उदयपुर। नगर निगम की शह पर एनएस पब्लिसिटी द्वारा सुखाडिय़ा सर्किल पर लगाए गए कामसूत्र के विज्ञापन का विरोध नगर निगम के विपक्ष के पार्षदों ने ही नहीं पक्ष के पार्षदों ने भी शुरू कर दिया है। पक्ष-विपक्ष के अधिकतर पार्षदों का कहना है कि अश्लीलता और सेक्स से जुडी कंपनी के किसी भी प्रोडक्ट का विज्ञापन सार्वजनिक जगह पर नहीं होना चाहिए, जबकि सुखाडिय़ा सर्कल एक ट्यूरिस्ट प्लेस है, जहां से झीलों की नगरी क ी छवि पूरे देश में बनती है। उल्लेखनीय है कि क्रकामसूत्रञ्ज जैसी कंपनी के किसी भी प्रोडक्ट के विज्ञापन पर डीडी जैसे राष्ट्रीय चैनल पर भी रोक है। ऐसे में भारतीय संस्कृति की बात करने वाली पार्टी के राज में में अश्लीलता भरे स्लोगल वाला क्रकामसूत्रञ्ज का विज्ञापन उनकी दोहरी सोच को दर्शाता है।
विरोध में पक्ष-विपक्ष के पार्षद
:जब नगर निगम की मेयर एक महिला है, इसके बावजूद ऐसे विज्ञापन शहर के बीच में लगते हंै, तो यह एक शर्मनाक और महिलाओं के लिए अपमान जनक स्थिति है। ऐसे विज्ञापन को तुरंत हटाना चाहिए और विज्ञापन लगाने वाले पर तुरंत कार्रवाई होनी चाहिए।
-दिनेश श्रीमाली, नेता प्रतिपक्ष
: ऐसे अश्लीलता फैलाने वाली कंपनी के विज्ञापन पर्यटन स्थलों पर लगाना गलत है। इससे देश में उदयपुर शहर के लिए संदेश गलत जाता है। शहर की छवि खराब होती है। ऐसे विज्ञापन को तुरंत हटाना चाहिए।
-मनोहरसिंह पंवार, भाजपा पार्षद
:जिस कंपनी के विज्ञापन को राष्ट्रीय चैनल ने बेन कर रखा है, तो उसे हमारे यहां शहर में भी नहीं लगना चाहिए और जो कंपनी अश्लीलता के लिए जानी जाती है। जिससे अश्लीलता को बढ़ावा मिलता है उन विज्ञापनों को नगर निगम को तुरंत हटाना चाहिए।
-विजय आहूजा, भाजपा पार्षद
:जो राजनैतिक पार्टी भारतीय संस्कृति की दुहाई देती है। अगर उसके कार्यकाल में क्रकामसूत्रञ्ज जैसे विज्ञापन सरेआम लगाए जाए, तो उस पार्टी की दोहरी सोच को दर्शाता है। ऐसे विज्ञापन के जरिये अश्लीलता फैलाकर आखिर समाज को क्या संदेश देना चाहते है?
-राजेश सिंघवी, माकपा पार्षद
:महिला महापौर होने के बावजूद अगर शहर में ऐसे विज्ञापन लगते हैं, तो इससे ज्यादा शर्म की बात और क्या हो सकती है? सस्कृति को बचाने वाले ही भारतीय संस्कृति की धज्जियां उड़ा रहे हंै। सुखाडिय़ा सर्किल एक पर्यटक स्थल है, जहां से शहर की छवि बनती है। क्रकामसूत्रञ्ज का विज्ञापन तुरंत हटना चाहिए।
-शिप्रा उपाध्याय, कांग्रेसी पार्षद
:अगर कोई विज्ञापन अश्लीलता फैलता है और जिस कंपनी के विज्ञापनों पर राष्ट्रीय चैनल पर भी रोक है, तो हमारे शहर में भी वह विज्ञापन नहीं लगने चाहिए।
-प्रेमसिंह शक्तावत, निर्माण समिति अध्यक्ष,
सोहराबुद्दीन फर्जी मुठभेड़ मामले में सात साल से बंद थे, दस दिन में एक बार सीबीआई कोर्ट में देनी होगी हाजिरी, दो और साथी आईपीएस की भी जमानत
उदयपुर। मुंबई की सीबीआई कोर्ट ने सोहराबुद्दीन शेख फर्जी मुठभेड़ प्रकरण में निलंबित आईपीएस अधिकारी दिनेश एमएन और गुजरात के दो आईपीएस अधिकारियों की जमानत अर्जी आज मंजूर कर ली है। इनमें अभय चूड़ासमा और एमएल परमार शामिल है। कोर्ट ने जमानत अवधि के दौरान दस दिन में एक बार, यानी महीने में तीन बार कोर्ट में स्वयं हाजरी देने का आदेश भी दिया है। इससे पूर्व इस मामले में गुजरात के आईपीएस राजकुमार पांडियन की जमानत सुप्रीम कोर्ट ने मंजूर की थी। सुप्रीम कोर्ट ने पांडियन की जमानत सात साल में इस केस की ट्रायल तक शुरू नहीं होने के आधार पर स्वीकृत की थी। इसको आधार मानते हुए दिनेश एमएन सहित तीन आईपीएस अधिकारियों की जमानत मुंबई की सीबीआई कोर्ट ने मंजूर की है।
उल्लेखनीय है सोहराबुद्दीन शेख का २००५ में अहमदाबाद क्षेत्र में फर्जी एनकाउंटर किया गया था। उसके साथ उसकी पत्नी कौसर बी भी थी, जिसकी भी हत्या कर दी गई। सोहराबुद्दीन, कौसर बी और तुलसी प्रजापति को पुलिस ने सांगली स्टेशन से गिरफ्तार किया था,
तब य लोग वीडिया कोच में सवार थे। बाद में तीनों को गुजरात पुलिस के हवाले कर दिया गया। गुजरात पुलिस ने उदयपुर पुलिस को सूचना दी। सोहराब और तुलसी यहां पर हमीद लाला केस में वांटेड थे। बाद में एक फर्जी कहानी रचकर सोहराब का अहमदाबाद में एनकाउंटर कर दिया गया। इसी दौरान कौसर बी की भी नृशंस हत्या कर दी गई। इस फर्जी एनकाउंटर के बाद तुलसी को भीलवाड़ा से गिरफ्तार करने की झूठी कहानी बनाई गई। तुलसी की गिरफ्तारी के एक साल बाद उसकी भी फर्जी मुठभेड़ में गुजरात के साबरकांठा में हत्या कर दी गई। तुलसी की गिरफ्तारी में तत्कालीन डिप्टी सुधीर जोशी, सीआई रणविजयसिंह और भंवरसिंह हाड़ा शामिल थे। ये लोग बाद में एक सीनियर आईपीएस को बचाने के लिए सरकारी गवाह बन गए और दिनेश एमएन के खिलाफ ही गवाही दे दी। उल्लेखनीय है कि इससे पूर्व दिनेश एमएन की एक बार पहले भी जमानत हो चुकी है, तब वे साबरमती जेल में थे।
