छात्रों का चुनावी घमासान – कौन रहेगा मैदान में कौन होगा बाहर सस्पेंस है बरकरार

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उदयपुर। मोहनलाल सुखाडिया विश्व विद्यालय के छात्र संघ चुनावों में नामांकन भरने की प्रक्रिया आज संपन्न हो गयी नामांकन भरने के दौरान सभी प्रत्याशियों ने अपना अपना शक्ति प्रदर्शन और दम ख़म जम कर दिखाया और अपनी रैलियों में छात्रों की खासी भीड़ जुटाई। मुहूर्त के अनुसार चारों अध्यक्ष पद के दावेदारों ने तय समय पर केन्द्रीय छात्र संघ कार्यालय में चुनाव अधिकारी हिम्मत सिंह भाटी के समक्ष अपना नामांकन दाखिल किया इसके अलावा अन्य पदों के उम्मीदवारों ने भी अपना नामांकन दाखिल किया। नामांकन के दौरान लिंगदोह कमिटी की सिफारिशों की धज्जियां जम कर उडी ना तो कोई रोकने वाला था ना ही कोई परवाह करने वाला। इस बार तीनों अध्यक्ष पद के दावेदारों की और उनके समर्थकों की साँसे अटकी हुई है कि किसका परचा निरस्त होगा कोन चुनाव के योग्य होगा। नामांकन के दौरान साइंस कोलेज और कोमर्स कोलेज के बाहर एक तरह से चुनावी रण बना रहा। भाजपा और कांग्रेस के कई बड़े बड़े नेता अपने प्रत्याशियों की होसला बढ़ने के लिए आये। इधर जहाँ कल पुलिस बाहरी छात्रों की धर पकड़ कर रही थी वहीँ आज शक्ति प्रदर्शन सिर्फ बाहरी छात्रों के दम पर ही किया गया। सीएसएस के गोरव शर्मा ने अपना नामांकन दाखिल नहीं किया इसी के साथ सीएसएस चुनावी दौड़ से बाहर हो गयी .

IMG_9922 IMG_9993नामांकन के दौरान शक्ति प्रदर्शन : आज का दिन कोमर्स कोलेज के बाहर हंगामों के नाम ही रहा । एबीवीपी के नीरज सामर, एनएसयूआई के कृष्णपाल सिंह, और निर्दलीय मयूर ध्वज सिंह ने जुलुस के रूप में अपना शक्ति प्रदर्शन करते हुए नामांकन दाखिल किया। इसके अलावा उपाध्यक्ष, महामंत्री सचिव और संयुक्त सचिव के लिए भी एबीवीपी और एन एस यु आई की तरफ से नामांकन भरवाए गए। बाकी और भी छात्रों ने इन पदों के लिए नामांकन भरे है।
एनएसयुआई कृष्णपाल सिंह और एबीवीपी के नीरज सामर फतह स्कूल के बाहर से अपनी अपनी रैली का आगाज़ ढोल नगाड़े और आतिशबाजी के साथ किया नारे बाजी करते हुए कोमर्स कोलेज के पास डीएस डब्ल्यू ऑफिस पहुचे और नामांकन दाखिल किया। मयूर धवज सिंह  ने भी अपना शक्ति प्रदर्शन जम कर किया।
यूनिवर्सिटी से बीएन तक जाम की स्थिति :
सुबह १० बजे से यूनिवर्सिटी रोड से बी कोलेज रोड तक जाम की स्थिति बनी हुई है। हालाँकि बीन कोलेज रोड सेवाश्रम से सूरजपोल तक एक तरफ का रोड बंद कर एक तरफ़ा यातायात किया हुआ है। सूरजपोल से आने वालों के लिए रास्ता बंद है।

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छात्रों के जुलुस की वजह से दुर्गा नर्सरी रोड और कुमारों भट्टे पर तो घंटों घंटो तक जाम लगा रहा। हालाकिं यातायात पुलिस अधिकारी और जवान तैनात थे लेकिन फिर भी दिन तक जाम की स्थिति नहीं संभली।
केम्पस पुलिस छावनियो में तब्दील :
कोमर्स कोलेज साइंस कोलेज और केन्द्रीय छात्र संघ चुनाव कार्यालयों के बाहर पुलिस का खासा बंदोबस्त रहा पिछले दिनों छात्रों में आपस में लाते घूसों और लड़ाई के चलते पूरा एरिया पुलिस छावनी में तब्दील था सभी थानों के थाना अधिकारी और अन्य पुलिस अधिकारी भी यही तैनात थे। चुनाव कार्यालय के बहार किसी भी संगठन को ज्यादा रुकने और हो हल्ला करने की इज़ाज़त नहीं दी गयी और नामांकन भरने के लिए ही सिमित लोगों को प्रवेश दिया गया ।
बाहरी लोग और नेताओं का रहा जमावड़ा :
कल तक कोमर्स कोलेज व् साइंस कोलेज से बाहरी छात्रों को पुलिस बाहर निकाल रही थी जब की आज सुबह से कोलेज परिसरों में और छात्रों की रैलियों में बाहरी छात्रों का खासा जमावड़ा रहा। एन एस यु आई के कृष्णपाल सिंह के साथ कांग्रेसी नेता पंकज शर्मा, दिनेश श्रीमाली, गजेन्द्र सिंह शक्तावत, दीपक व्यास सहित कई नेता मोजूद थे वही नीरज सामर के साथ भाजपा नेता और नीरज के पिता प्रमोद सामर भाजपा जिलाध्यक्ष दिनेश भट्ट, चंचल अग्रवाल गजपाल सिंह, प्रवीण खंडेलवाल, मनीष शर्मा, सोनू आहारी आदि मौजूद थे।
इधर एनएसयूआई के नेता पूरी तरह दो गुट में बंटे हुए नज़र आये। एनएसयूआई के जिलाध्यक्ष यशवंत चौधरी सहित रिज़वान खान, दिनेश भोई मेकस खान सहित कई एनएसयूआई के छात्र नेता निर्दलीय मयूर ध्वज सिंह की रैली में नज़र आये और उनके साथ नामांकन तक साथ गए।

