राजस्थान के सबसे खुबसूरत शहर में धारा 144 के दौरान खूब हुआ उपद्रव – गृहमंत्री के गृह जिले में पुलिस उत्त्पातियों के हाथों पिटी

उदयपुर. राजसमन्द में मुस्लिम श्रमिक अफ्राजुल की ह्त्या के बाद हत्यारे शम्भूलाल के समर्थन में गुरुवार को हिंदूवादी संगठनों के प्रदर्शनकारियों ने जम कर उत्पात मचाया. खूबसूरती के लिए जाना जाने वाली झीलों की नगरी का शहर दहशत नगर में तब्दील हो गया. प्रदर्शनकारियों ने सारी सीमाएं लांघते हुए न्याय के मंदिर न्यायालय के स्वर्ण जयंती द्वार पर भी अपने संगठन का झंडा फहरा दिया. कोर्ट सर्कल पर हुए उपद्रव में उपद्रवियों ने कोर्ट परिसर के अन्दर एडिशनल एसपी सुधीर जोशी से भी घेर पर मारपीट कर दी जिसमे सुधीर जोशी को काफी चोटें आई . उपद्रवियों द्वारा किये गए पथराव में १० अधिकारियों को चोटें आये कई पुलिसकर्मी घायल हुए. दिन भर शहर में दहशत का माहोल रहा प्रदर्शनकारी धारा 144 की धज्जियां उड़ाते हुए दिन भर शहर में घूमते रहे. पुलिस ने भी चेतक सर्कल, टाउनहाल, आवरीमाता, से लाठी चार्ज कर खदेड़ा . पुलिस ने करीब 207 उपद्रवियों को हिरासत में ले रखा है.
14 दिसंबर को यूँ तो पुलिस प्रशासन ने शहर को शांत रखने के लिए नेट बंद कर धारा 144 लगा दी थी लेकिन इसके बावजूद पुलिस प्रशासन की नाकामी ही कही जाय कि 14 दिसंबर को ही धारा 144 को आँखे दिखाते हुए उपद्रवी दिन भर शहर में उत्पात मचाते रहे. हालाँकि पुलिस प्रशासन सुबह ८ बजे से चुस्त दिखाई दे रहा था और शहर के हर मुख्य चोराहों पर पुलिस बल तैनात था लेकिन अलग अलग झुण्ड में युवा चेटक मोहता पार्क और टाउनहाल जुटते रहे . पहले टाउन हाल से 200 युवा इकट्ठा हो कर नारे बाजी करने लगे जिसके बाद पुलिस बल ने उन्हें वहां से लाठी चार्ज कर खदेड़ा . बाद में यही युवक घूम फिर कर चेटक आगये वहां से भी उन्हें भगाया . शाम को ४ बजे भीड़ के रूप में प्रदर्शनकारी चेटक चौराहे पर पहुचे और चोराहे के बिच लगे घोड़े पर चढ़ कर ध्वज फहराते हुए नारेबाजी करते रहे . समझाने पर नहीं माने तो पुलिस ने इसके बाद उन्हें वहां से लाठीचार्ज कर खदेड़ा . लेकिन कोर्ट सर्कल पर कुछ अधिवक्ताओं शाह पाकर ये उत्पाती कोर्ट परिसर में शरण पा गए और वहां से नारे बाजी करने लगे पुलिस जब कोर्ट परिसर में जाने लगी तो समर्थन में आये आगे अधिवक्ताओं ने पुलिस को रोक दिया काफी जद्दो जहद के बाद जब पथराव हो गया १० पुलिस अधिकारियों जिसमे एएसपी सुधीर जोशी और हर्ष रतनु भी शामिल है चोटिल हो गए ३३ पुलिस कर्मी घायल हो गए उसके बाद पुलिस ने बल का प्रयोग करते हुए कईयों को गिरफ्तार किया और लाठीचार्ज कर माहोल को सम्भाला.

आखिर शांत शहर को क्या हुआ और क्यूँ :
सात दिसंबर को राजसमन्द में हत्यारे शम्भूलाल रैगर ने गैती से बंगाली श्रमिक अफ्राजुल की निर्मम तरीके से ह्त्या कर दे उसको जला दिया और ह्त्या का वीडियों बना कर वायरल कर दिया. हत्यारे शम्भूलाल ने इसके अलावा दो तीन वीडियो वायरल किये जिसमे उसने लव जिहाद, देशभक्ति, महाराणा प्रताप का नाम लेकर भाषण देता नज़र आया. वीडियो वायरल होने के बाद जहाँ एक तरफ हर आम नागरिक ने ह्त्या की कड़ी भर्त्सना करते हुए हत्यारे के लिए फांसी की मांग की वहीँ. मुस्लिम समुदाय में भयंकर आक्रोश उत्पन्न हो गया मुस्लिम समुदाय ने ८ दिसंबर को नफरत फैलाने वाले संगठनों की पाबंदी और शम्भूलाल की फांसी की मांग को लेकर विशाल जुलुस निकाला . जुलुस में एकत्र १२ हज़ार लोग ३ बजे से ४.३० बजे के बिच ज्ञापन देकर वापस अपने अपने घर चले गए . लेकिन जुलुस के दौरान चेटक सर्कल पर कुछ नारों को लेकर हिंदूवादी संगठनों ने आपत्ति जताई .
इधर दूसरी तरफ कई विकृत मानसिकता के लोगों ने शम्भूलाल को महिमा मंडित करने का खेल चालु कर दिया और इन सब का फायदा उठाते हुए बाहरी कुछ लोगों ने नफरत फैलाने वाले वीडियो और मेसेज सोशल मिडिया पर मेसेज वायरल कर माहोल खराब करने में लग गए. यही नहीं मुस्लिम समुदाय के जुलुस पर आपत्तिजनक नारों को लेकर भी तरह तरह के वीडियो मेसेज वायरल होने लग गए. इन सब का फायदा उठाने वाले लोग भी जाग्रत हो गए उन्हें भी नफरत पर रोटियाँ सेंकने का एक अच्छा ख़ासा मोका मिल गया शिवसेना हिन्दुस्तान के महासचिव लखन सिंह पंवार ने पूरी भड़ास निकालते हुए समुदाय विशेष के खिलाफ सोशल मिडिया पर नफरत फैलाने का काम किया साथ ही कोई उपदेश राणा नामक शख्स जो किसी हिंदूवादी संगठन से जुड़ा होना बताया जारहा है उसने इस आग में घी डालने का कार्य किया और उसने १४ दिसंबर को उदयपुर आकर रैली निकालने का आव्हान किया. महोल खराब होने के अंदेशे से १३ दिसंबर की शाम से ही प्रशासन ने नेट बंद कर निषेधाज्ञा लागू कर दी थी. १४ दिसंबर को निषेधाज्ञा के बावजूद भी हिन्दू संगठन से जुड़े लोगों ने शहर में उत्पात मचाया और शांत शहर की फिजां खराब हो गयी .

