पोस्ट नयूज़। राजसमंद में श्रमिक की ह्त्या के बाद हत्यारे शम्भू लाल के समर्थन में सोशल मीडिया पर भड़काऊ पोस्ट डालने वालों के खिलाफ पुलिस सख्त हो गयी है। सोमवार को दो गिरफ्तार किये थे जबकि मंगलवार एक आरोपी को और गिरफ्तार कर छह लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया हैं। जिनके खिलाफ मामला दर्ज किया गया है उनकी गिरफ्तारी के प्रयास भी तेज किये जारहे है। पुलिस का कहना है कि सोशल मीडिया पर शंभुलाल के समर्थन में सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने वाले पोस्ट करने वालों पर नजर रखी जा रही है। पुलिस ऐसा करने वालों के खिलाफ सख्ती से कार्रवाई करेगी।
राजसमंद थानाधिकारी रामसुमेर मीणा ने बताया कि सोशल मीडिया पर टिप्पणी करने के मामले में बड़ा चारभुजा मंदिर राजनगर निवासी संतोष (32) पुत्र जगदीश वैष्णव को गिरफ्तार किया है। देवथड़ी निवासी देवेंद्र पालीवाल पुत्र सोहनलाल पालीवाल, सुंदरचा निवासी आशीष पुत्र नंदकिशोर, माहेश्वरी मोहल्ला राजनगर निवासी राकेश पुत्र रोडीलाल लड्ढा, चिराग कुमावत पुनिश के खिलाफ सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने की कोशिश करने पर मामला दर्ज किया है। पुलिस सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने वाले कमेंट सोशल मीडिया पर चलाने वालों की पहचान कर रही है। ऐसा करने वालों को पुलिस आईटी एक्ट में गिरफ्तार करेगी।
इन धाराओं में मामला दर्ज
पुलिसने अफराजुल हत्याकांड के मामले में सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल करने वाले और आपत्तिजनक वीडियो वायरल करने वालों के खिलाफ 295 और 153 धारा 84 आईटी एक्ट के तहत प्रकरण दर्ज किया है। इसमें दो समुदाय के बीच में सौहार्द बिगाड़ने के लिए उकसाना धार्मिक भावनाओं को आहत करना शामिल है।
सोशल मिडिया पर भड़काऊ पोस्ट डाल सौहार्द बिगाड़ने वालों के खिलाफ पुलिस सख्त – अबतक 3 गिरफ्तार 6 के खिलाफ मामला दर्ज।
जीत की चमक – हार की हताशा

हत्यारे और रणबांकुरे होने में अंधेरे और उजाले का सा अंतर है .
त्रिभुवन

यह किसी देश, किसी समाज या किसी समुदाय के लिए निकृष्टतम दौर होगा अगर किसी मुसलमान की हत्या पर मुसलमानों को ही विरोध प्रदर्शन करना पड़े। दलितों की हत्या पर दलितों को ही गुस्सा दिखाना पड़े। हिन्दुओं के किसी मसले पर हिन्दुओं को ही बोलना पड़े। यह मानव सभ्यता का वाकई में बुरा दौर होगा अगर एक देश को ही अपनी समस्याएं दुनिया में गाते रहना पड़े।
यह अंधकार युग कहा जाएगा अगर हत्यारों का महिमामंडन होने लगे। चाहे वे कोई भी हों। हत्यारे हत्यारे ही होते हैं, चाहे वे दक्षिणपंथी हों या वामपंथी। वे इस दल से जुड़े हों या उस दल से। चाहे उनकी वेशभूषा किसी भी धर्म से जुड़ी हो या किसी सरकार या विचारधारा से।
