उदयपुर .राजस्थान के होम मिनिस्टर गुलाबचंद कटारिया ने रविवार को चूरू में पार्टी वर्कर्स के प्रोग्राम में मनमोहन सिंह के खिलाफ आपत्तिजनक कमेंट किए। उन्होंने 8 बार एक ही गाली का इस्तेमाल किया। उन्होंने कहा, ” मनमोहन अमेरिका जाते थे तो सा* को एयरपोर्ट पर रिसीव करने के लिए ऐरा-गेरा नत्थू खेरा मंत्री आता था। अब मोदी जाते हैं तो खुद राष्ट्रपति ओबामा लेने आते हैं।राजस्थान के ग्रहमंत्री ने मनमोहन को 8 बार दी गाली, कहा-US में सा** को कोई भी ऐरा-गेरा नत्थू खेरा रिसीव करता था
उदयपुर .राजस्थान के होम मिनिस्टर गुलाबचंद कटारिया ने रविवार को चूरू में पार्टी वर्कर्स के प्रोग्राम में मनमोहन सिंह के खिलाफ आपत्तिजनक कमेंट किए। उन्होंने 8 बार एक ही गाली का इस्तेमाल किया। उन्होंने कहा, ” मनमोहन अमेरिका जाते थे तो सा* को एयरपोर्ट पर रिसीव करने के लिए ऐरा-गेरा नत्थू खेरा मंत्री आता था। अब मोदी जाते हैं तो खुद राष्ट्रपति ओबामा लेने आते हैं।आ ही गया एक रुका हुआ फ़ैसला…
चौदह साल, तीन महीने और सत्रह दिन पहले दंगाइयों ने अहमदाबाद में गुलबर्ग सोसायटी नाम की एक रिहायशी इमारत में आग लगा दी थी जिसमें 69 लोगों की मौत हो गई थी.
उस वारदात के लिए अदालत ने 11 लोगों को आजीवन कारावास की सज़ा सुना दी. एक मुजरिम को 10 साल की और 12 को सात-सात साल की क़ैद दी गई है.
अदालत का ये फ़ैसला ऐतिहासिक है. स्वतंत्र भारत के इतिहास में बिरले ही ऐसे मौक़े आए हैं जब धार्मिक फ़साद के दौरान हुए क़त्ल-ए-आम के दोषियों को सज़ा मिली हो.
ये छोटी उपलब्धि नहीं है कि गुजरात में 2002 में हुई हिंसा के मामलों में अब तक एक दर्जन से अधिक मुक़दमों में सवा सौ से ज़्यादा मुजरिमों को आजीवन कारावास की सज़ा मिल चुकी है.
सभी मुक़दमों में ये ज़ाहिर हुआ है कि कई दोषी दंगाई राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके घटक, जैसे भारतीय जनता पार्टी (भाजपा), बजरंग दल और विश्व हिंदू परिषद से जुड़े हुए थे.
इन दोषियों में सबसे चर्चित गुजरात की पूर्व मंत्री माया कोडनानी हैं, जिन्हें 91 लोगों के नरसंहार के आरोप में 28 वर्ष की सज़ा पहले ही सुनाई जा चुकी है.
तो क्या गुजरात के दंगा पीड़ितों को अदालत से इंसाफ़ मिल रहा है? सामाजिक कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड़ का मानना है कि अदालत का फ़ैसला निराश करता है.
थोड़ी देर पहले उन्होंने मुंबई से फ़ोन पर कहा, “अदालत ने सज़ा ज़रूर सुनाई है लेकिन ये कह कर केस को कमज़ोर कर दिया है कि आगज़नी करने वालों ने साज़िश नहीं रची थी.”
तीस्ता की संस्था सिटिज़ेंस फ़ॉर जस्टिस एंड पीस (सीजेपी) ने पीड़ितों की मदद करते हुए पिछले 14 सालों में कई मुक़दमे लड़े हैं.
उन्हीं की कोशिशों के कारण सर्वोच्च न्यायालय ने कई मुक़दमे अपनी निगरानी में चलवाए. कुछ मुक़दमे गुजरात से बाहर की अदालतों में भी भेजे.
इसके चलते तीस्ता का भाजपा-आरएसएस से छत्तीस का आँकड़ा रहा है. एक दिन पहले ही केंद्र सरकार ने सीजेपी का विदेशी चंदा लेने का लाइसेंस रद्द कर दिया.