किसका होगा परचा निरस्त ? :
चरों प्रत्याशियों ने परचा तो भर दिया है लेकिन चारों प्रत्याशियों के खेमो में खलबली है कि किसका पर्चा निरस्त होगा। हालाँकि मयूर ध्वज सिंह और गौरव शर्मा हाईकोर्ट से राहत ले आये है। लेकिन कृष्ण पाल और नीरज सामर पर सस्पेंस बरकरार है। नामांकन आज ३ बजे तक दाखिल किये गए ३ से ५ बजे तक नामांकन की जाँच होगी और कल सुबह १० बजे वैध प्रत्याशियों की सूचि चस्पा की जाएगी। कल ११ से २ बजे तक प्रत्याशी नामांकन वापस ले सकता है।

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कश्मीर चाहिए कश्मीरी नहीं, क्या ऐसा हो सकता है ?

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भारत प्रशासित कश्मीर में चरमपंथी संगठन हिज़्बुल मुजाहिदीन के सशस्त्र कमांडर बुरहान वानी के मारे जाने के बाद घाटी में हुए विरोध और प्रदर्शनों के दौरान 50 से अधिक कश्मीरी युवक सुरक्षा बलों के हाथों मारे जा चुके हैं.

इन प्रदर्शनों में दो हज़ार से अधिक लोग घायल भी हुए हैं. इनमें सबसे दर्दनाक हालत उन लोगों की है जिनकी आँखों और चेहरे पर लोहे के छर्रे लगे हैं. अस्पताल घायल मरीज़ोें से अभी भी भरे पड़े हैं.

कश्मीरी महिलाएंImage copyrightAFP

सुरक्षा बलों के हाथों इतनी बड़ी संख्या में कश्मीरी युवाओं की मौत पर भारत में चुप्पी है. कुछ समाचार पत्रों में कुछ संपादकीय और लेख ज़रूर प्रकाशित हुए हैं जिनमें सुरक्षा बलों की ज़्यादतियों का कुछ उल्लेख हुआ है.

कश्मीर के संबंध में अधिकांश टीवी चैनल आक्रामक राष्ट्रवाद से भरा नज़रिया अपनाते हैं. उनकी चर्चाओं में कश्मीरी युवकों की मौत महत्वपूर्ण खबर नहीं बनती बल्कि उनका ध्यान इस पहलू पर केंद्रित दिखा कि सुरक्षा बलों के हाथों मारे गए सभी युवा एक आतंकवादी के समर्थन में बाहर निकले थे.

सोशल मीडिया पर बहुत बड़ी संख्या में ऐसे संदेश घूम रहे हैं जिनमें प्रदर्शन करने वाले कश्मीरी युवाओं को देशद्रोही कहा गया है और उनकी मौत को सही ठहराया गया है.

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दरअसल कश्मीर एक ऐसे दौर से गुजर रहा है जहां भारत सरकार और कश्मीर घाटी के अवाम के बीच संवाद पूरी तरह टूटा हुआ है. कश्मीर में प्रदर्शन, सभाएं, बैठकें और विरोध और प्रतिरोध के हर लोकतांत्रिक तरीके पर प्रतिबंध लगा हुआ है.

कश्मीरी अलगाववादियों की सभी गतिविधियों पर भी अंकुश लगा हुआ है. भारत – पाक कंट्रोल लाइन पर बेहतर चौकसी और पाकिस्तान की नीतियों में बदलाव के कारण चरमपंथी गतिविधियों और सशस्त्र संघर्ष के रास्ते काफ़ी हद तक बंद हो चुके हैं.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने अब तक ऐसा कोई कदम नहीं उठाया है जिससे यह पता चल सके कि कश्मीर के बारे में उनकी सरकार की नीति क्या है. इन से पहले मनमोहन सिंह की सरकार के दौरान भी यही हालत थी.

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अटल बिहारी वाजपेयी के अलावा किसी भी नेता ने कश्मीर के मसले को हल करने की कोई गंभीर कोशिश नहीं की. लेकिन मोदी सरकार ने साफ़ किया है वो अलगाववादियों से हरगिज बात नहीं करेगी.

केंद्र में भाजपा की एक राष्ट्रवादी सरकार है. कश्मीर में भी भाजपा का शासन है. ये सभी को पता है कि कश्मीर समस्या का समाधान पाकिस्तान से संबंध बेहतर करने में निहित है लेकिन दस साल तक मनमोहन सिंह की सरकार ने पाकिस्तान से संबंध बेहतर करने के लिए कुछ नहीं किया.

पिछले दो साल में जो कुछ संबंध बचे थे वह भी खत्म हो गए. पिछले 15-20 साल यूं ही बर्बाद किए गए. इस अवधि में कश्मीर में एक नई पीढ़ी ने किशोरावस्था की दहलीज पर क़दम रखा है. निराशा और बेबसी उनकी सोच और समझ पर हावी हो चुकी है.