उदयपुर में धारा 144 – रात 12 बजे से इंटरनेट बंद – साम्प्रदायिक सोहार्द बिगाड़ने की आशंका को देखते लिया फैसला।

उदयपुर। जिला मजिस्ट्रेट बिष्णुचरण मल्लिक ने एक आदेश जारी कर बुधवार रात्रि 8 बजे से अगले आदेश तक जिले में भारतीय दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 144 के तहत निषेधाज्ञा लागू की है। कुछ असामाजिक तत्वों द्वारा साम्प्रदायिक सौहार्द्र की बिगाड़ने की आशंका को देखते हुए यह आदेश जारी किए गए है।
जिला मजिस्ट्रेट ने बताया कि निषेधाज्ञा के दौरान धरना प्रदर्शन, रैली एवं भडकाऊ भाषण आदि सामुहिक आयोजनों करने एवं योजना बनाने पर प्रतिबंध रहेगा। कोई भी व्यक्ति धारदार हथियार या लाठी लेकर नहीं घूम सकेगा। उल्लंघन करने वालों के विरूद्ध सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
सोशल मीडिया पर भडकाऊ एवं साम्प्रदायिक सौहार्द्र बिगाड़ने वाले मैसेज पोस्ट करने, चित्र या वीडियो भेजने वाले व्यक्ति के खिलाफ कठोर कानून सम्मत कार्रवाई की जाएगी।

राणा के उदयपुर प्रवेश पर पाबंदी

जिला मजिस्ट्रेट ने बताया कि उपदेश राणा नामक शख्स ने सोशल मीडिया पर पोस्ट करके गुरुवार को उदयपुर आने की बात कही है। उसके उदयपुर आने से माहौल बिगड़ने की आशंका को देखते हुए राणा के उदयपुर सीमा में प्रवेश पर पाबंदी लगा दी गई है।

स्पेशल सेल रख रही निगरानी

जिला मजिस्ट्रेट एवं जिला पुलिस अधीक्षक कार्यालय में विशेष सेल का गठन किया गया है जिसके द्वारा सोशल मीडिया पर प्रसारित किये जा रहे पोस्ट, चित्र एवं वीडियो पर कड़ी निगरानी रखते हुए जांच की जा रही है। किसी व्यक्ति द्वारा घृणा एवं विद्वेष फैलाने वाले संदेश, टिप्पणी, चित्र या वीडियो प्रसारित किया जाएगा तो उसके विरूद्ध सख्त कार्रवाई अमल में लाई जाएगी।

24 घंटे के लिए इंटरनेट सेवाएं निलंबित

उदयपुर,संभागीय आयुक्त भवानी सिंह देथा ने एक आदेश जारी कर उदयपुर जिले की सम्पूर्ण सीमा क्षेत्र में इंटरनेट सेवाएं 24 घंटे के लिए निलंबित कर दी है। इस दौरान विभिन्न मोबाइल सेवा प्रदाताओं द्वारा दी जा रही 2जी, 3जी व 4जी डाटा, इंटरनेट सर्विस, बल्क एसएसएस, एमएमएस, वाट्सएप, फेसबुक, ट्विटर और अन्य सोशल मीडिया सेवाएं निलंबित रहेगी। यह निलंबन बुधवार रात्रि 8 बजे से प्रभावी है।

सोशल मिडिया पर भड़काऊ पोस्ट डाल सौहार्द बिगाड़ने वालों के खिलाफ पुलिस सख्त – अबतक 3 गिरफ्तार 6 के खिलाफ मामला दर्ज।

पोस्ट नयूज़। राजसमंद में श्रमिक की ह्त्या के बाद हत्यारे शम्भू लाल के समर्थन में सोशल मीडिया पर भड़काऊ पोस्ट डालने वालों के खिलाफ पुलिस सख्त हो गयी है। सोमवार को दो गिरफ्तार किये थे जबकि मंगलवार एक आरोपी को और गिरफ्तार कर छह लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया हैं। जिनके खिलाफ मामला दर्ज किया गया है उनकी गिरफ्तारी के प्रयास भी तेज किये जारहे है। पुलिस का कहना है कि सोशल मीडिया पर शंभुलाल के समर्थन में सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने वाले पोस्ट करने वालों पर नजर रखी जा रही है। पुलिस ऐसा करने वालों के खिलाफ सख्ती से कार्रवाई करेगी।
राजसमंद थानाधिकारी रामसुमेर मीणा ने बताया कि सोशल मीडिया पर टिप्पणी करने के मामले में बड़ा चारभुजा मंदिर राजनगर निवासी संतोष (32) पुत्र जगदीश वैष्णव को गिरफ्तार किया है। देवथड़ी निवासी देवेंद्र पालीवाल पुत्र सोहनलाल पालीवाल, सुंदरचा निवासी आशीष पुत्र नंदकिशोर, माहेश्वरी मोहल्ला राजनगर निवासी राकेश पुत्र रोडीलाल लड्ढा, चिराग कुमावत पुनिश के खिलाफ सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने की कोशिश करने पर मामला दर्ज किया है। पुलिस सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने वाले कमेंट सोशल मीडिया पर चलाने वालों की पहचान कर रही है। ऐसा करने वालों को पुलिस आईटी एक्ट में गिरफ्तार करेगी।
इन धाराओं में मामला दर्ज
पुलिसने अफराजुल हत्याकांड के मामले में सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल करने वाले और आपत्तिजनक वीडियो वायरल करने वालों के खिलाफ 295 और 153 धारा 84 आईटी एक्ट के तहत प्रकरण दर्ज किया है। इसमें दो समुदाय के बीच में सौहार्द बिगाड़ने के लिए उकसाना धार्मिक भावनाओं को आहत करना शामिल है।