गुजरात सरकार ने तीस्ता पर पीड़ितों से जमा किए गए चंदे में ग़बन करने के आरोप लगाए हैं.
उनकी गिरफ़्तारी पर फ़िलहाल सर्वोच्च न्यायालय ने रोक लगाई हुई है. गुजरात दंगों के कारण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कई सालों से तीस्ता के निशाने पर हैं.
2002 में जब राज्य में हुए दंगों में एक हज़ार से ज़्यादा मुसलमान मारे गए थे, तो नरेंद्र मोदी वहाँ के मुख्यमंत्री थे.
गुलबर्ग सोसायटी के जिस मकान में आग लगाई गई थी वो एहसान जाफ़री नाम के एक पूर्व सांसद का था.
आग में मरने वाले उनके यहाँ शरण पाए घबराए हुए मुसलमान थे, जिनमें औरतें और बच्चे भी थे.
जब जाफ़री की विधवा ज़ाकिया ने आरोप लगाया कि मोदी ने जानबूझकर दंगों करवाए तो सर्वोच्च न्यायालय ने विशेष पुलिस टीम गठित करके जाँच करवाई.
2012 में इस टीम ने मोदी के ख़िलाफ़ आरोपों को बेबुनियाद कह दिया. इसके बाद धारणा बन गई है कि सर्वोच्च न्यायालय ने मोदी को दंगे होने देने के आरोप से बरी कर दिया है. लेकिन ये धारणा ग़लत है.

जाँच टीम ज़रूर सर्वोच्च न्यायालय ने बनाई लेकिन उसकी रिपोर्ट निचली अदालत में जमा हुई थी.
उस रिपोर्ट के ख़िलाफ़ ज़ाकिया जाफ़री की अपील गुजरात उच्च न्यायालय में सुनी जा रही है.
वहाँ से जो भी फ़ैसला होगा उसके बाद ही रिपोर्ट सर्वोच्च न्यायालय के सामने आएगी.
गुलबर्ग सोसायटी के हत्याकांड का फ़ैसला भले ही आ गया है. लेकिन मोदी के ख़िलाफ़ ज़ाकिया जाफ़री का मुक़दमा अभी जारी है.
देशभर में मुसलमानों की नज़र उस मुक़दमे पर टिकी है, उसका नतीजा आने में चाहे कितने ही साल लग जाएँ.
सोजन्य – बीबीसी –
यहां लगती है गजल गायकी की क्लास, सिखाया जाता है अल्फाजों को नज्मों में बुनना

उदयपुर. गजल जज्बात और अल्फाज का एक बेहतरीन मज्मुआ है। वह आबरू-ए-शायरी भी है जो आम से खास तक हरदिल अजीज है। गजल कई शेर से मुकम्मल होती है, हर शेर में दो पंक्तियां और हर पंक्ति को मिसरा कहते हैं। इस तरह की कई उपयोगी और आधारभूत जानकारियां गजल अकादमी के बैनर तले चल रहे गजल गायकी शिविर में सरदारपुरा स्थित महाराणा कुंभा सभागार में दी जा रही हैं।
शिविर में डॉ. प्रेम भंडारी, डॉ. देवेन्द्र हिरण व डॉ. तामिल मोदी में सुबह 9.30 से 11.30 तक सुरों के अभ्यास से लेकर गजल व नज्मों में उर्दू अल्फाजों के तलफ्फुस तथा गजल में शास्त्रीय संगीत के महत्व को समझा रहे हैं।
डॉ. तामिल ने बताया कि गजल का पहला शेर मत्ला, दोनों मिसरों में काफिया और काफिए के बाद जो शब्द आए उसे रदीफ कहा जाता है। गजल के आखरी शेर जिसमें शायर का नाम या उपनाम (तखल्लुस) हो उसे मक्ता कहा जाता है। एेसे ही शेर की पंक्तियों की लंबाई के हिसाब से गजल की बहर तस की जाती है। गजल का बहतरीन शेर हासिले-गजल कहलाता है और मुशायरे की सबसे उम्दा गजल हासिले मुशायरे के खिताब से नवाजी जाती है।