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केंद्र और राज्य सरकारों ने बीते हुए वर्षों में ऐसा कुछ भी नहीं किया कि वह उन पर तिनका भर भी विश्वास कर सकें. पिछले 70 साल घाटी की जनता भारत से कभी भी इतना आक्रोशित और आशंकित नहीं हुई, जितना इतिहास की इस मंजिल पर हैं.

भारत में कश्मीरियों के लिए किसी तरह के सहानुभूति के भाव नहीं है. भारत की नई राष्ट्रवादी पीढ़ी के लिए कश्मीरी युवा आतंकवादी, अलगाववादी, पाकिस्तान समर्थक और देश दुश्मन से ज़्यादा कुछ नहीं हैं. उनके मरने, अंधे और अपाहिज होने से यहां सहानुभूति के भाव पैदा नहीं होते. बल्कि कठिन परिस्थितियों में काम करने के लिए सुरक्षा बलों की प्रशंसा होती है.

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यह एक पूर्ण गतिरोध की स्थिति है. कश्मीरी युवाओं के लिए अभिव्यक्ति के सारे रास्ते बंद हैं. दोनों ओर आपसी नफ़रतें चरम पर हैं. बुरहान वानी इसी बेबसी और घुटन का प्रतिबिम्ब था. उसके जनाज़े और प्रदर्शनों में लाखों युवाओं की भागीदारी भी इसी घुटन और बेबसी का प्रतीक है.

Source – BBC HINDI 

लेखक – शकील अख्तर, बीबीसी संवाददाता 

काश…अमेरिका ने सद्दाम हुसैन को नहीं मारा होता

“दैया प्रेम”  की कलम से 

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उदयपुर। तेल के खेल में अमेरिका जब इराक के इस शासक सद्दाम हुसैन की तलाश कर रहा था तो दुनिया की कई बड़ी शक्‍ितयां खुश हो रही थीं। अमेरिका के साथ कदमताल कर रहे मिञ देशों की खुशी देखते बनती थी। लेकिन इससे अलग कुछ और विद्रोही ताकतें खुश हो रही थीं। ये ताकतें पूरा दम लगाने के बाद भी इराक के इस शासक का कुछ नहीं बिगाड़ पा रही थीं। वह राजा था। खाड़ी देशों का। उसने शायद यही फार्मूला अपनाया था। जीयो और जीने दो। वह सख्‍त था। अत्‍यधिक चतुर था। ताकतवर भी कम नहीं था। एक बड़ी फौज बना रखी थी उसने। शायद इतनी बड़ी कि अमेरिका जैसे downloadदेश को वह वास्‍तविक चुनौती दे सके। जैसे ही अमेरिका इराकी शासक के पीछे लगा, आतंकी ताकतें की बाछें खिल गईं। दरअसल इराक सहित अन्‍य खाड़ी देशों में कई कट्टरपंथी या आतंकी ताकतें सक्रिय थीं। वे सब मानवता के दुश्‍मन थे। मानवता के इन दुश्‍मनों से कैसी मानवता। सद्दाम हुसैन ने इन ताकतों को नियंञित कर के रखा था। जब भी ये ताकतें उठने की कोशिश करतीं, इराकी शासक उन्‍हें नेस्‍तनाबूत कर देता था। सामूहिक रूप से उड़ा देता था उन्‍हें। पकड़ जाने पर उन्‍हें सजा-ए-मौत तक दी जाती थी। यही वजह रही कि ये आतंकी ताकतें इराक और उसके इर्द गिर्द ही सिमटी रहीं और वे ज्‍यादा प्रभावी नहीं रहीं। इराकी शासक ने उन्‍हें पनपने ही नहीं दिया। ये आतंकवादी सद्दाम हुसैन के नाम से खौफ खाते थे। उन्‍हें अपने ईश्‍वर से उतना डर नहीं था जितना सद्दाम हुसैन से।
लेकिन शायद दुनिया को यह शांति मंजूर नहीं थी। अमेरिका इराक के तेल कुओं को हथियाना चाहता था। लेकिन सद्दाम हुसैन के रहते ऐसा संभव नहीं था। अमेरिका ने इराक के दुश्‍मन देशों या उन देशों को भड़काना शुरू किया जो इराक से मनमुटाव रखते हैं। तेल के विवाद को लेकर ही इराक का कुवैत के साथ झगड़ा हुआ। यह झगड़ा इतना बढ़ गया कि इराक ने कुवैत पर हमला कर दिया। इसका द्वश्‍य सिनेमा एयरलिफ्ट में दिखाया गया है। जिन साथियों ने यह सिनेमा देखा हो तो उन्‍हें विवाद के बारे में याद होगा।
कुवैत पर हमला करते ही अमेरिका को मौका मिल गया। उसने कुवैत की मदद की। और सद्दाम हुसैन की जान के पीछे पड़ गया। अंत में सद्दाम हुसैन को अमेरिका ने बंदी बना लिया और फांसी दे दी। फांसी के वक्‍त उसने अपने मुंह को नहीं ढंका था। कहा था- मैं आज भी इराक का शासक हूुंं। आज से नया वक्‍त शुरू होगा। उसने दुनिया को चेतावनी दी थी। और तब वह फांसी के फंदे को खुद ही स्‍वीकार कर लिया। एक शासक की तरह।
सद्दाम हुसैन की मौत के साथ ही उस आतंकी संगठन का उदय हुआ जिससे आज पूरी दुनिया कांप रही है। इस्‍लामिक स्‍टेट यानी आइएसआइएस। यह अब पूरी दुनिया पर हावी हो चुका है। एक के बाद एक यूरोपीय देशों को आइएसआइएस निशाना बना रहा है। वह बेलगाम हो चुका है। पूरी दुनिया मिलकर इस आतंकी संगठन का खात्‍मा नहीं कर पा रही है। आज दुनिया सद्दाम हुसैन को याद कर रही है। अगर वो जिंदा होता तो आइएआएस को पैदा नहीं होने देता। आज पूरी दुनिया सद्दाम हुसैन की मौत का खामियाजा भुगत रही है। यह आतंकी संगठन सऊदी अरब तक अपनी पहुंच बना चुका है। इसका निशाना दुबई भी है। क्‍योंकि यहां बड़ी संख्‍या में विदेशी रहते हैं। यह विश्‍व व्‍यापार का केंद्र है। भारतीयों को खाड़ी देशों में सतर्क रहना होगा।
सद्दाम हुसैन भाारत का दोस्‍त था। उसने भारत से मदद की उम्‍मीद जताई थी लेकिन भारत ऐसा नहीं कर पाया। यहां की राजनीतिक इच्‍छशक्‍ित इतनी नहीं थी कि वो अमेरिका को फैसला वापस लेने के दबाव बना सके।
आज दुनिया यही कह रही है
…..काश सद्दाम हुसैन को नहीं मारा होता।