हत्याएं अगर घृणित नहीं होतीं तो महाराणा प्रताप हल्दीघाटी के युद्ध की पहली सांझ के झुरमुटे में चार-छह सिपाहियों के साथ शिकार के लिए निकले मानसिंह की हत्या करने में देरी नहीं करते। यह उनके लिए सुनहरा मौक़ा था। लेकिन उन्होंने यह सलाह देने वाले को न केवल फटकारा, बल्कि ऐसा सोचने काे भी घृणित बताया। वीर पुरुष प्रताप बोले : मानसिंह से कल सुबह युद्ध के मैदान में मिलेंगे। हम युद्ध लड़ने वाले वीर पुरुष हैं। हत्यारे नहीं।
हत्यारे के समर्थक मानसिक रूप से बीमार और आत्मिक रूप से कलुषित होते हैं और रक्तार्चन करने वाले रणबांकुरों के समर्थक नीतिमान् कहलाते हैं।
युद्ध में मरने और मारने वालों के गौरवगान इसीलिए होते हैं, क्योंकि वे घृणा के लिए आयोजित होने वाली हत्याओं या नरसंहार के सबब नहीं होते। जिन शासकों ने कत्लेआम करवाए औरयुद्ध को वीरता से विरत करके लड़ा, वे इतिहास में घृणा के पात्र ही रहे।
युद्ध हत्याओं का व्यापार नहीं थे। वे देशों और सेनाओं की शक्ति के संतुलन के लिए लड़े जाने वाले सफलता के उस समय के मानदंड थे और उनमें नियमों की पालना होती थी। राजस्थान के इतिहास में किसी भी ऐसे युद्ध विजेता तक को सूरमा नहीं कहा गया, जिसने किसी की पीठ पर पीछे से वार किया। ऐसे लोगों को घृणित हत्यारे कहा गया और उनकी एक स्वर से निंदा की गई। वीरों ने जब-जब युद्ध लड़े, नियमों का पालन किया। शत्रु का धर्म कुछ भी हो, शत्रु की राष्ट़्रीयता कुछ भी, वीरों ने रणभेरियां बजाकर ही युद्धों का एलान किया। अगर सांझ ढली तो वापस खेमों में लौट गए और एक-दूसरे के यहां से भाेजन-पानी और दवा-दारू तक का अादान प्रदान किया करते थे। और अगले दिन फिर युद्ध लड़ते।
किसी बूढ़े, किसी बच्चे, किसी स्त्री और किसी विकलांग पर वार नहीं किया जाता था। युद्ध भूमि से भागते सैनिक पर हमला करने वाले को कायर कहकर कलंकित किया जाता था।
युद्ध हत्याओं का आयोजन नहीं थे। युद्ध युद्ध थे और युद्धों की एक संस्कृति थी। वीर लोग शौर्यशाली थे। वे घृणित हत्यारे नहीं थे। चाहे महाराणा प्रताप का धर्म अलग था और अकबर के एक सेनापति अब्दुलरहीम खानखाना का धर्म कुछ और था, लेकिन उनका बेटा जब खानखाना के परिवार की महिलाओं को बंदी बनाकर लाया तो महाराणा ने उसे उलटे कदम दौड़ाकर कहा कि इन्हें ससम्मान वापस छोड़कर आओ।
आप रावण को हर साल जलाते हैं। लेकिन क्या यह बात याद है कि युद्ध के मैदान में रावण के बेटे मेघनाद के तीर से लक्ष्मण मूर्च्छित होते हैं तो उन्हें पुनर्जीवित करने वाला वैद्य कौन था? वह सुषेण था और उसे रावण ने अपने शत्रु खेमे में भेजा था।