झीलों की नगरी में गायकी के इस फन को अलहदा मुकाम देने की गरज से पहली बार सजी सुरों और शायरी के अदब की महफिल में 30 से अधिक प्रतिभागियों में स्कूल-कॉलेज स्टूडेंट्स, आयकर अधिकारी, व्यवयायी, समाजसेवी और संगीत विधा से जुड़े व्याख्याता तक इस विधा के सांगीतिक पक्ष के अलावा साहित्यिक स्वरूप से रूबरू होकर निहाल हो रहे हैं।
गुरुवार को कार्यशाला में उर्दू के मकबूल शायर और समीक्षक डॉ.खलील तनवीर ने गजलों की विकास यात्रा और विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की। उन्होंने बताया कि संगीत को त्रिवेणी इसलिए भी कहा जाता है कि इसमें तीन बातें शब्द, तर्ज और आवाज का बड़ा महत्व होता है। अपनी दिलकश शायरी से लिखने वाले, असरदार संगीत से सजाने वाले और बेहतरीन ढंग से रसिकों तक पहुंचाने वाली मखमूर आवाजें नहीं होतीं तो यह विधा किताबों में दफन ही रह जाती।
ट्रैक्टर की ट्रॉली में घुसी कार, राजसमन्द के चार युवाओं की हो गई मौत
उदयपुर . क्षेत्र के करजिया घाटी के पास मंगलवार रात साढ़े दस बजे तेज गति से आ रही अनियंत्रित कार आगे चल रहे ट्रैक्टर की ट्रॉली में घुस गई। हादसे में कार में सवार चार जनों की मौके पर ही मौत हो गई। ट्रैक्टर का ड्राइवर व खलासी घायल हो गए। सूचना पर पहुंची पुलिस ने यातायात सुचारू करवाया व चारों शव को हॉस्पिटल में रखवाया।
इधर, मृतकों की रात साढ़े 11 बजे बाद शिनाख्त हुई। पुलिस ने बताया कि हादसे में राजनगर निवासी इरफान, शाकिर व नदीम की मौके पर ही मौत हो गई। जबकि एक अन्य युवक इरशाद की देर रात मौत होने की सूचना मिली। कार में सवार चारों युवक उदयपुर से कांकरोली की ओर जा रहे थे।
मस्जिद ए हरम में होता है दुनिया का सबसे बड़ा इफ्तार एक साथ 3 लाख लोग करते हैं इफ्तारी

दुनिया का सबसे बड़ा इफ़्तार मदीना शहर में स्थित मस्जिद ए हरम में दुनिया का सबसे बड़ा इफ़्तार देखने को मिल रहा है. 12000 से ज़्यादा मेज़ें रोज़ लगाई जा रही हैं, इन मेज़ों पे तक़रीबन 3 लाख मुसलमान एक दिन में इफ़्तार कर रहे हैं, इस पूरे कार्यक्रम का रोज़ाना का ख़र्चा 10 लाख सऊदी रियाल है जो भारतीय रुपयों में लगभग 1.78 करोड़ आएगा.
खाने पीने की बात करें तो 130000 लीटर ज़मज़म पीया जा रहा है जबकि 50000 लीटर अरबी कॉफ़ी, 300000 ब्रेड रोल, 50000 लीटर दही और दूध और 50000 लीटर फलों के जूस और 40 टन ख़जूर रोज़ाना लग रहे हैं.
इफ़्तार 15 मिनट तक चलता है. खाने की व्यवस्था अलग अलग लोगों ने ले राखी है. इसमें लेकिन एक बड़ी अच्छी बात ये भी है कि इफ़्तार ख़त्म होने के 15 मिनट बाद वहाँ पर किसी भी गंदगी का कोई निशाँ नहीं रहता, ना आपको कहीं कोई पानी नज़र आएगा ना ही खाने का निशाँ. सुभान अल्लाह

बुढ़ापा विरोधी और खूबसूरती का प्रतीक है , जानिए, ‘रोज़ा’ रखने के अद्भुत मेडिकल बेनिफिट्स!