वरुण मॉल की दो मंजिल टूटेगी – हाईकोर्ट का फैसला

varun mallउदयपुर। भड्भुजा घाटी स्थित वरुण मॉल के ऊपर की दो मंजिले तोडने के आदेश जोधपुर हाईकोर्ट की डबल बैंच ने सूना दिया । पूर्व मे सिंगल बैंच ने व्यापारियों को राहत देते हुए दो करोड़ रुपये नगर निगम मे जमा करवा वरुण मॉल खोलने के आदेश दिए थे, जिसके बाद नगर निगम ने डबल बैंच मे अपील की थी। डबल बैंच ने आज फैलसा सूना दिया कि वरुण माल का नियमन नहीं किया जासकता इसलिए दो मंजिले तोड़ कर व्यावसायिक परिवर्तन किया जाय।
एक बार वरुण मॉल के व्यापारियों के सर फिर से आफत सर पर आगई। वरुण माल के ८४ व्यापारी पिछले पांच माह से बेरोजगार वरुण माल खुलने का इंतज़ार कर रहे है। खत्री समाज ने अपने इस मॉल को नियमन के लिए हाईकोर्ट मे अर्जी लगाईं थी जिसका कुछ दिन पहले ही आदेश आया था कि दो करोड़ रुपये नगर निगम मे जमा करवा कर दुकाने खोल दी जायें। खत्री समाज ने पांच दिन पूर्व ही नगर निगम मे दो करोड़ रुपये का ड्राफ्ट जमा करवाया था। ड्राफ्ट लेकर नगर निगम ने हाईकोर्ट की डबल बैंच मे अपील की थी जिसकी पहली ही सुनवाई मे डबल बैंच ने फैसला सुनाते हुए कहा कि वरुण मॉल को नियमित नहीं किया जासकता। नियमन करने के लिए नगर निगम को ऊपर की दो मंजिले गिराने के लिए निर्देशित किया है। खत्री समाज के अध्यक्ष विजय अरोड़ा ने बताया कि अभी वह जोधपुर मे ही है। उदयपुर आकर समाज की बैठक के दौरान आगे की रणनीति का फैसला लिया जायेगा । समाज द्वारा सुप्रीम कोर्ट मे अपील लगाईं जासकती है।
वरुण माल की ऊपर के दो मंजिले गिराने का आदेश सुनते ही व्यापारियों और उनके घरों मे एक तरह से मातमी माहोल हो गया है। कई व्यापारियों ने अपनी जीवन भर की पूंजी लगा दी थी।
गौरतलब है कि फरवरी माह मे नगर निगम द्वारा कारवाई कर भड्भुजा घाटी स्थित वरुण मॉल को सीज कर दिया था। वरुण माल मे अनियमितताएं थी व्यावसायिक स्वीकृति नहीं थी और ऊपर की दो मंजिलों की भी स्वीकृति नहीं ली हुई थी। खत्री समाज के वरुण माल को नियमित करवाने के लिए हाईकोर्ट मे अपील की थी।

हार्दिक पटेल पर उदयपुर पुलिस ने कसा शिकंजा – हद याद दिलाई

hardik patelउदयपुर. गुजरात में पाटीदार आरक्षण आंदोलन के कमांडर हार्दिक पटेल को  राजद्रोह की सजा के तहत उसकी कानूनी हद  समझाने के लिए उदयपुर रेंज के आईजी और जिला पुलिस अधीक्षक ने बुधवार को तलब किया। दोनों अफसरों ने हार्दिक को गुजरात हाईकोर्ट का सशर्त आदेश बताकर कहा कि वह अपने अस्थायी प्रवास से बाहर आ-जा नहीं सकते हैं। यह भी गौरतलब हे कि हार्दिक का प्रवास प्रदेश के गृहमंत्री के गृहक्षेत्र में है।