दयानंद जैसा साधु जिन दिनों इस्लाम, ईसाई और हिन्दू धर्म की मूर्खताअों के खिलाफ़ अलख जगा रहे थे तो उन्हें लाहौर, मुंबई और अजमेर तक में किस धर्म के किन लोगों ने सहयोग किया और उनका कितना सहयोग इस साधु ने किया, यह सोचने की बात है।
विवेकानंद के महान् गुरु रामकृष्ण परमहंस ने तो इस्लाम के माध्यम से ईश्वर सिद्धि प्राप्त करने की कोशिश की थी। कहा तो यहां तक जाता है कि वे एक बार इस काम में गोमांस भक्षण तक को तैयार हो गए थे। यह तथ्य हैं और बारीकी से अध्ययन करने वाले इन्हेंं जानते हैं।
घ़ृणा और उन्माद का दौर चलाने वाले इस देश के न भक्त हैं और न मित्र। वे शत्रुओं से भी ख़तरनाक़ लोग हैं। क्योंकि शत्रु सामने होकर वार करता है। ऐसे लोग घृणाओं से विष वल्लरियां सींचकर देश की धमनियों के रक्तप्रवाह को दूषित करते हैं।
भारत अगर परम वैभव पर पहुंचेगा तो राम की तरह त्याग, कृष्ण की तरह वीतरागिता, शंकर की तरह बौद्धिक युद्ध, बुद्ध की तरह अहिंसक भाव, महावीर की तरह अपरिग्रहिता और नानक की तरह अपौरुषेय मानवता के भाव से ही पहुंच सकता है।
भारत के भाल पर घृणा का कलंक नहीं, मानवीयता से ओतप्रोत संस्कृति और विवेकशीलता का चंदन टीका ही चाहिए।
पत्रकारिता का ‘पत्थरकारिता’ और “बिकाऊ” काल?
न स्याही के हैं दुश्मन न सफ़ेदी के हैं दोस्त। हमको आईना दिखाना है दिखा देते हैं।।
पत्रकारिता के संदर्भ में कहा गया यह शेर देश के प्रबुद्ध पत्रकारों द्वारा बड़ी शान के साथ अक्सर उनके व्याखानों में पढ़ा जाता रहा है। परंतु आज यही पंक्तियां अपने वजूद पर ही सवाल उठा रही हैं। आज चारों तरफ़ यह सवाल किया जा रहा है कि क्या वास्तव में पत्रकार, पत्रकारिता, संपादक, मीडिया समूहों के मालिक तथा पत्रकारिता से जुड़े लेखक, स्तंभकार, समीक्षक आदि अपनी ज़िम्मेदारियों को पूरी ईमानदारी के साथ निभा रहे हैं? क्या वाकई आज के दौर का मीडिया सरकार, शासन-प्रशासन तथा व्यवस्था को आईना दिखाने का काम ईमानदारी से कर रहा है? क्या आज अपनी लेखनी, अपनी वाणी, अपनी नेकनीयती तथा पूरी ज़िम्मेदारी के साथ पत्रकारों द्वारा दर्शकों अथवा पाठकों को ऐसी सामग्री परोसी जा रही है जिससे जनता लाभान्वित हो सके? क्या पत्रकारों द्वारा सरकार,शासन-प्रशासन तथा व्यवस्था का सही स्वरूप व चित्रण पेश किया जा रहा है? या फिर लोकतंत्र का स्वयंभू चौथा स्तंभ पूरी तरह से पक्षपातपूर्ण हो चुका है, अधिकांश मीडिया समूहों के स्वामी आर्थिक लाभ कमाने की ग़रज़ से सत्ता की गोद में जा बैठे हैं?
क्या आजकल एक अच्छे पत्रकार का पैमाना योग्यता अथवा पत्रकारिता का संपूर्ण ज्ञान होने के बजाए उसका आकर्षक व्यक्तित्व, उसकी सुंदरता, उसके चीख़ने-चिल्लाने का ढंग तथा अपने मालिक के प्रति उसकी वफ़ादारी आदि ही रह गया है?