जीत की चमक – हार की हताशा

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पोस्ट न्यूज़. कहावत है कि जीतने वाले जीत की बात करते हैं और हारने वाले जीतने वालों की बात करते हैं। ऐसा ही कुछ राहुल गांधी और नरेन्द्र मोदी के साथ है। दोनों ही गुजरात विधानसभा चुनावों में अपनी पार्टी के स्टार प्रचारक हैं। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी उत्तरोत्तर एक विजेता का आत्मविश्वास प्रोजैक्ट कर रहे हैं। इसके विपरीत, प्रधानमंत्री हताशा के लक्षण दिखा रहे हैं, कांग्रेस पर हमले कर रहे हैं, स्वयं को पीड़ित बताकर सहानुभूति जीतने का प्रयास कर रहे हैं और विदेशी ताकतों के लिप्त होने की आधारहीन थ्योरी दे रहे हैं।
सोमवार को मोदी द्वारा लगाया गया यह आरोप बुरी तरह उल्टा पड गया कि, मणिशंकर अय्यर के निवास पर एक तथाकथित गुप्त मीटिंग हुई, जिसमें पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, पूर्व राज्यसभा चेयरमैन हामिद अंसारी और भारत के कई लब्धप्रतिष्ठ सेवानिवृत्त राजनयिकों का पाकिस्तान के उच्चायुत्त* एवं पाकिस्तान के पूर्व विदेश मंत्री के साथ एक कुटिल समझौता हुआ।
सामान्य रुप से कम बोलने वाले मनमोहन सिंह ने एक कडा वक्तव्य जारी किया है, जिसमें ना केवल, किसी षडयंत्र की बात को झूठा बताया गया है बल्कि प्रधानमंत्री मोदी को स्पष्ट शब्दों में झिडकी दी गई है और माफी की मांग की गई है।
तथापि, एक प्रधानमंत्री द्वारा अपने पूर्ववर्ती के विरुद्घ खतरनाक असत्य बातें बोलने के परिणामों के अतिरिक्त, मोदी के आरोप यह दर्शाते हैं कि देश में राजनीति की हवा का जो रुख बदल रहा है उसे लेकर उनकी निराशा कितनी बढती जा रही है और वो कितने विचलित हो रहे हैं। अपनी सत्ता के चौथे वर्ष में अचानक मोदी को असफल नीतियों तथा अपने गृह राज्य गुजरात में आसन्न हार का दबाव महसूस हो रहा है।
हारने वाले अपने दिल की गहराइयों में पहले से जान जाते हैं कि अंत निकट है और असफलता सामने है। लेकिन नरेन्द्र मोदी को बहुत गहराई में जाने की जरुरत नहीं है। सारे लक्षण सामने स्पष्ट नजर आ रहे हैं। स्थिति पलट गई है, उनका ’’पावर गेम’’ अब काम नहीं कर रहा।
बात सिर्फ गुजरात की ही नहीं है। अगर वे विधानसभा चुनावों में किसी तरह पार पा भी लेते हैं जिसकी संभावना प्रतीत नहीं हो रही है,  तो भी जो अन्य महत्वपूर्ण चीजें वे गँवा चुके हैं, उनको ध्यान में रखते हुये यह जीत बहुत ही मामूली सी सान्त्वना का काम कर पायेगी। वे अपराजेय होने की आश्वस्त छवि को खो चुके हैं। आम जनता के बीच उनकी विश्वसनीयता तेजी से खत्म होती जा रही है। कुछ लोग तो यहाँ तक कह रहे हैं कि वे अपने पार्टीजनों तथा आर एस एस के अपने मूल परामर्शदाताओं का विश्वास भी खोते जा रहे हैं।
अपने सलाहकारों की बात पर कान न देने वाले नेताओं के सामने असली समस्या यह होती है कि अन्ततोगत्वा वो ऐसे लोगों से घिर जाते हैं जिनके पास कहने के लिये कुछ होता ही नहीं है। जैसा हदीस कहती है, अपना सब कुछ ही बुरी तरह से खो देने वाले नेताओं के साथ असली समस्या यह होती है कि वे समाप्त होते-होते, अपने किये गये अच्छे कार्यों को भी चौपट कर जाते हैं, ठीक वैसे ही, जैसे आग लकडी को जला डालती है। बुरी तरह से पराजित व्यक्ति से ज्यादा खराब चीज केवल एक ही होती है, और वह है -क्रोधी प्रवृत्ति असभ्य का पराजित व्यक्ति, जो अपनी खामियों का दोष दूसरों के माथे मढ देता है।
नरेन्द्र मोदी का कांग्रेस-मुक्त भारत का सपना नष्ट हो गया है। बहुत कुछ ऐसा लगता है कि पुनर्जीवित कांग्रेस एक बडी वापसी कर रही है। केवल गुजरात में ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में भी।
जब दिल्ली में उनके कांग्रेस अध्यक्ष बनने की औपचारिक घोषणा की जा रही थी, राहुल गांधी चुनाव अभियान में जुटे हुये थे। गुजरात में उनके चुनावी भाषण प्रभाव छोडते लग रहे हैं। वे भारी भीड आकॢषत कर रहे हैं। उनके शब्दों और लहजे में परिपक्वता नजर आ रही है।
दूसरी ओर, नरेन्द्र मोदी ने विकास के बारे में अपने वादों और अतिशियोक्तियों पर केन्द्रित होना छोड सा दिया है, जो उनका मुख्य चुनावी आधार माना जाता था। अब तो, भाजपा के सबसे अंध-समर्थक भी यह जान गये हैं कि गुजरात के मतदाताओं का आॢथक रूप से कमजोर वर्ग-दलित, पाटीदार, मुस्लिम और ओ.बी.सी., अब विनम्रता से यह दर्शाने को तैयार नहीं है कि विकास के लाभ टपकते धीरे-धीरे हुए उन तक पहुँचे हैं।
मोदी, जैसा कि राहुल गांधी वाक-चातुर्य से इंगित करते हैं, वैकल्पिक चुनावी मुद्दों को तलाश रहे हैं, ताकि विकास के मोर्चे पर विफलता पर से ध्यान हटाया जा सके। पहले उन्होंने ’नर्मदा का पानी’  गरीबों व शोषितों के दरवाजे तक ले जाने का दावा किया-पर उन्होंने उस समय यह धारणा त्याग दी जब उनके विरोधियों ने इंगित किया कि नर्मदा का पानी बडी फैक्ट्रियाँ चलाने के लिये मोडा जा रहा है, ना कि हरिजन बस्तियों तथा खेतों में जाने के लिये।
मोदी ने फोकस को बदलते हुए एक बार फिर विकास और वृद्घि की बात करने का प्रयास किया। उन्होंने विकास के प्रतीक के रूप में नैनो कार फैक्ट्री का उल्लेख किया। पर यह पासा उलटा पडा। टाटा समूह को 33000 करोड रूपये कम ब्याज पर ऋण तथा मामूली दरों पर भूमि दी गयी थी, पर यह छोटी कार सडकों पर कहीं नजर नहीं आती और साथ ही  गुजरात के बेरोजगार युवाओं को वादा की गयी नौकरियाँ भी नहीं मिलीं। राहुल गांधी द्वारा जोर से कही गयी इस साधारण बात पर स्थानीय जनता की इतनी सकारात्मक प्रतिक्रिया आयी कि हाॢदक पटेल, जिग्नेश मेवानी और अल्पेश यादव ने भी इसे अपनी रैलियों के भाषण में शामिल कर लिया।
मोदी ने नैनो को छोडा और कांग्रेस नेता के मंदिरों में जाने पर आक्रमण करना शुरू किया। इरादा संभवत: कांग्रेस की धर्म-निरपेक्ष छवि पर चोट करना था, पर परिणाम जो भाजपा के स्टार चुनाव प्रचारक चाहते थे, उससे बहुत अलग हुआ-मीडिया राहुल के पूजा-स्थलों पर जाने को अधिक कवरेज देने लगा, जिससे एक धर्म-परायण युवा, जिसके माथे पर तिलक और चेहरे पर देवदूत जैसी की मुस्कान है, की छवि और निखरी।
मीडिया ने भी पहले से कहीं अधिक इस बात को कवरेज देना शुरू कर दिया कि, राहुल गांधी वास्तव में अपनी रैलियों में क्या कह रहे हैं। उदाहरण के तौर पर-’’हमारे पी.एम. अफगानिस्तान, पाकिस्तान, चीन, जम्मू और कश्मीर की बात कर रहे हैं। मैं कुछ आश्चर्यचकित हूँ। आज उन्होंने 60-70 प्रतिशत खुद के बारे में बोला, बाकी समय  वो उन देशों के बारे में बोल रहे थे। मोदी जी, क्या आप गुजरात में अपने पिछले 22 वर्ष की सत्ता के बारे में बात करने से डरते हैं? हम इसकी बात करेंगे। चलो पिछले समय की नहीं, कम से कम गुजरात के भविष्य की बात तो करो। मोदी जी आपको विश्व भर में ले जायेंगे। पर वे गुजरात में 22 साल के भाजपा शासन की बात नहीं करेंगे। वे जय शाह के बारे में एक शब्द भी नहीं बोलते। वे राफेल जेट सौदे के बारे में एक शब्द भी नहीं बोलते। वे किसानों को मिल रहे कपास के  दाम के बारे में नहीं बोलते।’’
मोदी केवल एक ही जवाब दे पाये हैं, जो कि एक जोशीली अपील थी-’’ गुजरात में भाजपा सरकार के आने के बाद, अनार, आलू और सब्जियों की उपज चार गुना बढ गयी है। अब, मैं प्रधानमंत्री हूँ।
इसलिये, आपके दोनों हाथों में लड्डू हैं। एक गांधीनगर में और एक दिल्ली में, अब आप दिल्ली आ सकते हैं और मुझे आवाज देकर कह सकते हैं, ’’नरेन्द्र मोदी, रूको, मुझे आपसे बात करनी है।’’ क्या आप को ऐसा प्रधानमंत्री मिलेगा। क्या आप को ऐसा अवसर मिलेगा कि अगले पांच साल, दिल्ली आपकी सेवा में खडी हो?’’
रमण स्वामी-
राष्ट्रदूत दिल्ली ब्यूरो