खुद हार्दिक ने अफसरों की मुलाकात के बाद मीडिया को बताया कि उसे अस्थायी प्रवास से बाहर आने-जाने के लिए  मना किया गया है।   इस बारे में अफसरों ने हार्दिक को हाईकोर्ट से सशर्त आदेश  की पालना करने के लिए पाबंद किया है। हार्दिक का कहना है कि उसे गुजरात में जाने से अदालत ने मना किया है लेकिन अपने अस्थायी प्रवास से बाहर निकलने के लिए कोई पाबंदी नहीं है।  इस बारे में हार्दिक अपने वकील से कानूनी राय भी लेंगे।

छेड़ रखी है आंदोलन की बात

हार्दिक जब से उदयपुर में आया है तब से जनजाति उपयोजना क्षेत्र में ओबीसी वर्ग को आरक्षण दिलाने की मांग प्रबल हुई है। जबकि डांगी पटेल समाज ने आरक्षण की मांग उठाते हुए इस बारे में हार्दिक से भी आंदोलन में खुला समर्थन मांगा है। जबकि गुर्जर आरक्षण आंदोलन के अगुवा नेता भी हार्दिक को लेकर गुजरात से उदयपुर आए थे और राजस्थान में भरतपुर, बयाना, करौली आदि जिलों का दौरा कराने के बाद  भी खुले मंच से कह चुके हैं।

बुधवार को ही अपना जन्मदिन मनाने के लिए गुर्जर बाहुल्य इलाके नाथद्वारा गए हैं। ऐसे में माना जा रहा है कि पुलिस के लिए  यह एक नया काम शुरू हो गया है कि हार्दिक पर कड़ी नजर रखी जाए।

कश्मीर में ज़िंदगियों पर छाया अंधेरा

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ये तस्वीर श्रीनगर के एक अस्पताल के बिस्तर पर दर्द में कराहती 14 साल की इंशा मुश्ताक़ की है.

दक्षिण कश्मीर की रहने वाली मुश्ताक़ की मां रज़िया बेगम उनके जल्द ठीक होने की दुआ मांग रही हैं.

महाराजा हरि सिंह अस्पताल के आईसीयू में भर्ती इंशा के चेहरे पर इतने छर्रे लगे हैं कि उनका चेहरा सूजकर पूरी तरह से विकृत हो गया है.

डॉक्टरों का कहना है कि इंशा की हालत गंभीर है. इंशा के पिता मुश्ताक़ अहमद मलिक सदमे में हैं. वो बड़ी मुश्किल से कुछ बोल पाने की हालत में हैं.

अस्पताल के कॉरिडोर में खड़े मलिक कहते हैं, “वो परिवार के दूसरे लोगों के साथ घर के पहले माले में थी. शाम का वक्त था. मैं नमाज़ पढ़ने मस्जिद गया था. उसने खिड़की से झांककर देखा और सीआरपीएफ के जवान ने बहुत नज़दीक से उसपर छर्रे दाग दिए.”

गहरी सांस भरते हुए रज़िया बेगम कहती हैं, “वो दर्द से रोते हुए कह रही थी, मां मैं मर रही हूं.”

कश्मीर में छर्रों से आंखों को नुक़सान

श्रीनगर के सरकारी मेडिकल कॉलेज के नेत्र विज्ञान विभाग के प्रमुख डॉ तारीक़ कुरैशी कहते हैं, “उसकी दोनों आंखें बुरी तरह से ज़ख्मी हैं और उसकी दृष्टि लौटने की कोई उम्मीद नहीं है. हमारे पास ऐसे 117 मामले आए हैं.”

छर्रों से ज़ख्मी होने के कारण सात लोग पूरी तरह से आंखों की रोशनी खो चुके हैं. आंखों में चोट वाले 40 लोगों को अस्पताल से छुट्टी दे दी गई है.

डॉक्टर कुरैशी का कहना है कि जो आंखें छर्रों से ज़ख़्मी हुई हैं उनमें पूरी तरह से रोशनी लौटने की संभावना बेहद कम है.

8 जुलाई को सरकारी बलों ने दावा किया था कि लोकप्रिय स्थानीय चरमपंथी नेता बुरहान वानी को मारकर उन्हें एक बड़ी कामयाबी मिली है.

वानी के मारे जाने के बाद से कश्मीर घाटी में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन शुरू हुए.

सड़कों पर हो रहे विरोध प्रदर्शनों को विफल करने के लिए सरकार ने कड़े कर्फ्यू नियम लागू किए हैं.

हालांकि युवाओं ने इन नियमों की अनदेखी करते हुए कश्मीर के ज्यादातर इलाकों में प्रदर्शन किए जिससे कई नागरिकों की मौत के साथ हज़ारों प्रदर्शनकारियों को गहरी चोटें आई हैं.

सरकारी बल बुलेट, आंसू गैस के गोले, पेपर गैस और छर्रों का इस्तेमाल प्रदर्शनकारियों पर कर रही है.

कश्मीर आंखों में छर्रे

अमृतसर के सरदार बहादुर डॉ सोहन सिंह नेत्र अस्पताल में वरिष्ठ रेटिनल सर्जन डॉक्टर प्रीतम सिंह कहते हैं कि उनके पास लगातार कश्मीर से मरीज़ आ रहे हैं जो छर्रों से आंशिक या पूरी तरह से अंधे हो गए हैं.

डॉक्टर सिंह ने कहना था, “छर्रे आमतौर पर आंखों में छिद्रित चोटें पहुंचाती हैं. चूंकि ये मानव शरीर का बहुत ही नाजुक अंग होता है और ज्यादातर मामलों में ये रेटिना को नष्ट कर देता है. ये छर्रे लोगों की जान तो नहीं लेते पर ज़िन्दगी भर के लिए पंगु ज़रूर बना देते हैं.”