आजकल टेलीविज़न के समाचार चैनल को ही यदि देखा जाए तो अनेक चैनल्स के अनेक एंकर्स व समाचार वाचक शालीनता के साथ गंभीरतापूर्वक अपना कार्यक्रम पेश करने के बजाए जान-बूझ कर बेवजह चीख़ने-चिल्लाने का नाटक करते देखे जा सकते हैं। किसी गंभीर बहस को अथवा किसी साधारण से विषय को चीख़-चिल्ला कर तथा उस कार्यक्रम में भड़काऊ किस्म के सवाल दाग़ कर या विवादित प्रश्र पूछ कर यह नए ज़माने के एंकर्स महज़ अपने कार्यक्रम की टीआरपी बढ़ाना चाहते हैं।
टीआरपी का बढ़ना या घटना पत्रकारिता की विषयवस्तु नहीं है बल्कि यह व्यवसाय तथा मार्किटिंग से जुड़ी चीज़ है।परंतु टीवी एंकर्स के भड़काऊ व आग लगाऊ अंदाज़ ने इन दिनों जनता को अपनी ओर इस कद्र आकर्षित कर रखा है कि दर्शक अन्य मनोरंजक कार्यक्रमों से अधिक अब टीवी समाचार सुनने लगे हैं। यही वजह है कि समाचार प्रसारण के दौरान इन टीवी चैनल्स की मुंह मांगी मुराद पूरी हो रही है तथा बढ़ती टीआरपी की वजह से ही समाचार प्रसारण के दौरान या किसी गर्मागर्म बहस के दौरान उन्हें भरपूर व्यावसायिक विज्ञापन प्राप्त हो रहे हैं।
सूत्र तो यह भी बताते हैं कि टीवी पर होने वाली कई बहस ख़ासतौर पर मंदिर-मस्जिद, हिंदू-मुस्लिम, तीन तलाक, अन्य धार्मिक मुद्दों, गाय, गंगा, लव जेहाद, गौरक्षक, पद्मावती जैसे अनेक विवादित मुद्दों पर होने वाली बहस में एंकर्स द्वारा जान-बूझ कर कार्यक्रम में भाग लेने वाले लोगों से ऐसे प्रश्र किए जाते हैं जिससे उसे ग़ुस्सा आए और ग़ुस्से में आकर वह व्यक्ति कुछ ऐसे उत्तर दे डाले जो विवाद का कारण बन सकें।
आपने अक्सर देखा होगा कि टीवी पर जब कभी दो पक्ष आपस में किसी विषय पर बहस में भिड़ जाते हैं उस समय प्रस्तोता की ओर से उन्हें और ढील दे दी जाती है। जबकि यदि एंकर चाहे तो उसी समय उनका माईक बंद कर सकता है और दूसरे अतिथि की ओर रुख़ कर सकता है। परंतु एंकर जान-बूझ कर दो प्रतिद्वंद्वी विचार के लोगों में बहस कराता है ताकि उसका बहुमूल्य समय भी गुज़र सके और लोगों को उस विवादित चटकारापूर्ण बहस में आनंद भी आ सके और इसी बदौलत उसकी टीआर पी भी बढ़ सके। परंतु दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि यह मीडिया समूहों के मालिक व उनके इशारों पर चंद पैसेां की ख़ातिर नाचने वाले प्रस्तोता यह नहीं जानते कि उनकी इस बदनीयती, बदज़ुबानी का ख़मियाज़ा भारतीय समाज और पूरे देश को भुगतना पड़ता है। निश्चित रूप से यह सब पत्रकारिता के लक्षण कतई नहीं हैं।
इन दिनों पूरे देश में ऐेसे ही एक टीवी शोमैन रोहित सरदाना के विरुद्ध ज़बरदस्त आक्रोश देखा जा रहा है। इसके विरुद्ध सैकड़ों एफ़आईआर दर्ज होने की ख़बरें हैं। कई जगह हिंदू-मुस्लिम सभी ने मिलकर सरदाना के विरुद्ध ज्ञापन दिए हैं तथा इसे न्यूज़ चैनल से हटाए जाने की मांग की है। एक टीवी शो में इसने अपनी एक सहयोगी पत्रकार के साथ हो रही एक बहस के दौरान हिंदू-मुस्लिम व ईसाई धर्म की कई आराध्य हस्तियों के साथ अभद्र शब्द का प्रयोग किया था। ख़बर तो यह है कि यह विवादित कार्यक्रम भी जान-बूझ कर इसी लिए तैयार किया गया था ताकि विवाद बढ़ने के बाद टीवी चैनल व एंकर्स को भारी शोहरत मिल सके।