निस्संदेह रोज़ा एक पवित्र इबादत है और उसका इनाम केवल भगवान ही दे सकता है लेकिन रोज़ा के नतीजे में मनुष्य को ऐसे अद्भुत चिकित्सा लाभ भी प्राप्त होते हैं जिनका आम लोग कल्पना भी नहीं कर सकते।
विशेषज्ञों का कहना है कि तेजी से मनुष्य के बाहरी सौंदर्य, त्वचा की ताजगी, बालों यहां तक कि नाखूनों के लिए भी उपयोगी साबित होता है।
अल अरबिया समाचार चैनल के कार्यक्रम ” सबाह अल अरबिया” में बात करते हुए खाल मामला, बुढ़ापा और कॉस्मेटिक सर्जरी विशेषज्ञ डॉ सअद अस्स्कीर ने बताया कि एक सप्ताह में 16 घंटे का रोज़ा बुढ़ापे के प्रभाव को कम करने में मदद देता है। उन्होंने इस संबंध में वर्ष 1980 में किए गए एक शोध का भी हवाला दिया और बताया आज तक इस शोध को एक प्रमाण पत्र के रूप में माना जाता है।

ज़हरीले सामग्री से छुटकारा:
रोज़ा के बिना मानव शरीर की शक्ति और ऊर्जा प्रणाली पाचन के कारण घट जाती है। मगर 12 घंटे के रोज़े के बाद शरीर की ऊर्जा प्रणाली पाचन के निर्देश पर काम नहीं करती। बारह घंटे के रोज़े के बाद मानव शरीर में मौजूद ज़हरीला पदार्थ और अनियमित पदार्थ नष्ट हो जाते हैं। इस तरह शरीर को अनियमित पदार्थ से मुक्ति मिलती है।

बुढ़ापा:
डॉक्टर सैक़र ने बताया कि यह आभास सही नहीं है कि रोज़ा मनुष्य को कमजोर कर देता है। रोज़ा रखने से इंसान बुढ़ापे को रोकने के सफल प्रयास कर रहा होता है। रोज़े की अवस्था में मानव शरीर में मौजूद ऐसे हार्मोन हरकत में आ जाते हैं जो बुढ़ापे का विरोध करते हैं। रोज़ा से मानव त्वचा मजबूत होती है और उसमें झुर्रियां कम होती हैं।
उन्होंने हदीस का भी हवाला दिया जिसमें पैगम्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया था कि “रोज़ा रखो स्वास्थ्य पाओ”। डॉक्टर सैकर का कहना था कि सप्ताह में 16 घंटे के एक रोज़े से मानव शरीर को अद्भुत चिकित्सा लाभ प्राप्त होते हैं।
उन्होंने कहा कि हर दिन रोज़े के चिकित्सा लाभ सामने आ रहे हैं। रोज़ा कैंसर, हृदय रोग और धमनियों के रोगों के आगे भी ढाल है।

त्वचा की ताजगी:
गर्मी के मौसम में आने वाले माहे रमज़ान में मानव शरीर को रोज़े की हालत में पानी की ज्यादा जरूरत महसूस होती है। सख्त गर्मी में त्वचा झुलस जाती है। डॉक्टर सैकर सुझाव देते हैं कि इफ्तार के बाद और सेहरी के समय में पानी का अधिकतर इस्तेमाल किया जाए। इससे त्वचा को ताजा रखा जा सकता है। इसके अलावा ग्लिसरीन के उपयोग से भी त्वचा को ताजा किया जा सकता है।