सरकारी बलों पर मानक संचालन प्रक्रिया(एसओपी) के उल्लंघन के आरोप लग रहे हैं जिससे उनकी कड़ी आलोचना हो रही है.

एसओपी के नियमों के तहत बहुत ही बेकाबू स्थिति में पैरों को निशाना बनाने की हिदायत है.

लेकिन विभिन्न अस्पतालों में भर्ती 90 फीसदी से ज्यादा लोगों को कमर से ऊपर के हिस्से में चोटें आई हैं.

नाम नहीं बताने के शर्त पर एक डॉक्टर ने कहा, “सरकारी बल जानबूझकर छाती और सिर को निशाना बना रहे हैं. उनका उद्देश्य मारने का है.”

कश्मीर का अस्पताल

जिस अस्पताल में इंशा का इलाज चल रहा है, वहां दर्द और पीड़ा की कहानियां चारों तरफ़ से सुनाई पड़ती है.

ज्यादातर पीड़ित बात नहीं करना चाहते या नहीं चाहते कि उनकी तस्वीरें खींची जाए क्योंकि पुलिस एजेंसियां उनपर नज़र रखे हुए है.

इस वॉर्ड के बिस्तर पर 16 साल के आमिर फयाज़ गनाई लेटे हुए हैं. वो कश्मीर के बडगाम जिले के चरार-ए-शरीफ़ में 11वीं कक्षा में पढ़ते हैं.

गनाई कहते हैं, “10 जुलाई को मैं अपने दोस्त के घर जा रहा था और विरोध प्रदर्शन चल रहे थे. अचानक बहुत ज़ोर से मेरी बाईं आंख पर कुछ लगा. पूरी तरह से ब्लैकआउट हो गया. मुझे लगा कि गोली लगी है और मैं मर जाऊंगा.”

कमरे के कोने में गनाई के बिस्तर के बगल में एक नर्स 17 साल के शबीर अहमद डार के दाहिनी आंख की जांच कर रही है.

कश्मीर छर्रे से ज़ख़्मी

गनाई के मुकाबले डार की हालत ज्यादा गंभीर है. डॉक्टरों के मुताबिक डार अपने दाहिनी आंख की रोशनी खो सकते हैं.

आंखों के डॉक्टरों की तीन सदस्यों की एक टीम नई दिल्ली के एम्स अस्पताल से कश्मीर भेजी गई है जो संकट की इस घड़ी में घाटी के डॉक्टरों को सहयोग देगी.

इस टीम का नेतृत्व करने वाले डॉक्टर सुदर्शन के कुमार ने घाटी के डॉक्टरों की कोशिशों की सराहना की है.

मरीज़ों की जांच करने के बाद डॉक्टर कुमार ने कहा कि वहां के डॉक्टरों को ‘युद्ध जैसी स्थिति’ से जूझना पड़ रहा है.

Source – BBC HINDI NEWS 

आपकी जिंदगी को खतरे में डाल सकता है नाई से गर्दन और सिर की मसाज करवाना

Neck massageउदयपुर . नाई से गर्दन और सिर की मसाज करवाना आपकी जिंदगी को खतरे में डाल सकता है। 40 साल के व्यापारी बाबू रेड्डी इसका उदाहरण हैं। उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि गर्दन चटकवाने की कीमत 24 घंटे इमरजेंसी में भर्ती होकर चुकानी पड़ेगी। बाबू स्थानीय सैलून में गर्दन की मसाज कराने गए थे। उन्होंने सोचा था कि आराम महसूस होगा लेकिन उन्हें वर्टेब्रा-बॉयलर स्ट्रोक पड़ गया।

इस वाकये के बारे में बाबू रेड्डी बताते हैं कि गर्दन से चट्ट की आवाज आई, उन्हें लगा कि मसाज सफल हो गई है। लेकिन घर आते ही वह असहज महसूस करने लगे और थोड़ी देर बार सीधे चल भी नहीं पाए। उन्हें अस्पताल के आपातकालीन वार्ड में भर्ती कराना पड़ा। उनकी सांसें अनियमित थीं और ब्लड प्रेशर बढ़ गया था। डॉक्टरों को बाबू रेड्डी को वेंटिलेटर पर रखना पड़ा।

बाबू का इलाज करने वाले डॉ महेश संभशिवम का कहना है कि एमआरआई करवाने पर पता चला कि उनकी धमनी में खून की सप्लाई रुक गई है और उनको वर्टेब्रा-बॉयलर स्ट्रोक पड़ गया है। जांच में पता चला कि बाबू रेड्डी नियमित तौर पर नाई से गर्दन और सिर की मसाज करवाने के आदी हैं।

उनकी मसाज गर्दन के चटकने के साथ ही खत्म होती है। डॉक्टर महेश संभशिवम का कहना है कि अगर वक्त पर उनका इलाज नहीं किया जाता तो उनकी स्थिति और बिगड़ सकती थी। बाबू रेड्डी को गर्दन चटकवाने पर स्ट्रोक पड़ गया था। दरअसल जिस नाई ने बाबू रेड्डी की मसाज की थी वह अच्छी तरह से ट्रेंड नहीं था। यह एक न्यूरोलॉजिकल संबंधी समस्या है।