दुर्भाग्यवश हमारे देश में नकारात्मक रूप से मिलने वाली प्रसिद्धि को भी सकारात्मक प्रसिद्धि के रूप में देखते हैं और कुछ क्षेत्रों में तो जान-बूझ कर इसीलिए विवाद खड़ा भी किया जाता है ताकि विवाद होने के बाद मीडिया में उसे अच्छा कवरेज हासिल हो सके। फ़िल्म पद्मावती को लेकर खड़े हुए बवाल के विषय में भी ऐसी ही बातें कही जा रही हैं। यदि आज पत्रकारिता भी इसी फ़ार्मूले का सहारा लेकर आगे बढ़ने की कोशिश कर रही है तो यह देश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य है। ऐसी पत्रकारिता से देश को बहुत बड़ा नुकसान हो सकता है।
आज हमारे समाज में जो भी दुर्भावना या वैमनस्य का वातावरण बनता दिखाई दे रहा है या चारों ओर से असहिष्णुता की जो ख़बरें सुनाई दे रही हैं उसकी सबसे बड़ी वजह यही है कि पत्रकारिता का वर्तमान दौर दरअसल ‘पत्थरकारिता’ काल बनता जा रहा है।
तनवीर जाफ़री
पहले स्कूली छात्रा से दोस्ती कर किया दुष्कर्म फिर करता रहा ब्लेकमेल और अब ….
हिरणमगरीमें एक स्कूली छात्रा को सोश्यल मीडिया पर दोस्त बना उससे दुष्कर्म और ब्लेकमेलिंग से रुपए ऐंठने के चित्तौड़ निवासी अभियुक्त को पोक्सो मामलों के विशिष्ट न्यायाधीश वीरेंद्रकुमार जसूजा की अदालत ने सोमवार को न्यायिक हिरासत में भेजने का आदेश दिया। आरोपी किशोरी को डरा-धमका कर कार से रानी रोड ले गया था, जहां पिस्टल दिखाकर मामला पुलिस तक नहीं ले जाने की धमकी भी दी थी। हिरणमगरी पुलिस ने दुष्कर्म ब्लेकमेलिंग के आरोपी आदिल पुत्र जमील खां को गिरफ्तार कर अदालत में पेश किया। आदिल चित्तौड़ के गांधीनगर में सेक्टर 4 का निवासी है। किशोरी के पिता ने 2 नवंबर को एसपी को परिवाद दिया था। एसपी के आदेश पर थाने में रिपोर्ट दर्ज की गई। पुलिस ने किशोरी के धारा 164 के बयान कराए थे। रिपोर्ट में बताया गया कि अभियुक्त आदिल ने किशोरी को फेसबुक फ्रेंड बनाकर जाल में फांसा था। इसके बाद वह उदयपुर आने लगा। नशीली वस्तु खिलाकर दुष्कर्म किया और आपत्तिजनक फोटाे खींच लिए थे। बाद में फोटो दिखाकर कई बाद दुष्कर्म किया। आरोप है कि आदिल ने ब्लेकमेलिंग कर कभी 5 हजार, कभी 10 हजार रुपए भी ऐंठ लिए। बाद में अगस्त में किशोरी को डरा-धमका कर कार से रानी रोड ले गया और पिस्तौल दिखाकर पुलिस में रिपोर्ट नहीं देने की धमकी भी दी। पीड़िता के पिता ने हिरणमगरी थाने में दर्ज कराई थी रिपोर्ट
A little known eating disorder is on rise- PICA – Dr. Kajal Verma

Pica is the persistent eating of substances such as dirt or paint that have no nutritional value. Mineral deficiencies are occasionally associated with pica; however, biological abnormalities are rarely found in individuals with pica.