रोज़ेदार के शरीर में कौन सी पदार्थ ज्यादा फैलती है:
अल अरबिया कार्यक्रम में बोलते हुए त्वचा मामलों के विशेषज्ञ डॉक्टर अल सैकर ने कहा कि मानव शरीर को कोलाजीन [बे रंग प्रोटीन जो ज्यादातर गलाई सेन, हाइड रोक्सी प्रोटीन और परोलियन पाई जाती है। शरीर के सभी हेरफेर ऊतक में खुसूसन त्वचा, करी हड्डी और जोड़ बंधन में होती है] और अलासटन के फैलाव की आवश्यकता होती है और रोज़ा इस में मदद करता है।
मानव त्वचा और नाखूनों पर भी रोज़ा का सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। नाखून, सर के बालों का विकास और उनकी मजबूती में वृद्धि होती है। मानव और चेहरे के रंग पर सेट होने वाले प्रभाव नाखूनों पर भी प्रभावित होते हैं. रोज़े की हालत में शरीर अपने हार्मोनज को फैलाता है जो त्वचा की सौंदर्य और नाखूनों चमक और बालों की मजबूती का सबब बनते हैं। यहां तक कि रोज़े से संक्रमण बैक्टीरिया को रोकने और बुढ़ापे का विरोध करता है।

सावधानियां:
विशेषज्ञ माहे रमजान आने से पहले रोज़ेदारों को कुछ सावधानियां बरतने का भी सुझाव दिया है। उनका कहना है कि रोगी और गर्भवती महिलाओं को रमजान से पहले अपना मेडिकल जाँच करा लेना चाहिए ताकि यह पता चल सके कि उन्हें रोज़े की हालत में कौन कौन से काम करने हैं खाने में किस तरह की सावधानी की जरूरत है।
अन्य प्रस्ताव आम रोज़ेदारों के लिए है। रोज़े की वजह से अधिक भूख और प्यास मानव चिकित्सा से अत्यधिक खाने पीने पर मजबूर कर सकती है मगर सहरी और इफ्तार में खाने-पीने में संयम का प्रदर्शन करना चाहिए।
खाना खाने के तुरंत बाद सोने की आदत नहीं डलनी चाहिए बल्कि शरीर को भोजन पचाने का कुछ मौका जरूर देना चाहिए। संतुलित भोजन के साथ खाने में सब्जियों की मात्रा बढ़ा देनी चाहिए।
स्मृति को ‘डियर’ पर आपत्ति, छिड़ी मंत्री से बहस