जेल में है उदयपुर के तीन अधिकारी: दिनेश एमएन के साथ तत्कालीन सीआई अब्दुल रहमान, सब इंस्पेक्टर श्यामसिंह और हिमांशुसिंह मुंबई की जेल में अभी भी बंद है। एमएन की जमानत होने के बाद अब इनको भी जमानत का रास्ता साफ होता दिखाई पड़ रहा है।
कामसूत्र का एक विज्ञापन हटाकर तीन लगाए
उदयपुर। नगर निगम के अधिकारियों ने सुखाडिय़ा सर्किल के ३० फुट
ऊंचे कैप्सूल ढांचे पर तीनों तरफ कामसूत्र डियोडरेंट स्प्रे का विज्ञापन लगा दिया है। पहले यह विज्ञापन ढांचे के एक ही तरफ लगा हुआ था।
क्रमददगारञ्ज ने शनिवार को प्रकाशित अंक में बताया था कि किस प्रकार एनएस पब्लिसिटी ने अमर्यादित भाषा वाली इबारत का इस्तेमाल करते हुए सार्वजनिक स्थान पर अश्लील विज्ञापन लगाया हुआ है। जैसे ही यह जानकारी प्रकाश में आई, तो एनएस पब्लिसिटी के कर्मचारी वहां पहुंचे और कामसूत्र के विज्ञापन को हटा दिया। बताया गया है कि यह सूचना नगर निगम के कमिश्नर हिम्मतसिंह बारहठ को मिली तो उन्होंने एक की जगह कैप्सूल के तीनों तरफ वही विज्ञापन लगाने की छूट दे दी। पता चला है कि श्री बारहठ खुद क्रसेवन इंच इमेज बूस्टरञ्ज वाले इस स्पे्र को कारगर मानते हैं। साथ ही इसके स्लोगन क्रक्रमेन कांट मिस एंड वुमेन कांट रेसिस्टञ्जञ्ज को पसंद करते हैं। इसलिए यह कोई ताज्जुब की बात नहीं है कि नगर निगम के अधिकारी और एनएस पब्लिसिटी के क्षेत्रीय प्रबंधक को इसमें कोई अश्लीलता नजर नहीं आती। इसीलिए उन्होंने बजाय इस विज्ञापन को हटाने के एक की जगह तीन पोस्टर लगवा दिए। यह भी पता चला है कि उक्त विज्ञापन को साया करने के लिए नगर निगम के अधिकारियों को एनएस पब्लिसिटी द्वारा अलग से लेन-देन भी किया है।
॥ डियोडरेंट का विज्ञापन है, जिसमें कोई अश्लीलता नहीं झलकती है। अब कामसूत्र कंपनी का नाम है, उसको कैसे बदल सकते हैं।
-हिम्मतसिंह बारहठ, आयुक्त, नगर निगम
॥ सुखाडिय़ा सर्कल पर लगा विज्ञापन एक डियोडरेंट का है जिसमें हमें कोई अश्लीलता नजर नहीं आती है। कंपनी का काम है विज्ञापन करना। अगर नगर निगम से निर्देश मिलते हैं, तो हम हटाने के बारे में सोचते, लेकिन हमे कोई आदेश नहीं मिले हैं।
-विनय कुमार, क्षेत्रीय मैनेजर एनएस पब्लिसिटी
निजी स्कूलों की मनमानी जारी
उदयपुर। सरकार के तमाम प्रयासों के बावजूद निजी स्कूलों की फीस वृद्धि को लेकर मनमानी नहीं रूक पा रही है, जहां सरकार सस्ती और मुफ्त शिक्षा की बात कर रही है, वहीं निजी स्कूल फीस में दिन दुनी रात चौगुनी वृद्धि कर अभिभावकों की जेब काट रहे हैं। हालात यह हैं कि शिक्षा के नाम पर अलग-अलग मदों में फीस वसूली, तो हो ही रही है, महंगी किताबें भी अभिभावकों की कमर तोडऩे में कोई कसर नहीं छोड़ रही हैं। एक अनुमान के मुताबिक उदयपुर जिले में शिक्षा उद्योग करोड़ों का आंकड़ा पार कर लिया है।
यह है स्कूलों की स्थिति
जिलेभर में बड़ी और छोटी करीब 800 से अधिक निजी स्कूल हैं। इनमें कुछ स्कूलों में दो से तीन हजार तक बच्चे पढ़ रहे हैं। कुछ में संख्या 500 से एक हजार तक है। कुछ तो ऐसे हैं जिनमें संख्या 100 से 500 तक है। औसतन एक स्कूल में 500 विद्यार्थी और जिले के 800 निजी स्कूलों में चार लाख बच्चे अध्ययनरत हैं। एक अभिभावक को अपने बच्चे पर न्यूनतम 10 से 13 हज़ार तक रुपए की राशि खर्च करनी पड़ रही है।
नहीं माने आदेश, बढ़ा दी फीस
सरकार ने निजी स्कूलों द्वारा मनमर्जी से बढ़ाई जाने वाली फीस पर लगाम कसने के लिए द राजस्थान स्कूल रेग्यूलेशन ऑफ कलेक्शन फीस बिल 2013 बनाया। इस बिल के तहत स्कूल फीस रेग्यूलेटरी कमेटी बनाई गई। कमेटी के अध्यक्ष राजस्थान हाई कोर्ट के पूर्व जस्टिस शिव कुमार शर्मा हैं। शर्मा ने निजी स्कूलों पर किसी भी तरह की फीस वृद्धि करने पर रोक लगाई। कमेटी ने फीस स्ट्रक्चर बनाने के लिए स्कूलों से शपथ पत्र के साथ सुझाव भी मांगें हैं। तब तक कोई भी स्कूल फीस नहीं बढ़ा सकते, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। निजी स्कूलों ने नया सत्र शुरू होते ही फीस बढ़ा दी।
किस तरह बढ़ी फीस
किस तरह बढ़ी फीस
कक्षा वर्ष 2013 वर्ष 2014 बढ़ोतरी प्रतिशत में
पहली से पांचवीं 1000 1300 300 30
छठी से आठवीं 1200 1500 300 25
नवीं व दसवीं 1400 2000 600 48.85
११वीं एवं १२वीं
ऑट्र्स 1800 2200 400 22.23