-People practicing forms of pica, such as geophagy, pagophagy and amylophagy, are more likely anemic, have low hemoglobin concentration in their blood, lower levels of red blood cells (hematocrit), or have lower plasma zinc levels.
– Specifically, practicing geophagy is more likely to associated with anemia or low hemoglobin.
– Practicing pagophagy and amylophagy were more highly associated with anemia.
– Additionally, being a child or pregnant woman practicing pica was associated with higher

chance of being anemic or having low hemoglobin relative to the general population.
-More recently, cases of pica have been tied to the obsessive–compulsive spectrum, and there is a move to consider OCD in the cause of pica.
-However, pica is currently recognized as a mental disorder by the widely used Diagnostic and Statistical Manual of Mental Disorders (DSM-IV). Sensory, physiological, cultural and psychosocial perspectives have also been used by some to explain the causation of pica.[citation needed]
It has been proposed that mental-health conditions, such as obsessive-compulsive disorder (OCD) and schizophrenia, can sometimes cause pica.
Causes
-Mineral deficiency specially iron deficiency
-Traumatic events/ stress:Maternal deprivationParental separation/ neglect
-Child abuse
-Disorganized family structure
-Poor parent-child interaction
-Low socio-economic status
Clinical Features
Child with habit of eating substances like clay, dirt, stones, pebbles, hair, faeces, lead, plastic, pencil, erasers, fingernails, paper, paint chips, coal, chalk, wood, plaster, light bulbs, needles, string, cigarette, wire and burnt matches etc.
A case with history of PICA may present with symptoms of:Constipation
Chronic or acute, diffuse or focused abdominal pain
Nausea/ vomitingLoss of appetite
On examination, findings like :Abdominal distension
PallorIron deficiency anaemia which could be the cause of PICA
Clinical presentation of PICA is variable and is associated with the specific nature of the resulting medical conditions and the indigested substances.Parasitic infestations are usually associated with PICA. Ascariasis is commonly seen in children with Pica.

Examples
Amylophagia – consumption of starch
Coprophagy – consumption of faeces
Geophagy – consumption of soil, clay or chalk
Hyalophagia – consumption of glass
Pagophagia – pathological consumption of ice
Trichophagia – consumption of hair or wool
Urophagia – consumption of urine
Xylophagia – consumption of wood.
Complications
There are many potential complications of pica, such as:
Certain items, such as paint chips, may contain lead or other toxic substances and eating
them can lead to poisoning, increasing the child’s risk of complications including learning disabilities and brain damage. This is the most concerning and potentially lethal side effect of pica
Eating non-food objects can interfere with eating healthy food, which can lead to nutritional deficiencies.Eating objects that cannot be digested, such as stones, can cause constipation or blockages in the digestive tract, including the intestines and bowels. Also, hard or sharp objects (such as paperclips or metal scraps) can cause tears in the lining of the esophagus or intestines.Bacteria or parasites from dirt or other objects can cause serious infections. Some infections can damage the kidneys or liver.Co-existing developmental disabilities can make treatment difficult.
Pica Homeopathic Treatment
The homeopathic treatment for PICA is holistic and comprehensive.Homeopathy does not target the symptomsof Pica. The target of homeopathic treatment for Pica is the underlying cause that leads to development of Pica in a given individual.Once the underlying cause is removed with homeopathy or the deficiency is eliminated,the cravings disappear soon.Homeopathic treatment for Pica improves the body’s natural defense mechanisms or ‘immunity’ and prevents the occurrence of Pica. Thus, homeopathic treatment plays an excellent role as a ‘preventive’ and curative for Pica.Importantly, homeopathic treatment for Pica significantly diminishes the risk of development of nasty complications of Pica.