सोशल मीडिया पर बिहार के शिक्षा मंत्री डॉक्टर अशोक चौधरी और केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री स्मृति इरानी की ट्विटर पर झड़प चर्चा का विषय बन गई है.
बिहार के शिक्षा मंत्री ने जब केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री को अपने ट्वीट में संबोधित करते हुए ‘डियर’ लिखा तो इसके जवाब में स्मृति ने पूछ लिया, ‘महिलाओं को डियर कबसे लिखने लगे.’
बस फिर क्या था, ट्विटर पर दोनों मंत्रियों के बीच पूरी बहस छिड़ गई जो उनके मंत्रालयों के कामकाज तक जा पहुँची.
अशोक चौधरी ने अपने ट्वीट में लिखा था, “डियर स्मृति जी, कभी राजनीति और भाषण से वक़्त मिले तो शिक्षा नीति पर भी ध्यान दें.”
इसके जवाब में स्मृति ने ट्वीट किया, “महिलाओं को डियर कहकर कबसे संबोधित करने लगे अशोक जी?”
Image copyrightOTHERअशोक चौधरी ने जवाब दिया, “आपका अपमान करने के लिए नहीं, बल्कि सिखाने के लिए बता रहा हूँ. पेशेवर ईमेल डियर से ही शुरू होते हैं.”
उन्होंने आगे लिखा, “स्मृति जी कभी मुद्दे का जवाब दीजिए, घुमाएं मत.”
इस ट्वीट के बाद स्मृति इरानी ने सीधे शिक्षा के मुद्दे पर आते हुए अशोक चौधरी से पूछा, “शिक्षा नीति पर आपके राज्य के विचार नहीं मिले हैं और न ही जब आपके साथ आमने-सामने बैठक हुई थी, तब आपने मुझे कोई सुझाव दिया था.”
Image copyrightOTHERइसके जवाब में अशोक चौधरी ने लिखा, “आपसे गुज़ारिश है कि हमारी मीटिंग के मिनेट्स सार्वजनिक कर दीजिए. दूध का दूध पानी का पानी हो जाएगा.”
स्मृति इरानी ने लिखा, “सर, मैं अब ये सार्वजनिक कर दूंगी. आपसे गुज़ारिश है कि शिक्षकों की दो लाख रिक्तियों को भरें और केंद्रीय विद्यालयों के लिए ज़मीन दें.”
अशोक चौधरी ने जवाब दिया, “मैं जानता हूँ कि अपने वादे कैसे पूरे करने हैं. आपसे गुज़ारिश है कि आपने जो वादे किए हैं उन्हें पूरा करें.”
Image copyrightOTHERदो मंत्रियों की ट्विटर पर हुई इस सार्वजनिक तक़रार में कुछ आम लोगों ने भी ख़ूब ट्वीट किए.
द चकोलेबाज़ नाम से संचालित अकाउंट से लिखा गया, “मैडम 12वीं के आगे पढ़े होते तो पता चलता कि ऑफ़िशियल और पेशेवर पत्र कैसे लिखे जाते हैं.”
स्कॉची के नाम से संचालित अकाउंट से ट्वीट किया गया, “आपने कभी जीवन में कोई औपचारिक पत्र या ईमेल नहीं लिखा क्या, स्मृति जी?”
वहीं भारतीय जनता युवा मोर्चा स्टडी सर्किल ने अशोक चौधरी को संबोधित करते हुए ट्वीट किया, “थोड़ी तमीज तो सीख लीजिये श्रीमान! न अपने पद की गरिमा का ख्याल, न दूसरों का. स्मृति जी के ट्वीट से सीखिये कुछ.”
Image copyrightOTHERएक यूज़र पटेल सरल ने ग़लत अंग्रेज़ी में स्मृति इरानी से पूछा, “अगर आप कॉलेज या यूनिवर्सिटी गई होतीं तो आपको पता होता कि लोगों को डियर कहना सामान्य बात है.”
साभार – बीबीसी हिंदी
कोलोनी में जंगली जानवरों की दहशत
उदयपुर। हिरणमगरी क्षेत्र की पानेरियों की मादड़ी में बीती रात जंगली जानवर ने हमला करके पांच गायों को गंभीर रूप से घायल कर दिया। इनमें से एक गाय की मौत भी हो गई। आशंका है कि उक्त हमला पैंथर या जरख द्वारा किया गया है।गर्लफ्रेंड से परेशान युवक ने फतहसागर में कूदा
उदयपुर। गर्लफें्रड व परिजनों से परेशान एक युवक ने आज दोपहर फतहसागर में कूद कर जान दे दी। मृतक द्वारा जल्दबाजी में लिखा गया सुसाइड नोट पुलिस को मिला है, जिसमें उसने गर्लफें्रड सहित अन्य लोगों को चेतावनी देकर छोडऩे का आग्रह किया है। उसने कुछ लोगों को उसकी बर्बादी का जिम्मेदार भी बताया है।आतंक का आरोप, दान से मदद

पिछले दो साल में देश भर में ऐसे दर्जनों मुसलमान युवा जेल से रिहा किए गए हैं जिन पर चरमपंथी घटनाओं में शामिल होने के आरोप थे.
अदालत ने इस तरह के मामलों में 100 से अधिक मुसलमान युवाओं को इलज़ामों से बाइज्जत बरी कर दिया है. इस तरह के युवाओं की मदद कर रही हैं कुछ मुस्लिम संस्थाएं. इनमें सबसे आगे है जमीयत-उल-उलेमा-ए हिंद.
अक्षरधाम मंदिर पर हमले का मामला हो या मालेगांव बम धमाके का, इस संस्था ने आतंकवाद के मामलों में मुस्लिम युवाओं का मुक़दमा लड़ने और उन्हें इंसाफ दिलाने में अहम भूमिका निभाई है.