हत्यारे और रणबांकुरे होने में अंधेरे और उजाले का सा अंतर है .

त्रिभुवन 

यह किसी देश, किसी समाज या किसी समुदाय के लिए निकृष्टतम दौर होगा अगर किसी मुसलमान की हत्या पर मुसलमानों को ही विरोध प्रदर्शन करना पड़े। दलितों की हत्या पर दलितों को ही गुस्सा दिखाना पड़े। हिन्दुओं के किसी मसले पर हिन्दुओं को ही बोलना पड़े। यह मानव सभ्यता का वाकई में बुरा दौर होगा अगर एक देश को ही अपनी समस्याएं दुनिया में गाते रहना पड़े।

यह अंधकार युग कहा जाएगा अगर हत्यारों का महिमामंडन होने लगे। चाहे वे कोई भी हों। हत्यारे हत्यारे ही होते हैं, चाहे वे दक्षिणपंथी हों या वामपंथी। वे इस दल से जुड़े हों या उस दल से। चाहे उनकी वेशभूषा किसी भी धर्म से जुड़ी हो या किसी सरकार या विचारधारा से।

हत्याएं अगर घृणित नहीं होतीं तो महाराणा प्रताप हल्दीघाटी के युद्ध की पहली सांझ के झुरमुटे में चार-छह सिपाहियों के साथ शिकार के लिए निकले मानसिंह की हत्या करने में देरी नहीं करते। यह उनके लिए सुनहरा मौक़ा था। लेकिन उन्होंने यह सलाह देने वाले को न केवल फटकारा, बल्कि ऐसा सोचने काे भी घृणित बताया। वीर पुरुष प्रताप बोले : मानसिंह से कल सुबह युद्ध के मैदान में मिलेंगे। हम युद्ध लड़ने वाले वीर पुरुष हैं। हत्यारे नहीं।

हत्यारे के समर्थक मानसिक रूप से बीमार और आत्मिक रूप से कलुषित होते हैं और रक्तार्चन करने वाले रणबांकुरों के समर्थक नीतिमान् कहलाते हैं।

युद्ध में मरने और मारने वालों के गौरवगान इसीलिए होते हैं, क्योंकि वे घृणा के लिए आयोजित होने वाली हत्याओं या नरसंहार के सबब नहीं होते। जिन शासकों ने कत्लेआम करवाए औरयुद्ध को वीरता से विरत करके लड़ा, वे इतिहास में घृणा के पात्र ही रहे।

युद्ध हत्याओं का व्यापार नहीं थे। वे देशों और सेनाओं की शक्ति के संतुलन के लिए लड़े जाने वाले सफलता के उस समय के मानदंड थे और उनमें नियमों की पालना होती थी। राजस्थान के इतिहास में किसी भी ऐसे युद्ध विजेता तक को सूरमा नहीं कहा गया, जिसने किसी की पीठ पर पीछे से वार किया। ऐसे लोगों को घृणित हत्यारे कहा गया और उनकी एक स्वर से निंदा की गई। वीरों ने जब-जब युद्ध लड़े, नियमों का पालन किया। शत्रु का धर्म कुछ भी हो, शत्रु की राष्ट़्रीयता कुछ भी, वीरों ने रणभेरियां बजाकर ही युद्धों का एलान किया। अगर सांझ ढली तो वापस खेमों में लौट गए और एक-दूसरे के यहां से भाेजन-पानी और दवा-दारू तक का अादान प्रदान किया करते थे। और अगले दिन फिर युद्ध लड़ते।

