिनों 16 सीसी नोटिस दिया गया था। इधर, पुलिस में दर्ज मामले में पीड़िता के बयान मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज होंगे।

ऑडियो वायरल होने के बाद यूनिवर्सिटी की इंटरनल कंप्लेंट कमेटी ने बयानों की रिपोर्ट कुलपति को सौंपी थी। उसके आधार पर रईस अहमद को 16 सीसी का नोटिस दिया गया था। रिपोर्ट और शोधार्थी छात्रा के आरोपों के आधार पर चार्जशीट तैयार हो रही है। बताया गया कि यूनिवर्सिटी प्रशासन अब अगले एक दो दिन में आरोपी असिस्टेंट प्रोफेसर काे चार्जशीट देगी। जांच में इन आरोपों को सिद्ध करते हुए साक्ष्य जुटाए जाएंगे। इधर, प्रतापनगर थाना पुलिस भी रईस अहमद पर लगे आरोपों में जांच कर रही है। इधर, पीड़िता के बयान मजिस्ट्रेट के सामने होंगे जिसके लिए उसे सम्मन भेजा गया है।

आरपीएस दिव्या और भाई पर जमीन हथियाने का आरोप

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land_grab_polyp_cartoon_-_no_borderइस्माइलपुरपिचानवां के लोगों ने आरपीएस अधिकारी दिव्या मित्तल उनके भाई विशाल के खिलाफ एसडीएम को शिकायत की है। इसमें दिव्या पर अपने भाई को शह देकर बेवा महिला और उसके विकलांग बेटे की जमीन पर कब्जा करवाने का आरोप है। दिव्या उदयपुर जीआरपी में डीवायएसपी हैं। उन्होंने ग्रामीणों के लगाए आरोपों को खारिज किया है।

इस्माइलपुर-पिचानवां की बेवा फूलीदेवी ने चिड़ावा थाने में आरपीएस दिव्या मित्तल के भाई विशाल किढ़वाना के जयसिंह सहित पांच-छह लोगों के खिलाफ जमीन पर कब्जा करने का आरोप लगाते हुए बुधवार को मुकदमा दर्ज कराया। रिपोर्ट के अनुसार खेतड़ी रोड पर बामनवास मोड़ स्थित उनकी जमीन पर विशाल उसके साथी दीवार बना रहे हैं। फूलीदेवी ने उन्हें रोका तो आरोपियों ने मारपीट की। इधर, बुधवार को ही अखिल भारतीय किसान सभा के तहसील अध्यक्ष बजरंगलाल बराला के नेतृत्व में ग्रामीण एसडीएम दफ्तर पहुंचे। उन्होंने मामले में निष्पक्ष जांच करते हुए दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है। कार्रवाई नहीं होने पर आंदोलन की चेतावनी भी दी। ज्ञापन देने वालों में हरपाल, धर्मवीर, प्रतापसिंह, सतपाल, राकेश, राजवीर, नानड़राम, सुनील, राजकुमार, उम्मेदसिंह, गुरुदयाल, विनोदकुमार, रणवीरसिंह और रोहिताश्व आदि शामिल थे। गौरतलब है कि इससे पहले आरपीएस दिव्या मित्तल ने भी मंगलवार को अपने भाई के साथ घर में घुसकर मारपीट का मुकदमा चिड़ावा थाने में पांच-सात लोगों के खिलाफ दर्ज कराया था।