कॉमर्स 1900 2400 500 26.31
विज्ञान 2000 2500 500 25
॥ जिन स्कूलों की शिकायत हमारे पास आती है, हम कार्रवाई करते हैं। कुछ स्कूलों के फीस बढऩे की शिकायत पर उन्हें नोटिस जारी किया है। निर्देशों के अनुसार कोई स्कूल फीस नहीं बढ़ा सकता, बढऩे पर नियमानुसार करवाई होगी। -भूपेंद्र जैन, डीईओ
उदयपुर पोस्ट का पंच : चलिए बात करते है नौटंकी की अरे हां नौटंकी से याद आया इस बार के जितने फ़िल्मी अवार्ड है, चाहे ऑस्कर हो, फिल्म फेयर हो या आइफा अवार्ड हो ये सारे के सारे अवार्ड हमारे इन बड़े बड़े राजनेताओं को मिलने चाहिए, देखा नहीं आपने रोज कितनी धमाकेदार परफॉर्मेंस देते है, फुल्ली नौटंकी ओह्ह्ह सॉरी नौटंकी नहीं फुल्ली अदाकारी और अदाकारी भी कैसी एक सौ पच्चीस करोड़ जनता के सामने बिना किसी रीटेक के धमाकेदार परफॉर्मेंस, इनकी अदाकारी में हर रंग मौजूद है, कभी एक्शन तो कभी इमोशन और कभी फेमली ड्रामा चलता है, और जब इमोशन की अदाकारी पर अपनी परफॉर्मेंस देते है तो जो राजनेता अबकी बार …… आने का दावा कर रहे है, वे चाहे दंसवी फेल ही सही चाहे अंग्रेजी की चार लाइने सही नहीं बोल पाये या कुछ चार वर्ड रटे रटाये टीवी पर बोल ले लेकिन, …….अंग्रेजी ………अरे हाँ भाई अंग्रेजी में कविताओं का संग्रह निकाल देते है, और वो भी पुरे इमोशन के साथ, और इमोशन भी किसके लिए जिसकी उन्होंने पूरी ज़िन्दगी परवाह नहीं की जिसके साथ उन्हें कामयाबी की हर सीडी तय करनी थी, जिसका हर कदम पर साथ देना और लेना चाहिए था, लेकिन उसको गुमनामी के अँधेरे में धकेले रखा, अब जरूरत पड़ी तो उसके लिए इमोशन निकले और निकले भी तो कैसे इंग्लिश में, वाह ………. अब आप ये मत समझ लेना के ये अंग्रेजी की कविताओं का संग्रह किसी भाड़े के बड़े लेखक से लिखवाया गया है, भाई अदाकारी है, स्क्रिप्ट या डाइरेक्शन किसी का भी हो परदे पर तो हमारे सुपर स्टार ही है। और जो दिखता है वाही बिकता है, इमोशन के साथ फैमली ड्रामा भी गजब का है एंग्री मेन की भूमिका निभाते निभाते अचानक दर्द का अहसास करदेते है और दादी, पापा के नाम पे आंसूं तक ला देते है, तो राजनीति को कड़वा ज़हर और माँ की ममता का मिला जुला रूप देकर कमाल का अभिनय करते है । चलिए ये तो बात हुई फेमली ड्रामा की ये लोग एक्शन सीन में भी कम नहीं है। कभी बाहें चढ़ाते है तो कभी ५६ इंच के सीने से टकरा कर सारे दुश्मनों को मार गिराने का दावा करते है। और हर एक स्टेज परफॉर्मेंस में सिर्फ मै। …… मैं। …… और मै ही रहते है लाइक अमिताब बच्चन , सलमान खान जैसे फ़िल्मी स्टार पुरे परदे पर छाए रहते है ना अपनी अदाकारी से वैसे ही यह भी है छाए हुए रहते है। फ़िल्मी दुनिया में अभिनय की बारीकियां और अदाकारी के ढंग एक डायरेक्टर अभिनेताओं को सिखाता है, लेकिन हमारे ये राजनेता रुपी अभिनेता डायरेक्टर और कैमरा मेन को बताते है के उन्हें किसतरह डायरेक्ट करना है और कैमरा चलन है ( यहाँ डायरेक्टर और कैमरा मेन से मेरा मतलब मीडिया से बिलकुल भी नहीं है ) ।
भाई लोगों …… इस रियल मूवी में अब आप आइटम नंबर की बात मत करना क्यों कि आइटम नंबर तो ये लोग बाकी के पुरे पांच साल हमसे करवाने वाले है । जिससे की इनकी मूवी हिट होगी यानी की……… मूवी ब्लॉक बस्टर होगी हमारे आइटम डांस से और बेस्ट एक्टर और बाकी सारे खिताब इनकी झोली में ,………. \ चलो हम है भी इसी काबिल पुरे पांच साल नाच नाच के इनको हिट करवायेगे ,…. अपना तो काम ही ये है ।
गरीब नवाज़ के जश्न का ये आलिशान फोटो ” अकील अहमद” ने उदयपुर पोस्ट को उपलब्ध करवाया
उदयपुर. सूफी संत हजरत ख्वाजा मोईनुद्दीन हसन चिश्ती के 802वें उर्स का झंडा शनिवार को धूमधाम से दरगाह के बुलंद दरवाजे पर चढ़ाया गया। तोप के गोले दागे गए और पटाखे छोड़े गए। इसके साथ ही उर्स की अनौपचारिक शुरुआत हो गई। उर्स की विधिवत शुरुआत रजब महीने का चांद दिखाई देने पर 1 मई से होगी। परंपरा के मुताबिक दरगाह गेस्ट हाउस से अस्र की नमाज के बाद झंडे के जुलूस की शुरुआत हुई। भीलवाड़ा के गौरी परिवार के सदस्य झंडा लिए हुए थे। जुलूस के शुरू होते ही बड़े पीर साहब की पहाड़ी से तोप के गोले दागे जाने लगे। गाजेबाजे और ढोल नगाड़ों के बीच निकले जुलूस में खासी तादाद में आशिकाने ख्वाजा शरीक हुए। सबसे आगे ढोल, नगाड़ावादक चल रहे थे। इनके पीछे पुलिस का बैंड सूफियाना कलामों की धुनें बजा रहे थे। पीछे भीलवाड़ा के गौरी परिवार के सदस्य झंडा लिए चल रहे थे।