किसी बूढ़े, किसी बच्चे, किसी स्त्री और किसी विकलांग पर वार नहीं किया जाता था। युद्ध भूमि से भागते सैनिक पर हमला करने वाले को कायर कहकर कलंकित किया जाता था।

युद्ध हत्याओं का आयोजन नहीं थे। युद्ध युद्ध थे और युद्धों की एक संस्कृति थी। वीर लोग शौर्यशाली थे। वे घृणित हत्यारे नहीं थे। चाहे महाराणा प्रताप का धर्म अलग था और अकबर के एक सेनापति अब्दुलरहीम खानखाना का धर्म कुछ और था, लेकिन उनका बेटा जब खानखाना के परिवार की महिलाओं को बंदी बनाकर लाया तो महाराणा ने उसे उलटे कदम दौड़ाकर कहा कि इन्हें ससम्मान वापस छोड़कर आओ।

आप रावण को हर साल जलाते हैं। लेकिन क्या यह बात याद है कि युद्ध के मैदान में रावण के बेटे मेघनाद के तीर से लक्ष्मण मूर्च्छित होते हैं तो उन्हें पुनर्जीवित करने वाला वैद्य कौन था? वह सुषेण था और उसे रावण ने अपने शत्रु खेमे में भेजा था।

दयानंद जैसा साधु जिन दिनों इस्लाम, ईसाई और हिन्दू धर्म की मूर्खताअों के खिलाफ़ अलख जगा रहे थे तो उन्हें लाहौर, मुंबई और अजमेर तक में किस धर्म के किन लोगों ने सहयोग किया और उनका कितना सहयोग इस साधु ने किया, यह सोचने की बात है।

विवेकानंद के महान् गुरु रामकृष्ण परमहंस ने तो इस्लाम के माध्यम से ईश्वर सिद्धि प्राप्त करने की कोशिश की थी। कहा तो यहां तक जाता है कि वे एक बार इस काम में गोमांस भक्षण तक को तैयार हो गए थे। यह तथ्य हैं और बारीकी से अध्ययन करने वाले इन्हेंं जानते हैं।

घ़ृणा और उन्माद का दौर चलाने वाले इस देश के न भक्त हैं और न मित्र। वे शत्रुओं से भी ख़तरनाक़ लोग हैं। क्योंकि शत्रु सामने होकर वार करता है। ऐसे लोग घृणाओं से विष वल्लरियां सींचकर देश की धमनियों के रक्तप्रवाह को दूषित करते हैं।

भारत अगर परम वैभव पर पहुंचेगा तो राम की तरह त्याग, कृष्ण की तरह वीतरागिता, शंकर की तरह बौद्धिक युद्ध, बुद्ध की तरह अहिंसक भाव, महावीर की तरह अपरिग्रहिता और नानक की तरह अपौरुषेय मानवता के भाव से ही पहुंच सकता है।

भारत के भाल पर घृणा का कलंक नहीं, मानवीयता से ओतप्रोत संस्कृति और विवेकशीलता का चंदन टीका ही चाहिए।

पत्रकारिता का ‘पत्थरकारिता’ और “बिकाऊ” काल?

न स्याही के हैं दुश्मन न सफ़ेदी के हैं दोस्त। हमको आईना दिखाना है दिखा देते हैं।।

पत्रकारिता के संदर्भ में कहा गया यह शेर देश के प्रबुद्ध पत्रकारों द्वारा बड़ी शान के साथ अक्सर उनके व्याखानों में पढ़ा जाता रहा है। परंतु आज यही पंक्तियां अपने वजूद पर ही सवाल उठा रही हैं। आज चारों तरफ़ यह सवाल किया जा रहा है कि क्या वास्तव में पत्रकार, पत्रकारिता, संपादक, मीडिया समूहों के मालिक तथा पत्रकारिता से जुड़े लेखक, स्तंभकार, समीक्षक आदि अपनी ज़िम्मेदारियों को पूरी ईमानदारी के साथ निभा रहे हैं? क्या वाकई आज के दौर का मीडिया सरकार, शासन-प्रशासन तथा व्यवस्था को आईना दिखाने का काम ईमानदारी से कर रहा है? क्या आज अपनी लेखनी, अपनी वाणी, अपनी नेकनीयती तथा पूरी ज़िम्मेदारी के साथ पत्रकारों द्वारा दर्शकों अथवा पाठकों को ऐसी सामग्री परोसी जा रही है जिससे जनता लाभान्वित हो सके? क्या पत्रकारों द्वारा सरकार,शासन-प्रशासन तथा व्यवस्था का सही स्वरूप व चित्रण पेश किया जा रहा है? या फिर लोकतंत्र का स्वयंभू चौथा स्तंभ पूरी तरह से पक्षपातपूर्ण हो चुका है, अधिकांश मीडिया समूहों के स्वामी आर्थिक लाभ कमाने की ग़रज़ से सत्ता की गोद में जा बैठे हैं?

क्या आजकल एक अच्छे पत्रकार का पैमाना योग्यता अथवा पत्रकारिता का संपूर्ण ज्ञान होने के बजाए उसका आकर्षक व्यक्तित्व, उसकी सुंदरता, उसके चीख़ने-चिल्लाने का ढंग तथा अपने मालिक के प्रति उसकी वफ़ादारी आदि ही रह गया है?

आजकल टेलीविज़न के समाचार चैनल को ही यदि देखा जाए तो अनेक चैनल्स के अनेक एंकर्स व समाचार वाचक शालीनता के साथ गंभीरतापूर्वक अपना कार्यक्रम पेश करने के बजाए जान-बूझ कर बेवजह चीख़ने-चिल्लाने का नाटक करते देखे जा सकते हैं। किसी गंभीर बहस को अथवा किसी साधारण से विषय को चीख़-चिल्ला कर तथा उस कार्यक्रम में भड़काऊ किस्म के सवाल दाग़ कर या विवादित प्रश्र पूछ कर यह नए ज़माने के एंकर्स महज़ अपने कार्यक्रम की टीआरपी बढ़ाना चाहते हैं।

टीआरपी का बढ़ना या घटना पत्रकारिता की विषयवस्तु नहीं है बल्कि यह व्यवसाय तथा मार्किटिंग से जुड़ी चीज़ है।परंतु टीवी एंकर्स के भड़काऊ व आग लगाऊ अंदाज़ ने इन दिनों जनता को अपनी ओर इस कद्र आकर्षित कर रखा है कि दर्शक अन्य मनोरंजक कार्यक्रमों से अधिक अब टीवी समाचार सुनने लगे हैं। यही वजह है कि समाचार प्रसारण के दौरान इन टीवी चैनल्स की मुंह मांगी मुराद पूरी हो रही है तथा बढ़ती टीआरपी की वजह से ही समाचार प्रसारण के दौरान या किसी गर्मागर्म बहस के दौरान उन्हें भरपूर व्यावसायिक विज्ञापन प्राप्त हो रहे हैं।