व्ही-बॉयलर स्ट्रोक

यह एक न्यूरोलॉजिकल समस्या है

मधुमेह और उच्च रक्तचाप से भी हो सकती है यह समस्या

गलत तरीके से बैठने से होने लगती है समस्या

गर्दन और सिर की नियमित मसाज कराने से रहता है स्ट्रोक का खतरा

वर्टिब्रल आर्टरी डिसेक्शन आमतौर पर सेरिब्रल स्ट्रोक की वजह से होता है। इसके अलावा अनियमित दिनचर्या, मधुमेह और उच्च रक्तचाप वाले लोगों को भी इस स्ट्रोक की आशंका रहती है। 

डॉ. महेश संभशिवम, बेंगलुरू

मौका परस्त सीएसएस ( MLSU – STUDENT ELECTION )

cssउदयपुर।  मेवाड़ की छात्र राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाकर एक दशक तक विजय पताका फहराने वाली छात्र संघर्ष समिति (सीएसएस) ने एक  योजना के तहत गत वर्ष हुए चुनावों में भागीदारी न करके एबीवीपी को समर्थन दे दिया था। हमेशा से ही मौका परस्त रही सीएसएस के जिस संगठन को सैंकड़ों छात्रों ने मेहनत कर खड़ा किया उसे उसके कर्ताधर्ताओं ने एक ही झटके में अपने स्वार्थ को लेकर एबीवीपी में विलय कर दिया। विलय का प्रमुख कारण यह था कि सीएसएस के पदाधिकारी एबीवीपी व भाजपा के युवा मण्डलों में अपने पद चाहते थे लेकिन विलय के बाद भी पदाधिकारियों में से किसी को भी  कोई पद नहीं दिया गया तो वह अब पुन: छात्रसंघ चुनावों में अपनी ताल ठोकने की तैयारी कर रही है। हालांकि सीएसएस चुनाव लड़ेगी या नहीं इस पर अब भी संशय बना हुआ है।
सुविवि को दिए चार अध्यक्ष: संघ पृष्ठभूमि वाले कुछ नाराज छात्र नेताओं ने छात्र संघर्ष समिति बनाई। सीएसएस का उद्भव 2004 में एबीवीपी से ही हुआ था। सीएसएस का पहला चुनाव रवि शर्मा ने लड़ा और वे छात्रसंघ अध्यक्ष बने। छात्र हितों के कार्य कर इस संगठन में विश्वविद्यालय में अपनी पकड़ मजबूत की और दिलीप जोशी, परमवीर सिंह चुण्डावत, अमित पालीवाल के रूप में तीन अध्यक्ष विजयी हुए। सीएसएस का वजूद खत्म होने के बाद और पदाधिकारियों द्वारा अपने स्वार्थ लोलुपता में लिए निर्णय के बाद परमवीर सिंह और अमित पालीवाल अब अलग संगठनों से जुड़ गए है।
करार टूटा तो फिर उतरी मैदान में: गत वर्ष खेरवाड़ा विधायक नाना लाल अहारी के पुत्र सोनू अहारी ने चुनाव में खड़ा होकर सारे समीकरण खत्म कर दिए थे। सुखाडिय़ा युनिवर्सिटी के इतिहास में इतने धनबल का उपयोग नहीं हुआ जो पिछले साल देखा गया। एक दशक से अजेय रही छात्र संघर्ष समिति ने भी नतमस्तक होकर एबीवीपी को समर्थन दे दिया था। छात्रसंघर्ष समिति के आयोजक कटारिया विरेाधी गुट से माने जाते रहे है, जो पूर्व अध्यक्ष पंकज बोराणा के समय खुलकर सामने आई थी, बडगांव सरपंच कैलाश शर्मा अपने पुत्र दीपक शर्मा को एबीवीपी से चुनाव लड़वाना चाहते थे और कटारिया बोराणा के नाम पर अड़ गए। हालांकि उस समय दीपक शर्मा को हार मिली थी, लेकिन छात्र संघर्ष समिति का हमेशा के लिए बीजेपी व एबीवीपी से विरोध हो गया।
ब्राह्मण व परिवार के सदस्य ही प्रत्याशी: परमवीर सिंह को छोड़ दे तो छात्र संघर्ष समिति ने आज तक ब्राह्मण व परिवार के सदस्यों को ही छात्रसंघ अध्यक्ष पद का उम्मीदवार बनाया और इस बार भी इसी तरह उम्मीदवार को मैदान में उतारना तय किया गया है। चुनाव के लिए गौरव शर्मा ने भी कैम्पेनिंग भी शुरू कर दी है, जो गत वर्ष भी सीएसएस की ओर से अध्यक्ष पद के दावेदार थे लेकिन एनवक्त पर एबीवीपी में विलय कर सीएसएस ने चुनाव नहीं लड़ा था। सीएसएस में छात्र नेताओं की बात करें तो इस संगठन के प्रवक्ता पद पर रहे निखिल रांका की छात्रों में अच्छी पेठ है लेकिन ब्राह्मण गुट का ही प्रत्याशी उतारना इस संगठन की प्रमुखता है।
॥यह बात सच है कि सालभर हमारी ओर से कोई स्टेटमेंट नहीं आया, लेकिन छात्र हितों के लिए दोनो ही राष्ट्रीय संगठनों ने भी कुछ हीं किया। हम फिर से पूरी ताकत के साथ उतरेंगे और जीतेंगे।
– अशोक शर्मा, सदस्य,संरक्षक मण्डल
॥सीएसएस आज तक छात्रहित के जिन मुद्दों पर चुनाव लड़ती रही है, एबीवीपी ने उसी हिसाब से काम करने का वादा किया था। चुनावी एजेंडा भी हमारा लेकर चुनाव लडा इसलिए समझौता किया था, लेकिन वादा खिलाफी हुई जिस कारण फिर से चुनाव लडेंगे।
– सूर्य प्रकाश सुहालका,  मुख्य संयोजक
॥एबीवीपी ने हमसे वादा खिलाफी की। छात्र हितों के लिए किसी तरह के काम वर्षभर में नहीं हुए।
– दिलीप जोशी, पूर्व अध्यक्ष सीएसएस