इधर दरगाह की शाही कव्वाल चौकी के सदस्य असरार हुसैन आदि ‘यह तो ख्वाजा ही ख्वाजगां की चादर है’ ‘फख्र ओ कोनो मकां की चादर है…’ आदि कलाम का नजराना पेश करते हुए चल रहे थे। गौरी परिवार के सदस्य मुतवल्ली अबरार अहमद की सदारत में सिर पर फूलों की टोकरियां लिए हुए चल रहे थे। जुलूस में फखरुद्दीन गौरी समेत विभिन्न गणमान्य लोग शामिल थे। लंगर खाना गली, नला बाजार, दरगाह बाजार होते हुए जुलूस रोशनी के वक्त से पूर्व दरगाह के बुलंद दरवाजे पहुंचा। यहां परंपरागत तरीके से गौरी परिवार के सदस्यों ने मौरूसी अमले के साथ मिल कर झंडे को बुलंद दरवाजे पर चढ़ाया। इसके साथ ही उर्स की अनौपचारिक शुरुआत हो गई। झंडा चढ़ाने में दरगाह कमेटी के दारोगा मोबीन खान, अमले के सदस्य उस्मान घडिय़ाली, मुजफ्फर भारती, सुब्हान घडिय़ाली, हसन नक्कारची, शमीम नक्कारची और मुदस्सिर समेत 36 सदस्य मौजूद थे। इधर गौरी परिवार के भी सात सदस्य बुलंद दरवाजे पर मौजूद थे।
30 को खुलेगा जन्नती दरवाजा
उर्स के मौके पर जन्नती दरवाजा 30 अप्रैल को तड़केे खुल जाएगा। यह दरवाजा 6 मई तक जायरीन के लिए खुला रहेगा।
झंडे की एक झलक पाने को बेताब रहे जायरीन, रस्म के दौरान अदब से झुकाए सिर
उर्स के झंडे की रस्म में शिरकत के लिए दरगाह में अकीदतमंदों का सैलाब उमड़ पड़ा। रस्म में विधायक हबीबुर्रहमान खान समेत विभिन्न लोगों भी शिरकत की। झंडे के जुलूस और बाद में बुलंद दरवाजे पर झंडा चढ़ाने की रस्म को देखने के लिए दरगाह में खासी तादाद में आशिकाने ख्वाजा पहुंचे। गरीब नवाज से अकीदत ही थी कि हर तरह की परेशानी के बावजूद आशिकाने ख्वाजा के जज्बा ए अकीदत में कोई कमी नजर नहीं आई। इनमें महिला और बच्चे भी शामिल थे। पुलिस के धक्के और भीड़ में भिंच जाने का भी उन्हें कोई गम नहीं था। बस, झंडे की एक झलक पाना उनका मकसद नजर आया। जैसे ही झंडा दरगाह में पहुंचा, अदब में लोगों ने सिर झुका दिए और दुआएं करते नजर आए।
जायरीन के साथ ही दरगाह कमेटी सदर मोहम्मद उबेदुल्लाह शरीफ, अंजुमन सैयद जादगान व शेख जादगान के पदाधिकारी, पूर्व विधायक बाबूलाल सिंगारिया, पूर्व विधायक हाजी कय्यूम खान, कांग्रेस नेता हाजी महमूद खान, हफीज खान, पूर्व नाजिम डॉ अंसार अहमद खान, हाजी हसन हाशमी, एसएफ हसन चिश्ती और शेखजादा जुल्फिकार चिश्ती समेत विभिन्न लोगों ने शिरकत की।
मोबाइल में कैद करने की होड़
इधर जुलूस को मोबाइल के कैमरों में कैद करने की जायरीन में होड़ लगी नजर आई। दरगाह परिसर में जायरीन की एक बड़ी तादाद मोबाइल के कैमरे से रस्म की रिकॉर्डिंग करती नजर आई। दरगाह परिसर में महिला जायरीन को नियंत्रित करने के लिए महिला पुलिस कांस्टेबल की व्यवस्था नहीं की गई थी। पुरुष पुलिसकर्मी ही उन्हें नियंत्रित करते नजर आए। ख्वाजा साहब के 802वें उर्स का झंडा शनिवार को बुलंद दरवाजे पर चढ़ाया गया। इसके साथ ही उर्स की अनौपचारिक शुरुआत हो गई।
दिन भर जियारत का तांता
ख्वाजा मोईनुद्दीन हसन चिश्ती की दरगाह जियारत के लिए शनिवार को रात तक जायरीन का तांता लगा रहा। दोपहर की बजाए रात को खिदमत हुई। शनिवार से ही मजार शरीफ की खिदमत का वक्त भी बदल गया। हिजरी संवत के जमादिउस्सानी महीने की 25 तारीख को देखते हुए शनिवार से मजार शरीफ की खिदमत का वक्त बदल गया। प्रतिदिन दोपहर 2.30 बजे से होने वाली मजार शरीफ की खिदमत दोपहर में नहीं हुई। इसका फायदा जायरीन को मिला, दोपहर में जायरीन आस्ताना शरीफ में जियारत को पहुंचे। रात करीब 8 बजे आस्ताना शरीफ खिदमत के लिए बंद किया गया। अंजुमन सूत्रों के मुताबिक अब रजब महीने की 5 तारीख तक मजार शरीफ की रात में ही खिदमत होगी। जायरीन दिन भर जियारत कर सकेंगे। 6 रजब को कुल की रस्म के बाद परंपरा के मुताबिक दिन में वापस खिदमत शुरू हो जाएगी।
देगों का ठेका शुरू
उर्स के मौके पर दरगाह में स्थित देगों के ठेके की शुरुआत शनिवार से हो गई। नए ठेकेदार ने व्यवस्था संभाल ली है। इधर दिन भर देग में नजराना डालने का जायरीन का तांता लगा रहा। जमादिउस्सानी महीने की 25 तारीख शुरू हो जाने के कारण तय शर्तों के मुताबिक देगों का नया ठेका भी शुरू हो गया। उर्स के 15 दिन और पुष्कर मेले के 10 दिन के लिए पिछले दिनों अंजुमन सैयदजादगान व अंजुमन शेखजादगान ने संयुक्त रूप से देगों का ठेका सैयद लियाकत हुसैन मोतीवाला को दिया है। यह ठेका 3 करोड़ 6 लाख 100 रुपए में छूटा था। उर्स अवधि का यह ठेका 9 रजब को पूरा होगा। इसके बाद पुष्कर मेले के 10 दिन के लिए ठेका होगा। इस दौरान जायरीन देगों में नजराने के साथ ही चढ़ावे के रूप में सूखे मेवे, गेहूं, चावल और जेवरात आदि डालेंगे। अंजुमन सूत्रों के मुताबिक मन्नत पूरी होने पर अकीदतमंद यह नजराना पेश करते हैं।