दूसरी ओर इन दिनों यह भी देखा जा रहा है कि अधिक से अधिक लेखक व पत्रकार सत्ता की ख़ुशामद करने व उन्हें ख़ुश करने में लगे हुए हैं। इनमें कई तो ऐसे भी हैं जो स्वयं को समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष अथवा वाम या मध्यमार्गी विचारधारा का लेखक तो बताते हैं परंतु यदि आप उनकी टीवी डिबेट सुने या उनकी लेखनी पढ़ें तो आपको यही पता चलेगा कि ऐसे कई लोग किसी मान-सम्मान, अवार्ड या पुरस्कार की लालच में सत्ता की भाषा बोलते दिखाई देने लगते हैं। पत्रकारों की इसी लालसा ने व मीडिया समूहों के स्वामियों की शत-प्रतिशत होती जा रही व्यसायिक सोच ने ही ऐसे हालात पैदा कर दिए हैं कि अब पत्रकारिता को ‘पत्थरकारिता’ कहना ही ज़्यादा उचित प्रतीत होता है। यदि आपको उकसाऊ व भड़काऊ पत्रकारिता के कुछ जीते-जागते उदाहरण देखने हों तो अनेक टीवी चैनल के कार्यक्रमों के शीर्षक से ही आपको यह पता चल जाएगा कि प्रस्तोता के कार्यक्रम में क्या पेश किया जाने वाला है। उदाहरण के तौर पर हल्ला बोल, सनसनी, दंगल, टक्कर, गो तमाशा, ताल ठोक के जैसे कार्यक्रमों के शीर्षक क्या पत्रकारिता के मापदंड पर सही उतरते हैं? या फिर नमक-मिर्च-मसाला लगे हुए ऐसे शीर्षक केवल टीआरपी बढ़ाने के लिए व्यवसायिक दृष्टिकोण से बनाए जाते हैं? और ज़ाहिर है जब शीर्षक ऐसे हों तो कार्यक्रम प्रस्तोता भी इस शीर्षक तथा अपने स्वामी के दूरगामी मकसद अर्थात् टीआरपी बढ़ाने के उद्देश्य से अपनी बात शालीनता के साथ कहने के बजाए गरजता और बरसता हुआ दिखाई देता है।

सूत्र तो यह भी बताते हैं कि टीवी पर होने वाली कई बहस ख़ासतौर पर मंदिर-मस्जिद, हिंदू-मुस्लिम, तीन तलाक, अन्य धार्मिक मुद्दों, गाय, गंगा, लव जेहाद, गौरक्षक, पद्मावती जैसे अनेक विवादित मुद्दों पर होने वाली बहस में एंकर्स द्वारा जान-बूझ कर कार्यक्रम में भाग लेने वाले लोगों से ऐसे प्रश्र किए जाते हैं जिससे उसे ग़ुस्सा आए और ग़ुस्से में आकर वह व्यक्ति कुछ ऐसे उत्तर दे डाले जो विवाद का कारण बन सकें।

आपने अक्सर देखा होगा कि टीवी पर जब कभी दो पक्ष आपस में किसी विषय पर बहस में भिड़ जाते हैं उस समय प्रस्तोता की ओर से उन्हें और ढील दे दी जाती है। जबकि यदि एंकर चाहे तो उसी समय उनका माईक बंद कर सकता है और दूसरे अतिथि की ओर रुख़ कर सकता है। परंतु एंकर जान-बूझ कर दो प्रतिद्वंद्वी विचार के लोगों में बहस कराता है ताकि उसका बहुमूल्य समय भी गुज़र सके और लोगों को उस विवादित चटकारापूर्ण बहस में आनंद भी आ सके और इसी बदौलत उसकी टीआर पी भी बढ़ सके। परंतु दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि यह मीडिया समूहों के मालिक व उनके इशारों पर चंद पैसेां की ख़ातिर नाचने वाले प्रस्तोता यह नहीं जानते कि उनकी इस बदनीयती, बदज़ुबानी का ख़मियाज़ा भारतीय समाज और पूरे देश को भुगतना पड़ता है। निश्चित रूप से यह सब पत्रकारिता के लक्षण कतई नहीं हैं।

इन दिनों पूरे देश में ऐेसे ही एक टीवी शोमैन रोहित सरदाना के विरुद्ध ज़बरदस्त आक्रोश देखा जा रहा है। इसके विरुद्ध सैकड़ों एफ़आईआर दर्ज होने की ख़बरें हैं। कई जगह हिंदू-मुस्लिम सभी ने मिलकर सरदाना के विरुद्ध ज्ञापन दिए हैं तथा इसे न्यूज़ चैनल से हटाए जाने की मांग की है। एक टीवी शो में इसने अपनी एक सहयोगी पत्रकार के साथ हो रही एक बहस के दौरान हिंदू-मुस्लिम व ईसाई धर्म की कई आराध्य हस्तियों के साथ अभद्र शब्द का प्रयोग किया था। ख़बर तो यह है कि यह विवादित कार्यक्रम भी जान-बूझ कर इसी लिए तैयार किया गया था ताकि विवाद बढ़ने के बाद टीवी चैनल व एंकर्स को भारी शोहरत मिल सके।

दुर्भाग्यवश हमारे देश में नकारात्मक रूप से मिलने वाली प्रसिद्धि को भी सकारात्मक प्रसिद्धि के रूप में देखते हैं और कुछ क्षेत्रों में तो जान-बूझ कर इसीलिए विवाद खड़ा भी किया जाता है ताकि विवाद होने के बाद मीडिया में उसे अच्छा कवरेज हासिल हो सके। फ़िल्म पद्मावती को लेकर खड़े हुए बवाल के विषय में भी ऐसी ही बातें कही जा रही हैं। यदि आज पत्रकारिता भी इसी फ़ार्मूले का सहारा लेकर आगे बढ़ने की कोशिश कर रही है तो यह देश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य है। ऐसी पत्रकारिता से देश को बहुत बड़ा नुकसान हो सकता है।

आज हमारे समाज में जो भी दुर्भावना या वैमनस्य का वातावरण बनता दिखाई दे रहा है या चारों ओर से असहिष्णुता की जो ख़बरें सुनाई दे रही हैं उसकी सबसे बड़ी वजह यही है कि पत्रकारिता का वर्तमान दौर दरअसल ‘पत्थरकारिता’ काल बनता जा रहा है।

तनवीर जाफ़री

पहले स्कूली छात्रा से दोस्ती कर किया दुष्कर्म फिर करता रहा ब्लेकमेल और अब ….