60 की उम्र में भी जवां रहना है तो रोजाना पीजिए अनार का रस

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pomegranateउदयपुर। सेलिब्रिटी हो या आम इंसान उम्र चाहे कितनी ही बढ़ जाए, लेकिन जवां दिखने की चाहत हर किसी में होती है। इसके पीछे कोई जिम में पसीना बहाता है तो कोई ब्यूटी पार्लर के चक्कर काटता है। अगर आप भी अपनी बढ़ती उम्र में छिनती खूबसूरती को लेकर परेशान हैं तो बेिफ्रक हो जाएं, क्योंकि अनार का रस आपकी बढ़ती उम्र को थामकर आपको हमेशा जवां रख सकता है। इसका खुलासा एक अध्ययन में किया गया है।

इसका दावा है कि अनार में पाया जाने वाला यूरोलिथिन ए कोशिकाओं में नई ऊर्जा का संचार करता है। उनमें डिफेक्टिव माइटोकॉन्ड्रिया के घटकों को रिसाइकिल करने की क्षमता आ जाती है और इस प्रकार एक नई प्रक्रिया पुन: शुरू हो जाती है और बढ़ती उम्र के प्रभाव थम जाते हैं। इस अध्‍ययन को स्विटजरलैंड में एक रिसर्च इंस्‍टीट्यूट में पैट्रिक एबीसेचर ने किया है। एबीसेचर का कहना है कि अनार का जूस पूरी तरह से प्राकृतिक पदार्थ है, जो कि शरीर को भरपूर ताकत और ऊर्जा देता है।

अध्‍ययन करने के लिए टीम ने सबसे पहले हाईपोथेसिस को टेस्‍ट किया और उसके बाद उन्‍होंने परीक्षण को आखिरी रूप में किया। इस पूरे अध्‍ययन में उन्‍हें चौंकाने वाले परिणाम मिले कि 8-10 दिन में ही एंटी-एजिंग इफेक्‍ट दिखना शुरू हो गया था। साथ ही अध्‍ययन में यह भी निष्‍कर्ष निकले हैं कि यूरोलिथिन ए हमारी आंतों को स्‍वस्‍थ बनाता है और पाचन क्रिया को दुरूस्‍त करता है।

इस अध्‍ययन को मानवों पर करने से पहले चूहों पर लगभग 2 साल तक किया गया था कि यूरोलिथिन का शरीर पर सूक्ष्‍म प्रभाव क्‍या होता है। एक नियंत्रित समूह में लगभग दो साल तक सभी चूहों का अंडरऑब्‍जर्वेशन में रखा गया था। बाद में मानवों पर करके निष्‍कर्ष को जर्नल में प्रकाशित किया गया है। इसका मतलब यह है कि अनार के जूस का सेवन करने से बढ़ती उम्र के प्रभाव थम जाते हैं और त्‍वचा भी दमकदार बनी रहती है।

आपको बता दें जब अनार के जूस का सेवन करते हैं तो हमारे शरीर से यूरोलिथिन ए प्रोड्यूस होती है जो कि एक प्रकार की मॉलीक्‍यूल है। जब यह मॉलीक्‍यूल, गट में माईक्रोबेस के द्वारा बदल जाती है तो य‍ह मांसपेशियों की कोशिकाओं की रक्षा करता है और उन्‍हें उम्र बढ़ने के साथ बढ़ने वाले प्रभावों को स्‍पष्‍ट होने से रोकता है।

रोजाना 2617 बार छूते हैं हम अपना स्मार्ट फोन

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mobaileउदयपुर। हाल ही एक सर्वे में यह चौकाने वाला तथ्य सामने आया है कि स्मार्टफोन का इस्तेमान करने वाले रोजना करीब 2 हजार 617 बाद अपने फोन की टच स्क्रीन को छूते हैं।

सर्वेक्षण के लिए एक लाख से ज्यादा लोगों में से अलग-अलग जगह के 94 लोगों को चुना गया। सर्वे को सही माने तो सामान्यतौर पर लोग साल में करीब 10 लाख बार अपना स्मार्टफोन छूते हैं, वहीं ज्यादा इस्तेमाल करने वालों में यह संख्या 20 लाख तक पहुंच जाती है।

सर्वेक्षण में पाया गया कि औसत इस्तेमाल करने वाले व्यक्ति के स्मार्टफोन की स्क्रीन 2.42 घंटे ऑन रहती है। वहीं बहुत ज्यादा इस्तेमाल करने वालों में यह समय 3.75 घंटे तक हो जाता है।

यह वह समय है, जो लोग अपने फोन पर कुछ लिखते हुए या फेसबुक जैसी सोशल साइट पर बिताते हैं। सर्वेक्षण में शामिल 87 फीसद लोगों ने रोजाना रात 12 बजे से सुबह पांच बजे के बीच एक बार फोन का इस्तेमाल जरूर किया।