रोशनी की दुआ में उमड़े आशिकाने ख्वाजा
दरगाह में शनिवार को हुई रोशनी की दुआ में आशिकाने ख्वाजा की भीड़ उमड़ी। शनिवार से रोशनी की दुआ अहाता ए नूर में शुरू हुई। गरीब नवाज के उर्स का झंडा चढऩे के साथ ही दरगाह में रोशनी की दुआ की शुरूआत भी अब अहाता ए नूर में हो गई है। आम दिनों में यह दुआ आस्ताना शरीफ में होती है। खुद्दाम ए ख्वाजा की ओर से दुआ कराई गई। ख्वाजा गरीब नवाज का उर्स भी शांतिपूर्वक संपन्न हो, इसके लिए भी दुआ की गई। इधर झंडे की रस्म में शरीक होने आए आशिकाने ख्वाजा झंडा चढ़ते ही सीधे दुआ में शरीक हुए। इसके चलते अहाता ए नूर खचाखच भरा हुआ था।
‘The city of dreams!’, is the sobriquet that is often repeated in relation to the city of Mumbai. It was a phrase that dominated most of my childhood in Chennai, as my father would travel to the city and come back with tales of a place that never slept and trains that would take you to every nook and corner. It was the trains, more than anything else that caught my fancy. Trains had always symbolised freedom to me. The wind in your hair, the rush of adrenaline to catch the seat by the window and the journey itself, made me yearn to travel by these local trains. I got my first chance this summer as I got an internship in the city. However, all these ‘dreams’ of mine were crushed, not by the crowd as one might suppose but by the number of children I saw begging on these trains.
These children were highly trained in, if you may be bold enough to say, the art of begging. They went from passenger to passenger singing in shrill voices, hardly stopping to give their vocal chords some rest. It was a voice that pierced through your heart and through any apathy that you may hold for those who refuse to work for a living. One can’t expect a child of four or five to be employed; neither can you rudely refuse those pleading eyes that speak of a hunger that fractures any resolve you may have. They were all dressed in tattered clothes which had clearly been cast away by the original owners.
It was one such child who entered the compartment I was seated in that made my heart feel heavy and instil a sense of helplessness in me. All of five years, she ran up to the train just as it was set to leave the Mumbai Central station. Dressed in a green ‘ghagra’, you might not even take her to be a beggar at first sight. But then the singing began. Two lines were all she sang, repeating them over and over again, invoking the lord. I didn’t understand much of what she sang but the desperation in it put me on the edge and it took all my willpower to turn my head away as she approached. The child then to my utter disbelief laid her head on my knee, a sign of complete surrender. I looked at her in shock, sympathy engulfing my heart. She lay there for more than a minute, continuing to sing, begging for some money. A bespectacled old man next to me, who clearly travelled by these trains often, looked at me understandingly and said- “Don’t fall for these tricks. It is an emotional ploy.”
I nodded at his statement in acknowledgement and turned to see that the child had already gone, paving her way through the crowded compartment. All the voices that spoke of fulfilled dreams in Mumbai weighed upon my memory and I couldn’t help but think of the irony. There went a little child, whose dreams never even had the chance to blossom for they were nipped at the bud. Her singing became fainter as she moved away and finally she was out of sight. But the song never stopped. It continued to reverberate within my head through the day. It was not her face that surfaced in my memories the entire time but the eerie melody of the song she sang. It represented to me a sense of hopelessness and the inability to wrought change. Every note the child hit in the pitiful song, falls as a blow to a system that failed her.