हिरणमगरीमें एक स्कूली छात्रा को सोश्यल मीडिया पर दोस्त बना उससे दुष्कर्म और ब्लेकमेलिंग से रुपए ऐंठने के चित्तौड़ निवासी अभियुक्त को पोक्सो मामलों के विशिष्ट न्यायाधीश वीरेंद्रकुमार जसूजा की अदालत ने सोमवार को न्यायिक हिरासत में भेजने का आदेश दिया। आरोपी किशोरी को डरा-धमका कर कार से रानी रोड ले गया था, जहां पिस्टल दिखाकर मामला पुलिस तक नहीं ले जाने की धमकी भी दी थी। हिरणमगरी पुलिस ने दुष्कर्म ब्लेकमेलिंग के आरोपी आदिल पुत्र जमील खां को गिरफ्तार कर अदालत में पेश किया। आदिल चित्तौड़ के गांधीनगर में सेक्टर 4 का निवासी है। किशोरी के पिता ने 2 नवंबर को एसपी को परिवाद दिया था। एसपी के आदेश पर थाने में रिपोर्ट दर्ज की गई। पुलिस ने किशोरी के धारा 164 के बयान कराए थे। रिपोर्ट में बताया गया कि अभियुक्त आदिल ने किशोरी को फेसबुक फ्रेंड बनाकर जाल में फांसा था। इसके बाद वह उदयपुर आने लगा। नशीली वस्तु खिलाकर दुष्कर्म किया और आपत्तिजनक फोटाे खींच लिए थे। बाद में फोटो दिखाकर कई बाद दुष्कर्म किया। आरोप है कि आदिल ने ब्लेकमेलिंग कर कभी 5 हजार, कभी 10 हजार रुपए भी ऐंठ लिए। बाद में अगस्त में किशोरी को डरा-धमका कर कार से रानी रोड ले गया और पिस्तौल दिखाकर पुलिस में रिपोर्ट नहीं देने की धमकी भी दी। पीड़िता के पिता ने हिरणमगरी थाने में दर्ज कराई थी रिपोर्ट

A little known eating disorder is on rise- PICA – Dr. Kajal Verma

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Pica is the persistent eating of substances such as dirt or paint that have no nutritional value. Mineral deficiencies are occasionally associated with pica; however, biological abnormalities are rarely found in individuals with pica.
-People practicing forms of pica, such as geophagy, pagophagy and amylophagy, are more likely anemic, have low hemoglobin concentration in their blood, lower levels of red blood cells (hematocrit), or have lower plasma zinc levels.
– Specifically, practicing geophagy is more likely to associated with anemia or low hemoglobin.
– Practicing pagophagy and amylophagy were more highly associated with anemia.
– Additionally, being a child or pregnant woman practicing pica was associated with higher

डॉ. काजल वर्मा

chance of being anemic or having low hemoglobin relative to the general population.
-More recently, cases of pica have been tied to the obsessive–compulsive spectrum, and there is a move to consider OCD in the cause of pica.
-However, pica is currently recognized as a mental disorder by the widely used Diagnostic and Statistical Manual of Mental Disorders (DSM-IV). Sensory, physiological, cultural and psychosocial perspectives have also been used by some to explain the causation of pica.[citation needed]
It has been proposed that mental-health conditions, such as obsessive-compulsive disorder (OCD) and schizophrenia, can sometimes cause pica.

Causes

-Mineral deficiency specially iron deficiency
-Traumatic events/ stress:Maternal deprivationParental separation/ neglect
-Child abuse
-Disorganized family structure
-Poor parent-child interaction
-Low socio-economic status
Clinical Features
Child with habit of eating substances like clay, dirt, stones, pebbles, hair, faeces, lead, plastic, pencil, erasers, fingernails, paper, paint chips, coal, chalk, wood, plaster, light bulbs, needles, string, cigarette, wire and burnt matches etc.
A case with history of PICA may present with symptoms of:Constipation
Chronic or acute, diffuse or focused abdominal pain
Nausea/ vomitingLoss of appetite
On examination, findings like :Abdominal distension
PallorIron deficiency anaemia which could be the cause of PICA
Clinical presentation of PICA is variable and is associated with the specific nature of the resulting medical conditions and the indigested substances.Parasitic infestations are usually associated with PICA. Ascariasis is commonly seen in children with Pica.

Examples

Amylophagia – consumption of starch
Coprophagy – consumption of faeces
Geophagy – consumption of soil, clay or chalk
Hyalophagia – consumption of glass
Pagophagia – pathological consumption of ice
Trichophagia – consumption of hair or wool
Urophagia – consumption of urine
Xylophagia – consumption of wood.

Complications

There are many potential complications of pica, such as:
Certain items, such as paint chips, may contain lead or other toxic substances and eating them can lead to poisoning, increasing the child’s risk of complications including learning disabilities and brain damage. This is the most concerning and potentially lethal side effect of pica
Eating non-food objects can interfere with eating healthy food, which can lead to nutritional deficiencies.Eating objects that cannot be digested, such as stones, can cause constipation or blockages in the digestive tract, including the intestines and bowels. Also, hard or sharp objects (such as paperclips or metal scraps) can cause tears in the lining of the esophagus or intestines.Bacteria or parasites from dirt or other objects can cause serious infections. Some infections can damage the kidneys or liver.Co-existing developmental disabilities can make treatment difficult.

Pica Homeopathic Treatment
The homeopathic treatment for PICA is holistic and comprehensive.Homeopathy does not target the symptomsof Pica. The target of homeopathic treatment for Pica is the underlying cause that leads to development of Pica in a given individual.Once the underlying cause is removed with homeopathy or the deficiency is eliminated,the cravings disappear soon.Homeopathic treatment for Pica improves the body’s natural defense mechanisms or ‘immunity’ and prevents the occurrence of Pica. Thus, homeopathic treatment plays an excellent role as a ‘preventive’ and curative for Pica.Importantly, homeopathic treatment for Pica significantly diminishes the risk of development of nasty complications of Pica.

