जब बहू बेटी बन जाए और सास माँ, तो कैंसर जैसी बड़ी बीमारी भी हार मान लेती है

परिवार में किसी को कैंसर का पता चलता है, तो एक पल के लिए पूरी दुनिया जैसे थम जाती है। मन में अनगिनत सवाल और एक गहरा होता है । लेकिन अपनों का साथ और सही समय पर सही इलाज हो, तो बड़ी से बड़ी जंग जीती जा सकती है।

घर में अक्सर बड़ी-बुजुर्ग महिलाएँ अपनी तकलीफ छुपाने की आदी होती हैं। प्रमिलाबेन के साथ भी यही हो रहा था। “अरे बहू, अब इस उम्र में थोड़ा कम खा लिया तो क्या हो गया? थोड़ी बहुत थकान तो बनी ही रहती है, तू बेकार में परेशान होती है।” जब भी उनकी बहू रश्मि उनके गिरते स्वास्थ्य को लेकर चिंता जताती, प्रमिलाबेन मुस्कुराकर बात टाल देतीं।

लेकिन रश्मि सिर्फ घर की बहू नहीं थी, अपनी सास के लिए एक बेटी जैसी थी। उसने ध्यान दिया कि पिछले कुछ हफ़्तों में माँ जी की भूख लगभग खत्म हो चुकी थी, उनका वजन तेजी से गिर रहा था और पेट के दाहिने हिस्से में मीठा-मीठा दर्द रहने लगा था। रश्मि ने समझ लिया कि यह सिर्फ उम्र का तकाज़ा नहीं है।

जब दर्द थोड़ा बढ़ा, तो रश्मि ने बिना कोई देर किए अपने पति से बात की और सास को डॉक्टर के पास ले गई। शुरुआती जांच के बाद फिजिशियन ने उन्हें तुरंत कैंसर विशेषज्ञ के पास भेजा, जहाँ उन्हें केडी कैंसर सेंटर के डॉ. सोमेश चंद्रा और डॉ. कुश शाह से सलाह लेने की बात कही गई।

अस्पताल के उस माहौल में प्रमिलाबेन बेहद डरी हुई थीं। जब डॉक्टरों ने स्थिति को समझते हुए बायोप्सी कराने का सुझाव दिया, तो उनकी आँखों में आँसू आ गए।

यह देखकर डॉ. कुश ने उनका हाथ थामते हुए कहा, “प्रमिलाबेन, आप बिल्कुल मत घबराइए। बायोप्सी सिर्फ सही बीमारी की पहचान के लिए है। अभी कुछ भी देर नहीं हुई है, हम सब आपके साथ हैं।” पास खड़ी रश्मि ने अपनी सास को गले से लगाते हुए धीरे से कहा, “माँ जी, जब तक मैं आपके साथ हूँ, आपको चिंता करने की बिल्कुल ज़रूरत नहीं है। हम मिलकर इसका सामना करेंगे।”

दो दिन बाद जब बायोप्सी रिपोर्ट आई, तो पता चला कि यह लिवर कैंसर (हेपेटोसेल्यूलर कार्सिनोमा) है। डॉक्टर सोमेश ने परिवार को हिम्मत बंधाते हुए समझाया कि बीमारी अभी शुरुआती चरण में है और सर्जरी के जरिए इसे पूरी तरह ठीक किया जा सकता है।

जांच के बाद सर्जिकल टीम ने मिनिमली इनवेसिव तकनीक से ‘लिवर रिसेक्शन’ किया, जिससे कैंसर से प्रभावित हिस्सा सुरक्षित बाहर निकाल दिया गया। सर्जरी पूरी तरह सफल रही और सबसे बड़ी राहत की बात यह रही कि बाद की पैथोलॉजी रिपोर्ट में ट्यूमर पूरी तरह खत्म पाया गया। प्रमिलाबेन को कीमोथेरेपी या रेडिएशन की भी जरूरत नहीं पड़ी।

लिवर कैंसर के शुरुआती लक्षण, जैसे लगातार थकान रहना, भूख न लगना, अचानक वजन घटना या पेट के ऊपरी हिस्से में दर्द, अक्सर बहुत मामूली लगते हैं। खासकर अगर पहले से फैटी लिवर या हेपेटाइटिस जैसी समस्या रही हो, तो इन संकेतों को कभी नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए।

अगर रश्मि ने सही समय पर ज़िद न की होती और अपनी सास की तकलीफ को ‘उम्र का असर’ मानकर छोड़ दिया होता, तो शायद बात बहुत बिगड़ सकती थी। अपनों की सेहत का ध्यान रखना और सही समय पर डॉक्टर की सलाह लेना ही किसी की जिंदगी का सबसे बड़ा सहारा बन जाता है।

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