Udaipur. राजस्थान में उत्तरपुस्तिकाएं और ओएमआर शीट्स जल्द ही बीते जमाने की बात हो जाएंगी। प्रदेश में अब आरएएस सहित विभिन्न सरकारी नौकरियों के लिए होने वाली प्रतियोगी परीक्षाएं ऑनलाइन होंगी।
राज्य सरकार ने इस संबंध में चुनाव आचार संहिता लगने से पहले फैसला किया था। प्रशासनिक सुधार विभाग ने इसका खाका तैयार किया है। जल्द ही इस संबंध में एक एक्ट भी बनाया जाएगा। आचार संहिता हटने के बाद मुख्यमंत्री के स्तर पर मंजूरी मिलना बाकी है। सूत्रों के अनुसार इस योजना को शुरू में एक-दो परीक्षाओं (खासकर आरएएस) से करके देखा जाएगा। बाद में इसमें सभी परीक्षाओं को शामिल किया जाएगा। बाद में विभागीय स्तर पर होने वाली परीक्षाएं भी इसी तर्ज पर होंगी। आईआईटी और आईआईएम में प्रवेश के लिए होने वाली परीक्षाएं ऑनलाइन होती हैं।
ये परीक्षाएं राज्य स्तर पर होने वाली किसी भी परम्परागत प्रतियोगी परीक्षा की तुलना में ज्यादा विश्वसनीयता केसाथ होती हैं। राज्य में इसकी सफलता को लेकर विभाग का तर्क है कि सात-आठ वर्ष पहले तक राज्य में प्रतियोगी परीक्षाओं के आवेदन पत्र तक हाथ से भरकर लिफाफों की जरिए भेजे जाते थे, अब हर परीक्षा में आवेदन पत्र ऑनलाइन भरे जाते हैं। ऎसे में परीक्षाएं कराने में भी ज्यादा परेशानी नहीं आएगी। गौरतलब है किे मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के प्रतियोगी परीक्षाओं में सुधार की मंशा जताने के बाद सचिव राजीव महर्षि और विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव राकेश वर्मा के स्तर पर इसे अंतिम रूप दिया गया है।
कैसा होगा सिस्टम
विवरणात्मक के बजाए केवल वस्तुनिष्ठ प्रश्न पूछे जाएंगे
जिन अभ्यर्थियों की राइटिंग खराब होती है, उन्हें आम तौर पर खराब मार्किग का शिकार होना पड़ता है। उनकी प्रतिभा का अब सही मूल्यांकन हो सकेगा
परिणाम हाथों-हाथ जारी होगा। आंसर-की से मिलान किया जा सकेगा। अभ्यर्थियों को अपनी संभावित मार्किग (प्राप्तांक) की जानकारी रहेगी
सभी विद्यार्थियों को एक-दूसरे से अलग प्रश्न पत्र मिलेगा। ऎसे में नकल की गुंजाइश नहीं रहेगी
आखिर क्यों पड़ी जरूरत
राज्य में लगभग 86 हजार पदों के लिए पिछले एक-दो वर्षो में हुई परीक्षाएं विभिन्न विवादों के चलते परिणाम जारी होने तक नहीं पहुंच सकी हैं। यह आज भी अटकी हुई हैं
आरएएस, आरजेएस और शिक्षक भर्ती आदि प्रतियोगी परीक्षाओं में नकल और पेपर लीक होने की घटनाएं होती रही हैं
रोडवेज, आईटी आदि विभागों की परीक्षाएं एक बार में हो ही नहीं सकीं, उन्हें दोबारा करवाना पड़ा
ग्रामीण विकास व शिक्षा विभाग के स्तर पर हुई तृतीय श्रेणी शिक्षक भर्ती परीक्षा मेरिट को लेकर कई जिलों में विवाद सामने आए
परिणामों में असंतोष को लेकर अक्सर छात्र सड़क पर प्रदर्शन से लेकर न्यायालय में जाते रहे हैं
उत्तरपुस्तिकाएं ठीक से नहीं जांचने, सड़क पर मिलने और फटने जैसी घटनाएं भी कई बार हुई हैं
हो सकती है कुछ परेशानियां
प्रतियोगी परीक्षाओं में लाखों अभ्यर्थी शामिल होते हैं। ऎसे में उनके लिए ऑनलाइन परीक्षा आयोजित करवाना संसाधनों की दृष्टि से आसान नहीं होगा
राजस्थान के ग्रामीण-कस्बाई क्षेत्रों में ऑनलाइन एक्जाम से युवा फ्रेंडली नहीं हैं
सरकारी सिस्टम को भी पर्याप्त अपडेट करना पड़ेगा
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रिपोर्ट – दिव्या आर्य बीबीसी संवाददाता, गुजरात के साणंद से
कौन सा विकास हुआ है? किसके लिए विकास हुआ है?” गुजरात की पक्की सड़क पर, तपती गर्मी में टूटी चप्पल पहने, ट्रैक्टर की ओट में कंधे पर फावड़ा लिए खड़े मज़दूर, मुझसे ये सरल सा सवाल पूछते हैं.हम हैं गुजरात के साणंद में. वही तालुका जहां टाटा कंपनी ने नैनो कार का प्लांट लगाया है. यहां क़रीब तीन हज़ार एकड़ ज़मीन का अधिग्रहण हुआ है और बड़ी-बड़ी फैक्ट्री बन गई हैं.
एक बीघा ज़मीन के लिए मुआवज़े के तौर पर 28 लाख रुपए तक दिए गए हैं और आसपास के गांवों में क़रीब 1,500 ज़मींदार रातोंरात करोड़पति बन गए हैं.
ये सड़क साणंद शहर से ऐसे ही एक गांव की ओर जाती है. पर वहां पहुंचने से पहले ही बीच में विकास का ये सवाल खड़ा हो गया है.
भूमिहीनों का दर्द
आखिरकार सवाल पूछने वाले हिम्मत भाई गाग्जी भाई पढार ख़ुद ही जवाब देते हैं, “विकास तो कुछ ही लोगों के लिए हुआ है. जिनके पास ज़मीन थी, उन्हें मुआवज़ा मिल गया. हम आदिवासी तो औरों के खेत पर काम करने वाले किसान मज़दूर हैं. ज़मीन गई तो हमारा रोज़गार भी चला गया.”