शराब बंदी का जादू – किडनी, लीवर और न्यूरो रोगियों में आई 44 प्रतिशत तक की कमी

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पोस्ट म्युज़ । बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने शराबबंदी को सामाजिक सद्भावना का प्रतीक बताते हुये इसे पूरे देश में लागू करने की  वकालत की और कहा कि बिहार में एक साल के अंदर ही किडनी और लिवर के रोगियों की संख्या 39 प्रतिशत तथा न्यूरो संबंधी बीमारियों से ग्रस्त रोगियों की संख्या 44 प्रतिशत घटी है।
जनता दल यूनाइटेड (जदयू) के अध्यक्ष  कुमार ने यहाँ दिल्ली के पार्टी कार्यकर्ताओं के एक सम्मेलन को संबोधित करते हुये बताया कि बिहार सरकार ने एक अध्ययन कराया है जिसमें शराबबंदी से पहले और उसके बाद के एक साल के दौरान सरकारी अस्पतालों में आने वाले मरीजों की तुलना की गयी। राज्य में 1 अप्रैल 2016 से शराब पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया गया था। उन्होंने बताया कि अध्ययन में पता चला कि स$डक दुर्घटनाओं एवं ट्रामा के मरीजों की संख्या में एक साल में 31 प्रतिशत की कमी आयी है।
इसके अलावा किडनी तथा लिवर के रोगियों की संख्या 39 प्रतिशत, मानसिक बीमारियों के मरीजों की संख्या 33 प्रतिशत और तंत्रिका तंत्र (न्यूरो) संंबंधी रोगों के मरीजों की संख्या 44 प्रतिशत कम हुई है।
जदयू अध्यक्ष ने कहा शराबबंदी को मुद्दा नहीं बनाने के लिए दूसरी पार्टियों पर निशाना साधते हुये कहा कि यदि यह बिहार और गुजरात में लागू हो सकता है तो पूरे देश में क्यों नहीं हो सकता। उन्होंने कहा कांग्रेस तथा वाम दल लंबे-चौडे भाषण देते हैं, लेकिन इसकी बात नहीं  करते और न ही इसके लिए कोई अभियान चलाते हैं। हालाँकि, उन्होंने बिहार में अपने सहयोगी दल भारतीय जनता पार्टी का नाम नहीं लिया।  कुमार ने कहा कि हिंदू, इस्लाम, सिख, बौद्घ और जैन, सभी धर्म शराब और नशे के खिलाफ हैं। सांप्रदयिक और सामाजिक सद्भावना का इससे बेहतर प्रतीक नहीं हो सकता। उन्होंने कहा कि इसके बावजूद चंद पढे-लिखे लोग इसे आजादी से जोडकर शराबबंदी का विरोध करते हैं।
उन्होंने कहा कि बिहार सरकार ने नशाबंदी लागू करने के साथ नशामुक्ति केंद्रों की भी स्थापना की थी। इन केंद्रों पर कराये गये त्वरित सर्वेक्षणों के अनुसार, शराबबंदी से अवसाद में 81 प्रतिशत और तनाव में 77 प्रतिशत की कमी दर्ज की गयी। इन केंद्रों में आने वाले मरीजों में 86 प्रतिशत स्वास्थ्य में सुधार हुआ, 75 प्रतिशत की आमदनी बढी, 83 प्रतिशत की बचत बढी और 86 प्रतिशत की काम करने की क्षमता बढी। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आँकडों के हवाले से  कुमार ने बताया कि जनवरी 2015 से मार्च 2016 के मुकाबले अप्रैल 2016 से सितंबर 2017 की अवधि में बिहार में हत्या के मामलों में 14 प्रतिशत, डकैती के मामलों में 23 प्रतिशत, बैंकों में डकैती के मामलों में 21 प्रतिशत और सडक दुर्घटना के मामलों में 10 प्रतिशत की गिरावट आयी है।
उन्होंने कहा कि वर्ष 2015 में प्रति लाख आबादी के लिए अपराध का राष्ट्रीय औसत 234.2 था जो वर्ष 2016 में मामूली गिरावट के साथ 232.3 रहा। इसी अवधि में बिहार में यह औसत 171.6 से घटकर 157.4 पर आ गया और पूरे देश में अपराध के मामले में वह २२वें स्थान पर रहा।

इंसानियत को शर्मसार करने वाली घटना एक कैंसर पीडिता के साथ गैंग रेप

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उदयपुर पोस्ट। लखनऊ में १६ वर्षीया ब्लड कैंसर पीडिता लडकी से गैंगरेप (gang rap )का मामला सामने आया है। घटना पूरी तरह से इंसानियत को शर्मशार कर देने वाली है, (cancer sufferers) पीडिता  के साथ पहले तो दो लडकों ने गैंगरेप किया और जब उसने मदद के लिए एक  बाइक सवार से गुहार लगाई तो उसने भी उसके साथ दुष्कर्म किया। लडकी ब्लड कैंसर से पीड़ित है और पिछले पांच सालों से लखनऊ के एक अस्पताल में उसका इलाज चल रहा है।
यह लडकी लखनऊ के बाहरी इलाके सरोजिनी नगर के एक गांव की रहने वाली है। घटना शनिवार की है जिन दो लडकों ने उसके साथ गैंगरेप किया, उनमें से एक उसकी जान-पहचान का है। लखनऊ पुलिस में अनुसार पीड़ित लडकी शनिवार शाम को पास में ही मार्केट गई थी। वहां उसके पहचान का लडका शुभम मिला, जिसने अपनी बाइक से उसे घर छोडने की बात कही। जब लडकी उसकी बाइक पर बैठ कर रवाना हुई तो वह बाइक लेकर एक सुनसान जगह पर पहुंच गया जहां उस लडके का एक अन्य साथी सुमित मौजूद था। दोनों लडकों ने उसके साथ गैंगरेप किया। रात में करीब ११ बजे दोनों लडके पीड़ित लडकी को सडक के किनारे छोडकर फरार हो गए।  पीड़ित लडकी वहीं पडी हुई थी, तभी एक स्थानीय कांट्रैक्टर अपनी बाइक पर वहां से गुजरा। पीडिता ने उसे रोककर अपनी साथ हुई घटना बताई और अपने घर पहुंचा देने का आग्रह किया। पीड़ित लडकी की मदद करने की बजाय वीरेंद्र यादव नामक इस शख्स ने भी उसके साथ रेप किया और वहां से भाग गया। लडकी सडक पर ही पडी रही। देर रात करीब २ बजे आसपास के कुछ लोगों ने पुलिस को सूचना दी। इसके बाद मौके पर पहुंची पुलिस ने लडकी को घर पहुंचाया। लखनऊ पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरु कर दी है, एक आरोपी युवक की पहचान सामने आने के कारण आरोपियों को पकडने में ज्यादा वक़्त नहीं लगेगा