शराब बंदी का जादू – किडनी, लीवर और न्यूरो रोगियों में आई 44 प्रतिशत तक की कमी
पोस्ट म्युज़ । बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने शराबबंदी को सामाजिक सद्भावना का प्रतीक बताते हुये इसे पूरे देश में लागू करने की वकालत की और कहा कि बिहार में एक साल के अंदर ही किडनी और लिवर के रोगियों की संख्या 39 प्रतिशत तथा न्यूरो संबंधी बीमारियों से ग्रस्त रोगियों की संख्या 44 प्रतिशत घटी है।इंसानियत को शर्मसार करने वाली घटना एक कैंसर पीडिता के साथ गैंग रेप
उदयपुर पोस्ट। लखनऊ में १६ वर्षीया ब्लड कैंसर पीडिता लडकी से गैंगरेप (gang rap )का मामला सामने आया है। घटना पूरी तरह से इंसानियत को शर्मशार कर देने वाली है, (cancer sufferers) पीडिता के साथ पहले तो दो लडकों ने गैंगरेप किया और जब उसने मदद के लिए एक बाइक सवार से गुहार लगाई तो उसने भी उसके साथ दुष्कर्म किया। लडकी ब्लड कैंसर से पीड़ित है और पिछले पांच सालों से लखनऊ के एक अस्पताल में उसका इलाज चल रहा है।The Galvanized Marvel – Bandra Worli Sea Link…
Bandra Worli Sea Link is the first and the longest sea link bridge in India. It is an 8-lane cable-stayed bridge, spanning about 5600 meters in length and towering to a height of 126 meters. Executed at a cost of Rs. 16.5 billion, the material used in the construction project had to meet quality regulations and standards considering an average daily traffic of 37,500 vehicles.
Infrastructure like bridges are extremely vulnerable to corrosion due to their proximity to marine salts and moisture. The only corrosion prevention method for these structures is to provide a barrier coating by galvanization.
The quality and reliability of steel wire ropes was a crucial factor in the construction of the bridge since the steel wires are required to support the cable stay bridge. The bridge stands strong with support of high-strength galvanized steel cables, rigorously tested before being put to use.
Over Rs. 90 million is spent on illuminating the sea link. Construction of the sea link was not only worked on by aced groups from India, but groups from 11 other countries including Egypt, China, Canada, Switzerland, Britain, Hong Kong, Thailand, Singapore, Philippines, Indonesia and Serbia who deliberated and decided to make this bridge stand tall for many years to come.
Hindustan Zinc is India’s only and world’s leading Zinc-Lead-Silver Producer..
Article by- Pavan Kaushik, Head – Corporate Communication, Hindustan Zinc

Zinc Deficiency… a reason behind Osteoporosis…
What is Osteoporosis : a medical condition in which the bones become brittle and fragile from loss of tissue, typically as a result of hormonal changes, or deficiency of calcium or vitamin D. More than 10 million cases per year (India). Though any age is vulnerable to Osteoporosis, but people above 40 are more prone to it.
We all have forever patronized Calcium for strong bone health in our bodies. With increased advertising for the nutrient, everyone focuses on Calcium and forgets about another essential element which helps in increasing bone density and boosting immunity.
Zinc (long ignored by mainstream medicine for bone health), is in fact a crucial element
for proper absorption of Calcium and Vitamin D to get into cells where it works to build bones. Although Calcium is the mineral most associated with bone formation, Zinc is also found in the bones. Forming a small percentage of the bone, Zinc is needed to form Hydroxylapatite which is a naturally occurring crystalline Calcium complex. Hydroxylapatite crystals make up about half of the bones’ weight. Thus, Zinc is essential for proper mineralization of bones by contributing to its bone mass.
Calcium is not the only nutrient important for bone formation, many trace minerals such as Zinc, Copper, Manganese and Boron are also important. A deficiency in trace minerals predisposes osteoporosis. According to studies by National Centre for Biotechnology Information, Zinc helps in prevention of osteoporosis.
You may not think of Zinc as a vital nutrient for bones, yet without adequate Zinc, the bones cannot maintain themselves.
Hindustan Zinc is India’s only and world’s leading Zinc-Lead-Silver Producer..
Article by- Pavan Kaushik, Head – Corporate Communication, Hindustan Zinc