इस इलाके में हिम्मत भाई जैसे क़रीब 15,000 भूमिहीन किसान हैं जो दूसरों की ज़मीन पर काम करके जीविका चलाते थे.
अब हिम्मत भाई पिछले दो साल से दिहाड़ी मज़दूरी कर रहे हैं. बताते हैं कि शहर तो लगभग रोज़ जाते हैं लेकिन काम महीने में दस या बारह दिन ही मिलता है. वो भी सड़क बनाने, मलबा ढोने या गटर साफ़ करने जैसा.
ये काम मुश्किल भी है और पसंद का भी नहीं. हिम्मत भाई कहते हैं, “पहले खेत पर काम करते थे तो साल के पैसे बंधे होते थे. ज़मींदार फ़सल का एक-तिहाई या एक-चौथाई हिस्सा उनको देता था. अब तो कल का भी नहीं पता.”
पर कुंहार गांव के अंदर कुछ और ही मंज़र है. यहां मायूसी नहीं, किसानों की आवाज़ में चहक सुनाई देती है. नैनो का नाम लेते ही आंखों में चमक है और चेहरे पर मुस्कान आ जाती है.
बदल गई ज़िंदगी
45 साल के भरत भाई पोपट भाई बताते हैं, “नैनो प्लांट बना तो मेरी ज़िन्दगी ही बदल गई. सपने में भी नहीं सोचा था कि मैं ऐसा घर बना पाऊंगा. ट्रैक्टर भी ख़रीद लिया. अब ज़िन्दगी बहुत मज़े में चल रही है.”
जब नैनो और फ़ोर्ड कंपनी के प्लांट के लिए साल 2011 में भूमि अधिग्रहण हुआ तो उनकी ज़मीन भी ली गई. क़रीब छह बीघा ज़मीन के लिए उन्हें 28 लाख रुपये प्रति बीघा के हिसाब से पैसे मिले.
अब उनके पास दो माले का सुंदर घर है, ट्रैक्टर है. एक दूसरे गांव में एक करोड़ रुपये देकर ज़मीन उधार पर ली है जहां खेती करवाते हैं.
उनकी पत्नी जशीबेन के हाथ और कान सोने के ज़ेवरों से सजे हैं. हालांकि वो इससे ख़ुश नहीं.
जशीबेन कहती हैं, “ज़मीन तो ज़रूरी है. उसी से हर साल पैसा आता है. बाप-दादा की ज़मीन रहती है, तो ज़मींदार कहलाते हैं, इज़्ज़त रहती है. अब उधार की ज़मीन न जाने कब वापस हो जाए फिर बच्चों के जीवन का क्या आधार है? वो किस गांव के कहलाएंगे? आगे जाकर कहीं मज़दूर न बनना पड़े उन्हें?”
क्या खोया-क्या पाया?
आखिर फ़ायदा उनका हुआ जिनके पास ज़मीन थी, भूमिहीन किसान मज़दूर ही तो बेरोज़गार हुए. गुजरात में पिछले एक दशक के दौरान तेज़ी से औद्योगिक विकास हुआ है़, जिसके लिए हज़ारों एकड़ ज़मीन का अधिग्रहण किया गया.
ज़्यादातर इलाकों में किसानों ने इसका विरोध भी किया पर आखिरकार ज़मीन दे दी. साणंद में ज़मीन के लिए अच्छा मुआवज़ा मिला लेकिन कई इलाकों में ऐसा नहीं हुआ.
फिर भी साणंद के ज़मींदार वर्तमान में आई चमक में अपने भविष्य को आंकने में डरते दिखे. ऐसा हो भी क्यों ना. उनके बड़े-बड़े ख़ूबसूरत मकानों से दूर गांव के सिरे पर मज़दूर किसानों की छोटी झोंपड़ियां हैं.
हिम्मत भाई की पत्नी और बच्चे भी वहीं रहते हैं. दस लोगों का परिवार है और एक छोटी सी झोंपड़ी.
बरक़त से तंगी
हिम्मत भाई की पत्नी कहती हैं, “जब खेत पर काम करते थे तो ज़मींदार अनाज, पानी, लकड़ी सब देता था. और आमदनी अलग थी. अब तो खाने के लिए भी उधार लेकर दुकान से ख़रीदना पड़ता है. पिछले एक हफ़्ते से कोई काम नहीं मिला है तो आप ही सोचो कैसे चलेगा.”
हिम्मत भाई का परिवार यहां से चालीस किलोमीटर दूर नानी कथकी गांव का रहने वाला है. रोज़गार की तलाश पंद्रह साल पहले उन्हें इस कुंहार गांव में लाई थी.
अब शहर जाना पड़ रहा है. पर ये सफ़र बरक़त की ओर नहीं बल्कि तंगी की ओर ले गया है.
नया उद्योग उनके जैसे अनपढ़ किसानों के लिए कोई उम्मीद नहीं लाया है.
हिम्मत भाई के मुताबिक, “मोदी जी ने ज़मीन तो ले ली और जो प्लांट लगे वहां हमारे लिए अच्छा काम नहीं है. तकनीकी समझ वाले शहरी लोग ही वहां नौकरी पाते हैं. हम तो दिहाड़ी मज़दूर बनकर रह गए हैं.”
हिम्मत भाई से विदा लेकर मैं फिर गांव की टूटी सड़क पर चल पड़ती हूं. कभी पीने का पानी भरने के लिए सर पर मटकी रखे महिलाएं दिखती हैं तो कभी शौच करने के लिए हाथ में लोटा लिए कोई सामने से गुज़र जाता है.
सड़क के उस ओर हरियाली के पार औद्योगिक क्षेत्र की पक्की सड़कें और ऊंची इमारतें दिखाई देती हैं. विकास का वो वायदा जो किसी के चेहरे की मुस्कान बना है और किसी के माथे की सिलवट.