गुलज़ार आज़मी इस संस्था के लीगल सेल के अध्यक्ष हैं. वो कहते हैं कि अब तक उनकी संस्था ने 104 मुस्लिम युवाओं को आतंक के इलज़ाम से बरी करवाया है.
वो बताते हैं, “इनमें से कई ऐसे थे जिन्हें निचली अदालतों ने फांसी की सजा सुनाई थी.” उन्होंने बताया कि उनकी संस्था 65 मुक़दमों में 560 मुस्लिम युवाओं के मुक़दमे लड़ रही है.
आज़मी के मुताबिक़ जमीयत की वकीलों की एक टीम पहले हर केस के तह तक जाती है. यह टीम वही मुक़दमा लड़ने को तैयार होती है जिसमें ये साफ़ होता है कि मुल्ज़िम को फंसाया गया है या वो बेक़सूर है.
गुलज़ार आज़मी कहते हैं कि जमीयत ने इस काम को उस समय शुरू किया जब वकीलों की फीस न देने के कारण कई बेक़सूर मुस्लिम यवाओं को सज़ाएं मिलने लगीं. पैसों की कमी के कारण वो वकीलों की फ़ीस नहीं दे सकते थे और वो मुक़दमा हार जाते थे.”
Image copyrightAPजमीयत ने रमज़ान के महीने में मस्जिदों में चंदा जमा करना शुरू किया है. हर साल मुसलमान अपनी कमाई का 2.5 फीसद हिस्सा ज़कात में दान करते हैं. कई लोग ग़रीबों को पैसे देते हैं और कई लोग ऐसी संस्थाओं को जो अच्छे कामों में जुटी हैं. जमीयत ने अब तक इन पैसों में से दो करोड़ रुपए इन मुक़दमों पर खर्च किए हैं.
इस पैसे का एक छोटा हिस्सा उन मुस्लिम युवाओं के परिवारों को दिया जाता है जो या तो जेल में हैं या जो बेगुनाह साबित होकर समाज से दोबारा जुड़ने की कोशिश कर रहे हैं.
गुलज़ार आज़मी के मुताबिक़ वो बेक़सूर ग़ैर मुस्लिमों के मुक़दमे भी लड़ते हैं. उनकी संस्था ने दो ऐसे हिंदुओं को भी बरी करवाया है जिन्हें मौत की सजा सुनाई गई थी. लेकिन ये आतंकवाद से जुड़े मुक़दमे नहीं थे.
Image copyrightREUTERSजमीयत के इस काम की सराहना मुसलमान खुलकर कर रहे हैं.
पश्चिम बंगाल में युवा मुस्लिम के संगठन के पदाधिकारी मुहम्मद कमरुजमां कहते हैं कि ग़रीब मुस्लिम नौजवान, जो पैसे की कमी की वजह से ख़ुद को निर्दोष साबित नहीं कर पा रहे हैं, ऐसे में उन्हें निर्दोष साबित करने के लिए जमीयत के पास कोई प्रोग्राम है तो यह अच्छी बात है.
कोलकाता की एक बड़ी मस्जिद के इमाम क़ारी मुहम्मद शफ़ीक़ कहते हैं कि ज़कात के पैसे को ग़रीब मुसलमानों की रिहाई के लिए अदालत में उनकी पैरवी के लिए खर्च की जाए, तो यह एक अच्छा क़दम है
Image copyrightREUTERSपिछले साल जमीयत ने एक और बड़ा क़दम उठाया. इसने आतंकवाद के मामलों से बरी हुए मुस्लिम युवाओं को मुआवज़ा दिलाने के लिए अदालत का दरवाज़ा खटखटाया है.
अक्षरधाम हमले के मामले में बरी हुए सभी छह मुसलमानों की तरफ से जमीयत ने गुजरात पुलिस के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में मुक़दमा किया है.
इसमें उन पुलिस अधिकारियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई की मांग की गई है जिन्होंने ग़लत तरीक़े से इन मुस्लिम युवाओं को गिरफ्तार किया था.
आतंक विरोधी क़ानून पोटा के सेक्शन 58 में इस बात का प्रावधान है कि इस तरह के मामलों में लोगों को फंसाने वाले पुलिस अधिकारियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई की जा सकती है. उनसे बरी हुए लोगों को मुआवजा देने को कहा जा सकता है. इन अधिकारियों के खिलाफ आरोप सही पाए जाने पर अधिकारियों को दो साल की जेल की सजा हो सकती है.
इस केस की सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई जल्द शुरू होने वाली है.