सरेआम अश्लील प्रचार, विज्ञापनों में लाखों का घोटाला
उदयपुर। शहर का प्रमुख चौराहा सुखाडिय़ा सर्किल इन दिनों एक नये कारण से प्रसिद्ध हो रहा है। यह कारण है, वहां स्थापित एक केप्सूल नुमा ढांचा, जिस पर क्रकामसूत्रञ्ज कंपनी ने अपने एक डियोडरेंट-स्प्रे का विज्ञापन लगाया है। जो भी इसे देखता है, वह यही कहता नजर आता है-क्रक्ररजनीजी ने यह क्या खड़ा कर दिया?, वाह री महापौर!ञ्जञ्ज
कुल मिलाकर उक्त विवादित विज्ञापन से महापौर रजनी ही नहीं, आदर्शवादी भारतीय जनता पार्टी की भी खूब किरकिरी हो रही है। साथ ही नगर निगम से हमारे ऐतिहासिक शहर की मान-मर्यादा के अनुरूप आचरण करते रहने की अपेक्षा भी की जा रही है। इस विज्ञापन में कामसूत्र ब्रांड ने दावा किया है कि कामसूत्र-स्प्रे सात इंच इमेज बूस्ट करता है, जिसे क्रक्रमैन कांट मिस एंड वुमेन कांट रेसीस्ट।ञ्जञ्ज
इस प्रकार कामसूत्र कंपनी नगर निगम के कंधे पर सवार होकर योनांग को बढ़ाने का झूठा दावा करते हुए नगरवासियों के साथ सरेआम ठगी का व्यापार कर रही है।
इस कंपनी का अनुबंध एनएस पब्लिसिटी नामक कंपनी से है और एनएस पब्लिसिटी का अनुबंध नगर निगम से हुआ है। निगम से अनुबंध करने वाली कंपनी ने ही सुखाडिय़ा सर्किल पर पुरूष जननांग जैसा ढांचा बनवाकर उस पर इस स्प्रे का प्रचार करने के लिए कामसूत्र कंपनी से लाखों रुपए प्राप्त किए और नगर निगम को फूटी कौड़ी तक नहीं दी। नगर निगम उक्त कंपनी से लाखों रुपए मांगती है, लेकिन भारतीय जनता पार्टी की प्रचार सामग्री मुफ्त में तैयार कर देने के एवज में उसे अश्लीलता फैलाने तक की छूट भी मिल गई है।
ये क्या खड़ा कर दिया…
बोर्ड की हर बैठक में उठता है मुद्दा
जिस तरह अतिक्रमण का मुद्दा नगर निगम की हर बोर्ड बैठक में उठता है, वैसे ही एनएस पब्लिसिटी के लाखों रुपए के बकाया का मुद्दा हर बोर्ड बैठक में उठता है। चाहे महापौर हो या नगर निगम कमिश्नर सिर्फ क्रदिखवाते है।ञ्ज यह कहकर बात को दबा देते हैं। कई बोर्ड की बैठकों में तो विपक्ष द्वारा एजेंसी को ब्लैक लिस्टेड करने को लेकर प्रदर्शन भी किया गया।
जन प्रतिनिधियों के मुंह पर भी लग जाते हैं ताले
एनएस पब्लिसिटी पर कार्रवाई या लाखों रुपए की वसूली की बात आते ही अधिकतर जन प्रतिनिधियों के मुंह पर भी ताले लग जाते हैं। कोई बोलने की स्थिति में नहीं होता। क्योंकि अधिकतर जनप्रतिनिधियों के बैनर पोस्टर और बड़े-बड़े होर्डिंग का खर्च उन्हें लगाने के लिए साइट उपलब्ध करवाना आदि यह सब सेवाएं एनएस एजेंसी निशुल्क देती है। इसी एहसान में दबकर कोई कुछ नहीं बोलता।
33 साइट में से आधे का पैसा नहीं आया
शहर में रोड फर्निशिंग और गेंटरियों को लेकर 33 साइटों का ठेका है, लेकिन पैसा नगर निगम को अभी तक आधे से भी कम साइटों का मिला है। बकाया राशि को लेकर सभी के तर्क अलग-अलग है। एनएस पब्लिसिटी के जिम्मेदारों से पूछो, तो कहते है कि हमें जगह ही नहीं दी गई। नगर निगम के जिम्मेदार अधिकारी कहते है कि बकाया पैसा वसूला जाएगा। कब और कैसे यह नहीं पता? जबकि हकीकत यह है कि जहां-जहां पर विज्ञापन की अच्छी आय थी, वहां पर तो गेंट्रियां-बोर्ड आदि लगा दिए गए, लेकिन जहां से आय कम थी, वहां मिलीभगत से सालों से घोटाला चल रहा है।
सात साल पहले हुआ अनुबंध, लाखों रुपया बकाया
एनएस पब्लिसिटी का सात साल पहले अनुबंध हुआ था, जिसमें रोड फर्निशिंग व गेंटरियों के लिए शहर के 33 स्थानों पर नगर निगम ने जगह दी थी, इन पर यह विज्ञापन एजेंसी को अपना ढांचा खड़ाकर विज्ञापन लगाने तथा उनकी देखरेख करने का अधिकार दिया गया। सालाना 33 लाख में हुआ ठेका साल दर साल नियम के मुताबिक़ बढऩा भी था, लेकिन नगर निगम के अधिकारियों और राजस्व समिति तथा महापौर की मेहरबानी के चलते अभी तक यह लाखों रुपए हड़पकर बैठा है। ना तो कभी इस विज्ञापन एजेंसी को ब्लैक लिस्टेड किया गया और ना ही इस पर कोई कार्रवाई की गई। सालों से इसकी मनमर्जी चलती आ रही है।
:मैं अभी शहर जिलाध्यक्ष दिनेश भट्ट के साथ गुजरात में चुनाव प्रचार पर हूं। इस विज्ञापन की मुझे जानकारी नहीं है। उदयपुर आते ही इस विज्ञापन को हटवाता हूं।
-दुर्गेश शर्मा, अध्यक्ष, राजस्व समिति